राजस्थान के लोक नृत्य और संगीत – प्रमुख नृत्य, जनजातियाँ व सांस्कृतिक परंपराएँ पूरी जानकारी | Part-2
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अन्य महत्वपूर्ण जातियाँ और उनके नृत्य
- गुलाबों कालबेलिया: यह अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नृत्यांगना हैं.
- बणजारों का नृत्य: इनके प्रमुख नृत्य मछली नृत्य (पूर्णिमा की रात को किया जाने वाला नृत्य नाटक) और नेजा नृत्य हैं. इनके वाद्यों में ढोलकी, थाली और कटोरियाँ प्रमुख हैं.
- कथौड़ी जनजाति: इनके मुख्य नृत्य मावलिया (नवरात्रि में पुरुषों द्वारा) और होली नृत्य (महिलाओं द्वारा समूह में) हैं.
- मेवों के नृत्य: अलवर क्षेत्र में महिलाओं द्वारा रतवई और स्त्री-पुरुषों द्वारा रणबाजा नृत्य किया जाता है.
- गुर्जरों का नृत्य (चरी नृत्य): स्त्रियाँ सिर पर चरी (कलश) रखकर, उसमें कपास के बीजों में तेल डालकर आग जलाकर नृत्य करती हैं. किशनगढ़ की फलकू बाई इसकी प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं.
- भोपों के नृत्य: भोपे अपनी 'पड़' के सामने लोक देवताओं (पाबूजी, गोगाजी आदि) की गाथा का वर्णन करते हुए नृत्य करते हैं. कठपुतली नृत्य भी इसी श्रेणी में आता है.
- मीणों के नृत्य: इसमें गाने वाली और नाचने वाली दो टोलियाँ होती हैं.
विविध लोक नृत्य
- झाँझी: मारवाड़ क्षेत्र में महिलाओं द्वारा छिद्रित मटकों को धारण कर किया जाने वाला नृत्य.
- थाली नृत्य: पाबूजी के भक्तों द्वारा थाली को उंगली पर तेज गति से घुमाते हुए किया जाने वाला नृत्य.
- लांगुरिया: करौली में कैलादेवी के मेले में भक्तों द्वारा किया जाने वाला धार्मिक नृत्य.
- खारी: मेवाड़ और अलवर क्षेत्र में दुल्हन की विदाई के समय सखियों द्वारा किया जाने वाला नृत्य.
- चरवा: माली समाज की स्त्रियों द्वारा संतानोत्पत्ति के अवसर पर सिर पर कांसे के घड़े (चरवा) में दीपक रखकर किया जाने वाला नृत्य.
आपकी अंतिम फाइल (image_fdc8a6.jpg) राजस्थान के क्षेत्रीय और जनजातीय नृत्यों की विस्तृत श्रृंखला को पूरा करती है। इसमें वर्णित नृत्यों का विस्तारपूर्वक विवरण यहाँ दिया गया है:
विविध क्षेत्रीय एवं लोक नृत्य
- रण नृत्य: यह मेवाड़ क्षेत्र का वीर रस से भरपूर पुरुष प्रधान नृत्य है, जिसमें दो युवक हाथों में तलवार और अन्य शस्त्र लेकर युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते हैं.
- चरकुला: मूल रूप से उत्तर प्रदेश का यह नृत्य राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र, विशेषकर भरतपुर जिले में किया जाता है.
- सूकर: राजस्थान के आदिवासियों द्वारा अपने लोक देवता 'सूकर' की स्मृति में मुखौटा लगाकर किया जाने वाला नृत्य है.
- पेजण: बाड़मेर और बागड़ क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर किया जाने वाला प्रसिद्ध नृत्य है.
- लूहूर या लहूर नृत्य: शेखावाटी क्षेत्र में मस्ती के माहौल में उमंगों के साथ किया जाने वाला अभिनय नृत्य है.
गैर नृत्यों के विशिष्ट प्रकार
- आंगी-बांगी गैर: यह चैत्र वदी तीज को बाड़मेर के लाखेटा गाँव में आयोजित होता है. इसमें नर्तक 8-10 किलो के भारी घुंघरू और 40-40 मीटर के घेराव वाली 'आंगी' पहनते हैं.
- तलवारों की गैर: यह उदयपुर के मेनार गाँव में प्रसिद्ध है. इसकी शुरुआत महाराणा अमरसिंह के समय मुगलों पर विजय की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी है. इसमें पुरुष योद्धा की वेशभूषा में तलवार, बंदूक और ढाल के साथ नृत्य करते हैं.
प्रमुख जनजातीय और क्षेत्रीय नृत्य
- नाहर नृत्य: भीलवाड़ा जिले के माण्डल कस्बे में रंग तेरस को आयोजित होता है. इसमें लोग शरीर पर रुई चिपकाकर शेर (नाहर) का स्वांग रचते हैं. कहा जाता है कि यह परंपरा शाहजहाँ के मनोरंजन के लिए शुरू हुई थी.
- लुम्बर नृत्य: यह जालौर जिले का महिला प्रधान नृत्य है, जो होली के अवसर पर गोला बनाकर किया जाता है.
