राजस्थान के प्रमुख संगीत घराने, लोक गीत और संगीतज्ञ | लोक वाद्य यंत्र: प्रकार, नाम, विशेषताएँ और महत्व Part-2
राजस्थान के प्रमुख लोक गीत
राजस्थान की संस्कृति में लोक गीतों का विशेष स्थान है। इन्हें अलग-अलग अवसरों के आधार पर समझा जा सकता है:
1. विरह और प्रेम से संबंधित गीत
- ढोलामारू: यह सिरोही का लोकगीत है, जो ढोला-मारू की प्रेम कथा पर आधारित है।
- कुरजां: विरहिणी द्वारा कुरजां पक्षी के माध्यम से अपने प्रियतम को संदेश भेजने के लिए गाया जाता है।
- झोरावा: जैसलमेर जिले में पति के परदेश जाने पर उसके वियोग में गाया जाने वाला गीत है।
- सूंवटिया: भीलनी स्त्री द्वारा परदेश गए पति को संदेश भेजने हेतु गाया जाता है।
- कागा: विरहिणी नायिका कौए को उड़ाकर अपने प्रियतम के आने का शगुन मनाती है।
- मूमल: जैसलमेर की राजकुमारी मूमल पर आधारित यह एक ऐतिहासिक प्रेमाख्यान गीत है।
- सुपणा: विरहिणी के स्वप्न से संबंधित गीत है।
2. सामाजिक एवं मांगलिक गीत (विवाह व उत्सव)
- पावणा: नए दामाद के ससुराल आने पर स्त्रियों द्वारा भोजन के समय गाया जाता है।
- कामन: वर को जादू-टोने से बचाने के लिए गाए जाने वाले गीत।
- सीठणे: इन्हें 'गाली गीत' भी कहते हैं, जो विवाह के समय हंसी-ठिठोली के लिए गाए जाते हैं।
- बधावा गीत: शुभ कार्य संपन्न होने पर उल्लास व्यक्त करने के लिए गाया जाता है।
- जच्चा (होलर): बालक के जन्मोत्सव पर गाया जाने वाला गीत।
- बना-बनी व घोड़ी: विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले प्रमुख गीत हैं।
- जलो और जलाल: वधू पक्ष की स्त्रियाँ जब वर की बारात का डेरा देखने जाती हैं, तब यह गीत गाती हैं।
3. क्षेत्र विशेष और अन्य गीत
- गोरबंद: यह ऊँट के गले का आभूषण है। शेखावाटी और मरुस्थलीय क्षेत्रों में इसके निर्माण के समय यह गीत गाया जाता है।
- तेजा गीत: किसानों द्वारा खेती शुरू करते समय वीर तेजाजी की भक्ति में गाया जाने वाला प्रेरक गीत है।
- पीपली: रेगिस्तानी इलाकों (शेखावाटी, बीकानेर, मारवाड़) में वर्षा ऋतु और तीज के अवसर पर गाया जाता है।
- काजलियो: यह एक श्रृंगारिक गीत है, जो विशेषकर होली के अवसर पर गाया जाता है।
- हरजस: राजस्थानी महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले सगुण भक्ति लोकगीत हैं।
भारत और राजस्थान के प्रमुख संगीतज्ञ
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संगीतज्ञ |
प्रमुख योगदान और विवरण |
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सवाई प्रताप सिंह |
जयपुर नरेश, जिन्होंने 'राधागोविन्द संगीत सार' ग्रंथ की रचना करवाई। इनके दरबार में 22 विद्वानों की मंडली 'गंधर्व बाईसी' थी। |
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पं. विश्वमोहन भट्ट |
जयपुर के विश्व प्रसिद्ध सितारवादक। इन्होंने 'मोहन वीणा' का आविष्कार किया और 1994 में ग्रेमी पुरस्कार जीता। |
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अमीर खुसरो |
इन्होंने ईरानी और भारतीय शैलियों के समन्वय से 'हिन्दुस्तानी संगीत' और 'कव्वाली' शैली विकसित की। |
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पं. रविशंकर |
विश्व विख्यात सितार वादक, जिन्हें ग्रेमी पुरस्कार मिल चुका है। |
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पं. उदयशंकर |
