राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय, अभिलेखागार और सांस्कृतिक केन्द्र | Rajasthan Museums GK
संग्रहालय एवं अभिलेखागार
राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर
यह राजस्थान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संस्था है। इसके बारे में मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
- स्थापना और स्थान परिवर्तन: इस संस्थान की स्थापना सन् 1955 में शुरुआत में जयपुर में की गई थी। बाद में, सन् 1960 में इसे जयपुर से बीकानेर स्थानांतरित (shift) कर दिया गया।
- मुख्य उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य राज्य के उन अभिलेखों (Records) को सुरक्षा प्रदान करना है जिनका स्थायी महत्व है।
- संरक्षण तकनीक: यहाँ अभिलेखों को सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) का उपयोग किया जाता है।
- सेवाएँ: आवश्यकता पड़ने पर यह संस्थान महत्वपूर्ण दस्तावेज़ निम्नलिखित को उपलब्ध कराता है:
- न्यायालय (Courts)
- आम नागरिक
- सरकार के विभिन्न विभाग
- शोध अध्येता (Research Scholars)
राजस्थान राज्य अभिलेखागार (बीकानेर) - अतिरिक्त जानकारी
- शाखाएँ: इसकी शाखाएँ जयपुर, कोटा, उदयपुर, अलवर, भरतपुर तथा अजमेर में स्थित हैं।
- संग्रह: यहाँ मुगलकाल और मध्यकाल के महत्वपूर्ण अभिलेख, फरमान, निशान, मंसूर, पट्टा, परवाना और बहियात आदि सुरक्षित हैं।
- भाषाएँ: यहाँ फारसी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ राजस्थानी बोलियों (ढूँढाड़ी, मेवाड़ी, मारवाड़ी, हाड़ौती) के अभिलेख उपलब्ध हैं।
- मुख्य कार्य:
- भूतपूर्व रियासतों और 25 वर्ष से अधिक पुराने महत्वपूर्ण अभिलेखों को सुरक्षित रखना।
- अभिलेखों की मरम्मत और संरक्षण करना।
- स्वतंत्रता सेनानियों की यादों को 'मौखिक इतिहास परियोजना' के तहत रिकॉर्ड करना।
- अभिलेख सप्ताह के दौरान प्रदर्शनियाँ लगाकर लोगों को जागरूक करना।
2. दस्तूर - कौमवार
- अर्थ: 'दस्तूर' फारसी शब्द है जिसका अर्थ रीति या नियम है, जबकि 'कौम' का अर्थ जाति है।
- महत्व: जयपुर के 'दस्तूर कौमवार' अभिलेखों से 1700 से 2000 वि. सं. तक के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक इतिहास की जानकारी मिलती है।
3. अरबी-फारसी शोध संस्थान (टोंक)
- स्थापना: इसकी स्थापना राजस्थान सरकार द्वारा 1978 में टोंक के तीसरे नवाब मोहम्मद अली खाँ के हस्तलिखित पुस्तकों के संरक्षण हेतु की गई थी।
- प्रमुख संग्रह: यहाँ औरंगजेब द्वारा लिखित 'आलमगिरी कुरान शरीफ' और शाहजहाँ द्वारा तैयार कराई गई 'कुराने कमाल' सुरक्षित हैं।
राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय (Museums)
राजस्थान के निर्माण से पूर्व ही यहाँ की विभिन्न रियासतों में 10 संग्रहालय स्थापित हो चुके थे। प्रमुख संग्रहालयों का विवरण नीचे तालिका में दिया गया है:
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स्थान |
संग्रहालय का नाम / विवरण |
स्थापना वर्ष / विशेष तथ्य |
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जयपुर |
अल्बर्ट म्यूजियम हॉल |
1876 में नींव रखी गई; 1886 में जनता के लिए खोला गया। |
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उदयपुर |
विक्टोरिया हाल म्यूजियम (गुलाब बाग) |
1887 में महाराणा फतहसिंह के काल में बना; 1890 में प्रारंभ हुआ। |