- खारी नृत्य: अलवर के मेवात क्षेत्र में दुल्हन की विदाई के समय उसकी सखियों द्वारा किया जाता है. 'खारी' उस संदूकची को कहते हैं जिसमें वधू के कपड़े होते हैं.
- चकरी नृत्य: हाड़ौती क्षेत्र (बूंदी) का लोकप्रिय नृत्य है, जो कंजरी और बेड़िया जाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है. इसे 'फूंदी' नृत्य भी कहते हैं और यह बूंदी के 'कजली तीज' मेले का मुख्य आकर्षण है.
- मावलिया नृत्य: कथौड़ी समुदाय के पुरुषों द्वारा नवरात्रि के नौ दिनों तक किया जाता है. इसमें पुरुष ढोलक और बांसुरी की लय पर गोल घेरे में घूमकर नृत्य करते हैं.
- झेला: यह सहरिया आदिवासियों का फसल कटाई के समय किया जाने वाला नृत्य है.
इस इमेज में राजस्थान के विभिन्न लोक नृत्यों और उनसे जुड़ी जातियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। यहाँ इसका पूरा विवरण प्रस्तुत है:
राजस्थान के प्रमुख लोक नृत्य
- इन्दरपरी: यह सहरिया पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है जिसमें वे चेहरे पर बंदर, शेर, राक्षस और हिरण के मुखौटे (मिट्टी-कुट्टी से बने) लगाकर नृत्य करते हैं。 इसमें पुरुष स्त्री का वेश धारण कर घूँघट निकालकर नाचते हैं。
- डांग: यह नृत्य ब्रज भाषा से प्रभावित क्षेत्रों (नाथद्वारा, कांकरोली) में होली के बाद धुलंडी, शीतला अष्टमी और रंग ग्यारस पर किया जाता है。 इसमें देवर-भाभी एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और भाभी अपने हाथ में रखे कोड़ा से प्रहार करती है。
- राड़: होली पर बागड़ अंचल में 'राड़' खेलने की परंपरा है, जिसे कंडों, पत्थरों या जलती लकड़ियों से खेला जाता है。 सांगवाड़ा की ओवरी और ड़ाकड़ा गाँवों में दो दलों के बीच नारियल गाड़कर इसे छीना जाता है。 भीलूड़ा और जेठाणा गाँव में 'पत्थरों की राड़' खेली जाती है。
- वेरीहाल: खैरवाड़ा के भाण्डा गाँव में रंग पंचमी पर आदिवासियों द्वारा किया जाने वाला यह प्रमुख नृत्य है。 वेरीहाल वास्तव में एक ढोल है, जिसके चारों ओर नृत्य किया जाता है。
- घूमरा: यह आदिवासी भील महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अर्द्ध-वृत्ताकार नृत्य है。 इसमें दो दल होते हैं—एक गाता है और दूसरा नाचता है。
- सुगनी: यह आदिवासी युवक-युवतियों का नृत्य है जो एक-दूसरे को रिझाने के लिए किया जाता है。 पाली जिले के भीगाना और गोड्या जाति के युवाओं में यह विशेष रूप से प्रचलित है。
- रायण: यह गरासिया पुरुषों का महिला प्रधान नृत्य है, जिसमें नर्तक पुरुष महिलाओं के वेश में तलवारों के साथ वीरता और शौर्य का प्रदर्शन करते हैं。
- भैरव: होली के तीसरे दिन ब्यावर में 'बादशाह-बीरबल' की सवारी निकाली जाती है。 इसमें बीबरल का पात्र सवारी के आगे भैरव नृत्य करता है。
- फूँदी: यह नृत्य सभी महिलाओं में प्रचलित है, जो विशेषकर विवाह के अवसरों (बनौली, घोड़ी चढ़ते समय) और श्रावण मास में किया जाता है。
- बिच्छुड़ो: यह कालबेलिया औरतों में बहुत लोकप्रिय है, जिसमें छोटे चंग का उपयोग किया जाता है。
नृत्य एवं संगीत से जुड़ी प्रमुख जातियाँ
- ढोली: ये ढोल बजाने का कार्य करने वाला वर्ग है, जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में दमामी या नक्काची भी कहा जाता है。
- लंगा: ये जैसलमेर और बाड़मेर (पश्चिमी राजस्थान) में पाए जाते हैं और कमायचा व सारंगी बजाने तथा माँड गायन में कुशल होते हैं。 बाड़मेर का 'बड़वना गाँव' इनका मुख्य स्थान है。
- भवाई: इस जाति की उत्पत्ति केकड़ी (अजमेर) के नागाजी जाट बाबाजी से मानी जाती है。 इनका भवाई नृत्य पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है。
- कालबेलिया: ये मुख्य रूप से पुंगी और खंजरी का प्रयोग करते हैं。 प्रसिद्ध नृत्यांगना 'गुलाबो' ने इस नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है。