उदयपुर में जन्मे प्रख्यात कत्थक एवं बेले नर्तक। |
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बन्नो बेगम |
जयपुर की प्रसिद्ध माँड गायिका। |
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जहीरुद्दीन व फैयाजुद्दीन डागर |
डागर घराने के प्रसिद्ध ध्रुपद गायक, जिन्होंने ध्रुपद को नया रूप दिया। |
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महाराजा अनूपसिंह |
बीकानेर के शासक जिनके दरबार में प्रसिद्ध संगीतज्ञ भावभट्ट थे। |
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पं. विष्णु नारायण भातखण्डे |
प्रसिद्ध संगीत सुधारक एवं प्रचारक। |
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राजा मानसिंह तोमर |
ग्वालियर के शासक, जिन्होंने बैजू बावरा के सहयोग से ध्रुपद गायन को बढ़ावा दिया। |
राजस्थान के लोक वाद्य (Folk Musical Instruments)
लोक संगीत और नृत्य में वाद्यों का विशेष महत्व है। इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
1. वाद्यों का वर्गीकरण (Classification)
- तत वाद्य (तार वाले): भपंग, इकतारा, सारंगी, तंदूरा, जंतर, रावणहत्था, चिकारा, चौतारा, दुतारा, कामायचा आदि।
- फूँक वाद्य / सुषिर वाद्य (हवा वाले): अलगोजा, शहनाई, पूँगी, बाँसुरी, मशक, बाँकिया, भूंगल, शंख, मोरचंग, सतारा, नड आदि।
- अवनद्ध वाद्य (चमड़े से मढ़े हुए): मृदंग, ढोलक, ढोल, नौबत, नगाड़ा, मादल, चंग, खंजरी, डफ, निशान, डमरू, कडी, घेरा आदि। ये पशुओं की खाल से बने होते हैं।
2. प्रमुख तत वाद्य (String Instruments)
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वाद्य यंत्र |
मुख्य विशेषताएँ |
कलाकार/क्षेत्र |
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इकतारा |
एक गोल तुम्बे में बाँस फँसाकर बनाया जाता है। इसे एक हाथ की उँगली से बजाया जाता है। |
नाथ, कालवेलिया और साधु-संन्यासी। |
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भपंग |
यह कटे हुए तुम्बे से बना होता है जिस पर चमड़ा मढ़ा होता है। इसमें जानवर की आँत का तार या प्लास्टिक की डोरी होती है। |
अलवर क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय। |
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सारंगी |
सागवान, खैर या रोहिड़ा की जड़ से बनी होती है। इसके तार बकरे की आँत के होते हैं और 'गज' में घोड़े की पूँछ के बाल होते हैं। |
मीरासी, लंगे, जोगी, मांगणियार कलाकार। |
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तंदूरा |
इसे निशान, वेणां और चौतारा भी कहते हैं। यह लकड़ी का बना होता है और पाँच-छह तार होते हैं। |
कामड़ और नाथ संप्रदाय के लोग (तेरहताली नृत्य में उपयोगी)। |
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जंतर |
वीणा के समान इसमें दो तुम्बे और बीच में बाँस की नली होती है। इसमें चार तार होते हैं। |
गुर्जर भोपे गले में डालकर इसे बजाते हैं। |
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रावणहत्था |
यह आधे कटे नारियल की कटोरी से बनाया जाता है जिस पर खाल मढ़ी होती है। इसे राजस्थान में 'ढफ' भी कहते हैं। |
राजस्थान का अत्यंत लोकप्रिय वाद्य। |
3. प्रमुख अवनद्ध वाद्य (Percussion Instruments)