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अजमेर |
राजपूताना म्यूजियम |
1908 में 'अकबर के किले' में स्थापित। |
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जोधपुर |
सरदार म्यूजियम |
1909 में महाराजा सरदार सिंह के नाम पर स्थापित। |
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झालावाड़ |
राजकीय संग्रहालय |
1915 में स्थापित; श्री भवानी सिंह का महत्वपूर्ण योगदान। |
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बीकानेर |
राजकीय संग्रहालय |
1937 में इटली के विद्वान डॉ. एल. पी. टेसीटोरी के सहयोग से स्थापित। |
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अलवर |
राजकीय संग्रहालय |
1940 में स्थापित। |
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भरतपुर |
राजकीय संग्रहालय |
1940 में स्थापित; 1944 में जनता के लिए खोला गया। |
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कोटा |
राजकीय संग्रहालय |
1944 में स्थापित। |
राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय और स्थापना वर्ष
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण संग्रहालयों की सूची और उनके स्थापना वर्ष नीचे दिए गए हैं:
- आमेर (जयपुर): 1949 में संग्रहालय स्थापित। 1950 में राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना हुई।
- डूँगरपुर: 1959।
- आहड़ (उदयपुर): 1961।
- माउंट आबू (सिरोही): 1965।
- मण्डोर (जोधपुर): 1968।
- चित्तौड़गढ़: 1969।
- हवामहल (जयपुर): 1983।
- जैसलमेर: 1984।
- विराट नगर (जयपुर): 1987।
- पाली: 1991।
- आमेर कला दीर्घा: 1992।
विशेष संग्रहालय एवं उनका विवरण
1. गुड़ियों का संग्रहालय (Doll Museum), जयपुर
- स्थापना: 1979 में J.L.N. मार्ग पर भवानीबाई सेखसरिया चैरिटी ट्रस्ट द्वारा किया गया।
- विशेषता: यहाँ भारत के विभिन्न प्रान्तों के साथ-साथ विदेशों की गुड़ियाँ भी प्रदर्शित हैं।
2. सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर
- निर्माण: महाराणा भगवतसिंह द्वारा।
- प्रमुख कक्ष:
- हल्दीघाटी कक्ष: इसमें राजा मानसिंह और महाराणा प्रताप के युद्ध से संबंधित ऐतिहासिक चित्र हैं।
- चेतक कक्ष: इसमें शक्तिसिंह द्वारा प्रताप को अपना घोड़ा भेंट करने का दृश्य दिखाया गया है।
- प्रताप कक्ष: राणा प्रताप का भाला, तलवारें, कवच और भामाशाह द्वारा दान की थैली भेंट करने जैसे चित्र हैं।
- अन्य आकर्षण:
- चन्द्रमहल: यहाँ 'लक्खु कुंड' है जिसमें राजतिलक के समय एक लाख चांदी के सिक्के डाले जाते थे।
- अमर विलास महल: यहाँ जॉर्ज पंचम के दिल्ली दरबार (1903) की कुर्सी रखी गई है।
- दिलखुश महल: 200-250 वर्ष पुराने चित्र और एक पूरा कक्ष जो पूरी तरह कांच की बारीक कला से निर्मित है।
- चीनी चित्रशाला: पुरानी चीनी टाइल्स यहाँ प्रदर्शित हैं।
3. बीकानेर के प्रमुख संग्रहालय
बीकानेर में मुख्य रूप से 3 संग्रहालय स्थित हैं:
- करणी म्यूजियम: यह जूनागढ़ किले में स्थित है। यहाँ चन्दन का सिंहासन (1212 ई.), बेल्जियम का आइना और प्रथम विश्व युद्ध का हवाई जहाज रखा गया है।
- सार्दुल म्यूजियम: लालगढ़ पैलेस में स्थित। यहाँ विभिन्न देशों के सिक्कों का संग्रह और 'प्रिंसेस गैलेरी' में राजकुमारों/राजकुमारियों के चित्र हैं।
- राजकीय संग्रहालय: यहाँ नदी घाटी सभ्यताओं के अवशेष और पुरातत्व सामग्री सुरक्षित है।
4. राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय, कोटा
- स्थापना: 30 मार्च, 1970 को राजमहलों में।
- विशेषता: यहाँ शस्त्र और राजसी वस्तुएँ रखी गई हैं। 'बड़ा महल' में राजस्थान की सभी चित्र शैलियों के भित्तिचित्र (Wall Paintings) देखने को मिलते हैं।
राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय एवं उनकी विशेषताएँ
1. मण्डोर संग्रहालय, जोधपुर
- स्थापना: इसकी स्थापना सन् 1968 में जोधपुर के जनाना बाग के प्राचीन महलों में की गई थी।
- संग्रह: यहाँ वास्तुकला, मूर्तिकला के अवशेष, शिलालेख, चित्र, खुदाई से प्राप्त वस्तुएँ और हस्तकला का बेहतरीन संग्रह है。
2. राजकीय संग्रहालय, उदयपुर
- इतिहास: इसकी शुरुआत 1873 में हुई, लेकिन मुख्य विकास महाराणा सज्जन सिंह के काल में हुआ। 1887 में महाराणा फतहसिंह ने सज्जन निवास में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया।
- स्थानांतरण: 1968 में इसे राजमहल के 'कर्ण विलास' में स्थानांतरित कर प्रताप संग्रहालय नाम दिया गया, जिसे अब राजकीय संग्रहालय के नाम से जाना जाता है।
- विशेषता: यहाँ मेवाड़ की पगड़ियाँ, अस्त्र-शस्त्र और शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) की वह पगड़ी रखी है जो उन्होंने महाराणा कर्णसिंह के समय बदली थी। यहाँ चित्रकार साहिबदीन द्वारा बनाए गए प्रसिद्ध लघु चित्र (जैसे गीत-गोविन्द, पृथ्वीराज रासो) भी सुरक्षित हैं।
3. बीकानेर संग्रहालय (गंगा गोल्डन म्यूजियम)
- उद्घाटन: इसकी स्थापना 5 नवम्बर 1937 को हुई और उद्घाटन तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा किया गया था।
- संग्रह: यहाँ ऊँट की खाल से निर्मित सामग्री, शुतुरमुर्ग के अंडों पर कलाकारी, और कालीबंगा व पीलीबंगा जैसी प्राचीन सभ्यताओं से प्राप्त आभूषण रखे गए हैं।
4. राजकीय संग्रहालय, चित्तौड़गढ़
- स्थान: इसकी स्थापना 1968 में दुर्ग स्थित "फतहप्रकाश" महल में की गई थी।
- संग्रह: यहाँ लगभग 640 पाषाण प्रतिमाएँ, 18 धातु प्रतिमाएँ, 100 लघु चित्र और 2060 प्राचीन सिक्के संरक्षित हैं।
5. राजकीय संग्रहालय, अजमेर (राजपूताना म्यूजियम)
- स्थापना: इसकी स्थापना 19 अक्टूबर 1908 को अकबर के किले (मैगजीन) में की गई थी।
- ऐतिहासिक महत्व: इसी किले में सर थॉमस रो ने जहाँगीर से भेंट की थी। यहाँ गुप्तकाल से लेकर 16वीं शताब्दी तक की मूर्तियाँ और शिलालेख मौजूद हैं।
6. राजकीय संग्रहालय, आहड़ (उदयपुर)
- स्थान: यह आयड़ नदी के किनारे प्राचीन टीले (धूलकोट) पर स्थित है।
- खुदाई: यहाँ सर्वप्रथम खुदाई अक्षय कीर्ति व्यास के नेतृत्व में और बाद में 1961-62 में डॉ. एच. डी. सांकलिया के नेतृत्व में हुई।
- विशेषता: यह ताम्र-पाषाण युगीन सभ्यता का केंद्र है, जहाँ से रंगे हुए लाल और काले मृदपात्र (मिट्टी के बर्तन) प्राप्त हुए हैं।
7. राजकीय संग्रहालय, भरतपुर
- स्थापना: इसे 1944 में किले के अंदर 'कचहरी कला' (दरबार हॉल) में स्थानांतरित किया गया।
- प्रमुख प्रतिमाएँ: यहाँ एक मुखी शिवलिंग (कुषाण काल), बोधिसत्व मैत्रेय, और 10वीं शताब्दी की 'चक्रेश्वरी देवी' की प्रतिमा विशेष रूप से दर्शनीय है।
8. सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय, जयपुर
- स्थापना: इसकी स्थापना 1959 में जयपुर के राज प्रासाद (City Palace) में की गई थी।
- स्थान: इसका मुख्य मुख्यालय "मुबारक महल" में है, जहाँ ऊपरी मंजिल पर प्राचीन वस्त्र प्रदर्शित किए गए हैं।