- कठपुतली नट: मारवाड़ और मेवाड़ क्षेत्रों में ये नट कठपुतली प्रदर्शन के माध्यम से अपनी आजीविका कमाते हैं。
- रावल: ये मारवाड़ और बीकानेर के संगीतजीवी जाति हैं, जिनकी रम्मतें बहुत प्रसिद्ध हैं。
- भगतण: ये मुख्य रूप से जोधपुर क्षेत्र में पाए जाते हैं。
- पातुर: ये जोधपुर, फलोदी, नागौर और पाली के क्षेत्रों में नाचने-गाने का कार्य करने वाली जाति है。
राजस्थान की संगीतजीवी जातियाँ
राजस्थान में अनेक ऐसी जातियाँ हैं जिनका मुख्य पेशा संगीत और गायन रहा है:
- पातुर: संगीत का पेशा अपनाने वाली स्त्रियों को पातुर कहा जाता है。
- कलावन्त: ये निपुण गायक व वादक होते हैं, जिनका जयपुर का डागर घराना प्रसिद्ध है。
- कव्वाल: कव्वालों की उत्पत्ति कलावन्तों से ही हुई है, जिसकी परंपरा अमीर खुसरो ने प्रारंभ की थी。
- ढाढ़ी: मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान में पाई जाने वाली जाति जो सारंगी व रबाब के साथ अपने यजमानों की विरुदावली गाती है。
- मिरासी: इनका मुख्य पेशा सारंगी वादन है और ये मुख्यतः मारवाड़ क्षेत्र में पाए जाते हैं。
- मांगणियार: बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर के रेगिस्तानी जिलों की पेशेवर जाति। इनके मुख्य वाद्य कमायचा, खड़ताल और सुरनाई हैं。
- कानगूजरी: मारवाड़ में पाई जाने वाली यह जाति रावणहत्था के साथ राधा-कृष्ण के भक्ति गीत गाती है。
- जोगी: नाथ पंथ के अनुयायी जो सारंगी पर गोपीचन्द और भरथरी के गीत गाते हैं。
- कामड़ (कमण्या): रामदेवजी के भक्त जो तेरहताली नृत्य और गायन में कुशल होते हैं。
- भोपा: अपने ईष्ट देवताओं के गीत गाकर और 'पड़' (फड़) का वाचन कर अपनी जीविका चलाते हैं。
राजस्थान में संगीत का इतिहास
- महाराणा कुंभा: इन्हें अपने समय का महान संगीतकार माना जाता है, जिन्होंने 'संगीतराज', 'संगीत मीमांसा' और 'सुधा प्रबंध' जैसे ग्रंथों की रचना की。 उनकी पुत्री रमाबाई भी प्रसिद्ध संगीतज्ञ थीं जिन्हें 'वागीश्वरी' कहा जाता था。
- सवाई जयसिंह: आधुनिक गुलाबी नगर जयपुर के निर्माता, जिनके दरबार में संगीत और ललित कलाओं को विशेष प्रोत्साहन मिला。
- सवाई प्रतापसिंह: इनके दरबारी संगीतज्ञ चाँद खाँ को 'बुधप्रकाश' की उपाधि मिली थी。 प्रतापसिंह ने स्वयं 'स्वर सागर' नामक ग्रंथ की रचना की और उनके दरबार में 'गन्धर्व बाईसी' (विभिन्न विषयों के 22 विशेषज्ञ) विद्यमान थे。
- कथक नृत्य: जयपुर अपने कथक नृत्य की शैली के लिए विश्वविख्यात है。
राजस्थान की लोक गायन शैलियाँ
राजस्थान की लोक गायन शैलियाँ शास्त्रीय संगीत की तरह ही राग-रागनियों पर आधारित हैं:
1. माँड गायिकी
- यह राजस्थान की गायकी की मूल पहचान है。 प्रसिद्ध लोक गीत "केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश" इसी शैली में है。
- 10वीं सदी में जैसलमेर क्षेत्र 'माँड' कहलाता था, इसलिए यहाँ की गायकी का नाम माँड पड़ा。
- प्रसिद्ध गायिकाएँ: स्व. गवरी देवी (बीकानेर), स्व. हाजन अल्लाह जिलाह बाई (बीकानेर), गवरी देवी (पाली) और श्रीमती बन्नो बेगम (जयपुर) प्रमुख हैं。
2. फड़ गायकी
- भीलवाड़ा के शाहपुरा में भोपा-भोपियों द्वारा लोक देवताओं की कपड़े पर चित्रित कथाओं (फड़) का गायन किया जाता है。
3. लंगा गायिकी
- पश्चिमी राजस्थान (बाड़मेर, जैसलमेर) में लंगा जाति द्वारा मांगलिक अवसरों पर गाई जाने वाली शैली。 ये सारंगी और कमायचा का प्रयोग करते हैं。
4. मांगणियार गायिकी
- यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध शैली है。 इसमें मुख्य रूप से 6 राग और 36 रागनियां होती हैं。
- प्रमुख कलाकार: साकर खाँ मांगणियार, गफूर खाँ, रुक्मादेवी और स्व. सदीक खाँ प्रमुख हैं。
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