विशेष:
- सर-छोटूराम स्मारक संग्रहालय: यह हनुमानगढ़ जिले के सांगरिया में स्वामी केशवानन्द जी द्वारा स्थापित किया गया है।
राजस्थान की प्रमुख सांस्कृतिक विरासत एवं संग्रहालय
1. वस्त्र एवं हस्तशिल्प (सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय)
- बिछायत: 1736 में निर्मित सवाई जयसिंह की बिछायत (नीले मखमल की) यहाँ सुरक्षित है। इसके अलावा कश्मीरी शॉल, रजाईयाँ, अंगरखियाँ और चौगा आदि भी रखे गए हैं।
- मशरू वस्त्र: यह रेशम और सूती धागों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें बुनाई साटन की होती है, जिसमें रेशमी धागा ऊपर और सूती धागा नीचे रहता है।
2. अलवर रियासत का 'कुतुबखाना' (पुस्तकालय)
- स्थापना: इसकी स्थापना महाराज विनयसिंह के शासनकाल में (संवत् 1894) की गई थी।
- प्रमुख चित्रकार: महाराज बख्सावरसिंह के समय चित्रकला पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रमुख चित्रकारों में डालचन्द्र (राजपूत शैली), बलदेव (मुगल शैली) और शालिग्राम शामिल थे।
- विशेष संग्रह: यहाँ 'शेखसादी' की नायाब रचना 'गुलिस्तां' की चरबा प्रति सुरक्षित है। इसे 1840 में जवाहरतों की स्याही से 'मिर्जा आगा खाँ' द्वारा तैयार किया गया था, जिसे बनाने में 16 वर्ष लगे।
3. दिलाराम बाग संग्रहालय, आमेर (जयपुर)
- स्थापना: इसकी स्थापना 1940 में हवामहल में की गई थी, जिसे बाद में आमेर के 'दिल-ए-आराम बाग' भवन में स्थानांतरित कर दिया गया।
- संग्रह: यहाँ रेड्ढ, बैराठ और सांभर के उत्खनन से प्राप्त सामग्री संग्रहित है। साथ ही, महाकवि बिहारी की प्रसिद्ध रचना 'सतसई' पर आधारित चित्र भी प्रदर्शित हैं।
4. जनजाति संग्रहालय, उदयपुर
- उद्देश्य: राज्य की विभिन्न जनजातियों की संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को संरक्षित करने के लिए माणिक्य लाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान द्वारा 30 सितम्बर 1983 को इसकी स्थापना की गई।
5. अन्य महत्वपूर्ण संग्रहालय
- बागोर की हवेली संग्रहालय (उदयपुर): यह पिछोला झील के किनारे स्थित है, इसकी स्थापना 1997 में की गई थी。
- मुकुट सरदार संग्रहालय (जोधपुर): महाराजा सरदार सिंह द्वारा 1909 में स्थापित। 1917 में सुमेरसिंह ने अपने पिता के नाम पर इसका नाम 'सरदार संग्रहालय' रखा।
- झालावाड़ का राजकीय संग्रहालय: श्री भवानीसिंह द्वारा 1 जून, 1915 को स्थापित। यहाँ 'लकुलीश' (8वीं-9वीं शताब्दी) और 'अर्द्धनारीश्वर' जैसी दुर्लभ पाषाण प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। 'अर्द्धनारीश्वर' प्रतिमा को 1982 में लंदन के भारत महोत्सव में भी दिखाया गया था।
- पाली संग्रहालय (श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय): इसकी स्थापना 20 अप्रैल, 1982 को हुई। यहाँ पाषाणकालीन उपकरणों (हैंड एक्स, स्क्रेपर) के साथ-साथ सुगाली माता (काली प्रतिमा) और विभिन्न खनिजों का संग्रह है।
1. जवाहर कला केन्द्र (जयपुर)
- उद्देश्य: यह प्रदर्शनकारी कलाओं जैसे नृत्य, संगीत, नाट्य, चित्र और मूर्तिकला से जुड़ी एक प्रमुख संस्था है।
- स्थापना: इसका औपचारिक उद्घाटन 8 अप्रैल, 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा द्वारा किया गया था।
2. लोक कला केन्द्र संग्रहालय (उदयपुर)
- स्थापना: भारतीय लोक कला मण्डल की स्थापना 22 फरवरी, 1952 को पद्म श्री देवी लाल सामर द्वारा की गई।
- उपलब्धि: 1965 में 'बुखारेस्ट' में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कठपुतली समारोह में इस संस्थान ने प्रथम स्थान प्राप्त किया था।
- संग्रहालय: यहाँ लोक कलाओं को समर्पित एक संग्रहालय की स्थापना सन् 1963 में की गई थी।
3. कालीबंगा संग्रहालय (हनुमानगढ़)
- स्थापना: सन् 1985 में कालीबंगा सभ्यता के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए इसकी स्थापना की गई।
- प्रमुख अवशेष:
- खुदाई से प्राप्त मृदभाण्ड (मिट्टी के बर्तन), तांबे के शस्त्र, कुल्हाड़ी, और मिट्टी के पके हुए खिलौने।
- यहाँ पत्थर, कांच, हाथी दांत और धातुओं से बने 'मनके' (Beads) प्रदर्शित हैं।
- खेल सामग्री में शतरंज की गोटी और प्यादे भी यहाँ देखने को मिलते हैं।
4. श्री संजय शर्मा संग्रहालय (जयपुर)
- स्थापना: सन् 1955 में स्थापित।
- संग्रह: यहाँ लगभग एक लाख पाण्डुलिपियाँ (Manuscripts) और हजारों कलाकृतियाँ संग्रहित हैं, जिनमें पिछवइयाँ, पटचित्र और 'पेशगीरो' के चित्र शामिल हैं।
5. लोक वाद्यों का संग्रह (जोधपुर)
- स्थान: यह राजस्थान संगीत नाटक अकादमी में स्थित है।
- विशेषता: यहाँ पाबूजी के 'माटे' जैसे वाद्य यंत्र रखे गए हैं, जो जोधपुर, बीकानेर और नागौर क्षेत्रों में पाबूजी के पवाड़ों के साथ बजाए जाते हैं।
6. बी.जी. शर्मा संग्रहालय / चित्रालय (नाथद्वारा)
- स्थापना: 13 अप्रैल, 1993 को प्रसिद्ध चित्रकार बी.जी. शर्मा द्वारा स्थापित।
- विशेषता: यहाँ प्रदर्शित सभी चित्र एक ही कलाकार (बी.जी. शर्मा) द्वारा बनाए गए हैं।
- मुख्य आकर्षण: सूती कपड़े पर बनी 'पिछवई' जिसमें श्रीनाथ जी का अन्नकूट उत्सव दर्शाया गया है।
7. डूँगरपुर संग्रहालय
- स्थापना: सन् 1973 में।
- विशेषता: यहाँ देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ गहरे नीले रंग के स्थानीय पत्थर से बनी हैं, जिसे 'पेरवा' कहा जाता है। यहाँ गुप्तकालीन (5वीं-6वीं शताब्दी) प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित हैं।
8. प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान (जोधपुर)
- विवरण: यह राजस्थान की प्राचीन पाण्डुलिपियों और विद्या सामग्री का मुख्य भंडार है।
- शाखाएँ: इसकी छह उपशाखाएँ अलवर, जयपुर, कोटा, बीकानेर, उदयपुर और चित्तौड़गढ़ में स्थित हैं।
- इतिहास: 1950 में संस्कृत मण्डल के रूप में शुरू हुआ और 1955 में इसे पुनर्गठित किया गया। इसमें 'जिन विजय मुनि' की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
- शाखाओं का विवरण:
- बीकानेर शाखा: इसमें 19,838 ग्रंथ हैं, जिनमें से अधिकांश जैन धर्म और साहित्य से संबंधित हैं।
- चित्तौड़ शाखा: इसका निर्माण 1962-63 में 'जिन विजय मुनि' के प्रयासों से हुआ, जिसमें लगभग 5426 ग्रंथ हैं।
राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत एवं संग्रहालय
1. मेहरानगढ़ दुर्ग, जोधपुर
- विशेषता: यहाँ मोती महल में मारवाड़ रियासत के 12 ठिकानों के ठिकानेदारों की अलग-अलग कुर्सियाँ लगी हैं।
- शस्त्रागार: यहाँ अकबर द्वारा भेंट की गई 'मुग़लई तलवार' और तैमूर लंग द्वारा भेंट की गई वह तलवार रखी है जिस पर अरबी भाषा में कुरान की आयतें लिखी हैं।
- दौलतखाना: यहाँ 'लाल डेरा' नाम का शाही मुगल तम्बू और 'हाथी के होदे', पालखियाँ, व विभिन्न प्रकार के ताले प्रदर्शित हैं।
- महाडोल पालकी: इसे महाराजा अभयसिंह गुजरात के सरबुलंद खान को हराकर लाए थे।
2. राजकीय संग्रहालय, कोटा
- स्थापना: इसकी स्थापना डॉ. मथुरालाल शर्मा द्वारा 1946 में की गई थी और वर्तमान में यह 'ब्रज विलास भवन' में स्थित है।
- संग्रह: यहाँ हड़ौती क्षेत्र के मध्य पाषाण युग से लेकर गुप्तकाल तक की कला सामग्री, मिट्टी के शतरंज के पासे, और 'इण्डोसलेनियन' व 'गधिया प्रकार' के सिक्के मौजूद हैं।
3. जयपुर का केन्द्रीय संग्रहालय (अल्बर्ट म्यूजियम हॉल)
- इतिहास: इसका निर्माण महाराजा माधोसिंह द्वितीय के काल में हुआ और 1887 में सर एडवर्ड ब्रेडफोर्ड ने इसका उद्घाटन किया।
- वास्तुकला: यह हिंदू, इस्लामी और अंग्रेजी शैली का मिश्रण है, जिसे 'चन्दर' और 'तारा' नामक मिस्त्रियों ने बनाया था।
- विशेष आकर्षण: यहाँ ईरान का एक बहुमूल्य गलीचा है (28' x 12'), जिसे मिर्जा राजा जयसिंह को शाह ईरान द्वारा 1640 में भेंट किया गया था। इस गलीचे के एक इंच में 250 गाँठें हैं।
4. राजकीय संग्रहालय, अजमेर
- संग्रह: यहाँ गुप्तकाल से 16वीं शताब्दी तक की मूर्तियाँ, चौहान कालीन शिल्प और 'हरकेली नाटक' के अंश प्रदर्शित हैं।
- विशेषता: यहाँ मोहनजोदड़ो से प्राप्त सामग्री जैसे मिट्टी की चूड़ियाँ, शंख और हथियार भी सुरक्षित रखे गए हैं।
5. श्री सरस्वती पुस्तकालय, फतेहपुर (सीकर)
- महत्व: यहाँ दुर्लभ ग्रंथ और पांडुलिपियों का विशाल भंडार है।
- विशेष पुस्तकें: 1801 में लिखित 'ए स्टोरी ऑफ बुद्धिस्ट फिलॉसफी' (सिल्क पर प्रिंटेड) और 1908 का 'लैंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' यहाँ उपलब्ध हैं।
- ताड़पत्र: यहाँ बंगाल से मंगवाए गए लगभग 200 ताड़पत्र भी सुरक्षित हैं।
6. हवामहल राजकीय संग्रहालय, जयपुर
- लोकार्पण: 23 दिसंबर, 1983।
- संग्रह: यहाँ जैन तीर्थंकर सुमतिनाथ की प्रतिमा और गणेश्वर, जोधपुरा व बैराठ जैसी प्राचीन सभ्यताओं के पाषाण व लौह उपकरण प्रदर्शित हैं।
राजस्थान के प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र
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केन्द्र का नाम |
स्थान |
मुख्य कार्य/विशेषता |
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राजस्थान कथक केन्द्र |
जयपुर |
कथक नृत्य शिक्षा के शिविर आयोजित करना। |
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रूपायन संस्थान |
बोरून्दा (जोधपुर) |
राजस्थानी लोक गीतों, कथाओं और भाषाओं का संकलन (स्थापना: 1960)। |
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गुरुनानक संस्थान भवन |
जयपुर |
कला, संस्कृति और साहित्य का विकास। |
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राजस्थान कला संस्थान |
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कला के क्षेत्र में योगदान। |
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महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स |
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चित्रकला और रंगकार्य को प्रोत्साहित करना। |
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राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद् |
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खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन। |
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