- डेरू: डमरू से बड़ा आकार, आम की लकड़ी से बना। इसे भोपे, भील और गोगाजी के पुजारी बजाते हैं।
- खंजरी: चंग के समान लेकिन छोटे आकार का। कामड़, भील और कालवेलिया इसे बजाते हैं।
- डमरू: भगवान शिव का वाद्य माना जाता है। इसे प्रायः मदारी लोग बजाते हैं।
- मादल: मृदंग के समान आकृति लेकिन मिट्टी से बनी होती है। इसे 'शिव-गौरी' का वाद्य यंत्र माना जाता है।
- मृदंग: सुपारी, बड़ या सबन की लकड़ी से निर्मित। इसके एक मुँह को 'नर' और दूसरे को 'नारी' कहा जाता है।
- ताशा: चपटे और पतले नगाड़े जैसा, जिसका पेंदा ताँबे का होता है। इसका प्रयोग अक्सर जुलूस और विवाह उत्सवों में किया जाता है।
4. ऐतिहासिक संगीतज्ञ (Historical Musicians)
- तानसेन: मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक। ये ध्रुपद की 'गौहरवाणी' के विशेषज्ञ थे। इनका जन्म ग्वालियर के बेहट ग्राम में हुआ था और इनके गुरु स्वामी हरिदास थे।
- बैजू बावरा: ग्वालियर के शासक मानसिंह तोमर के दरबारी संगीतज्ञ और तानसेन के समकालीन थे। ये ध्रुपद गायन में सिद्धहस्त थे।
राजस्थान के लोक वाद्य: महत्वपूर्ण तथ्य और वर्गीकरण
1. फूँक वाद्य (सुषिर वाद्य)
ये वाद्य फूँक मारकर बजाए जाते हैं:
- बाँसुरी: यह बाँस से बनी होती है और इसमें स्वर के लिए छिद्र होते हैं।
- अलगोजा: यह बाँसुरी के समान होता है, लेकिन इसमें दो अलगोजे एक साथ मुँह में रखकर बजाए जाते हैं। यह ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है।
- शहनाई: चिलम जैसी आकृति वाला यह वाद्य सागवान या शीशम की लकड़ी से बनता है। इसे मांगलिक अवसरों पर 'नगारची' द्वारा बजाया जाता है।
- पूँगी: इसका निर्माण तुम्बे से किया जाता है और मुख्य रूप से कालवेलियों द्वारा साँप को मोहित करने के लिए बजाया जाता है।
- बाँकिया: पीतल से बना यह वाद्य एक बड़े बिगुल जैसा होता है, जिसका उपयोग मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
- भूंगल: यह भवाई जाति का प्रमुख वाद्य है, जो पीतल का बना होता है और रण-क्षेत्र (युद्ध भूमि) में बजाया जाता था।
- मशक: यह बकरी की खाल से बना एक थैलेनुमा साज है, जो अलवर और सवाईमाधोपुर क्षेत्र में लोकप्रिय है।
2. अवनद्ध वाद्य (खाल वाले वाद्य)
ये पशुओं की खाल से मढ़े होते हैं और चोट मारकर बजाए जाते हैं:
- नौबत: धातु की अर्ध-अण्डाकार कुण्डली पर भैंस की खाल मढ़कर बनाया जाता है। प्राचीन काल में इसका प्रयोग युद्ध के समय होता था, अब मंदिरों में होता है।
- नगाड़ा: यह नौबत से छोटा होता है। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है और शेखावाटी में राणा व मीरासी इसे बजाते हैं।
- ढोल: लोहे या लकड़ी के घेरे पर दोनों तरफ चमड़ा मढ़ा होता है। राजस्थान के अधिकांश लोक नृत्यों में इसे गले में डालकर बजाया जाता है।
- ढोलक: यह ढोल का छोटा रूप है, जिसे हाथों से बजाया जाता है। नट लोग और कठपुतली नाटकों में इसका प्रयोग अधिक होता है।
- चंग: यह विशेष रूप से होली के अवसर पर बजाया जाने वाला प्रमुख ताल वाद्य है।
3. अन्य प्रमुख वाद्य
- ताल वाद्य (मंजीरा): पीतल का बना गोल वाद्य, जिसका प्रयोग तेरहताली नृत्य और लोक नाट्यों में होता है।
- झाँझ: लकड़ी पर लोहे के गोल टुकड़ों वाला वाद्य, जिसे पाबूजी और डूंगजी-जंवारजी के भोपे बजाते हैं।
- शंख: यह समुद्र से प्राप्त जंतु का अंडा है, जिसे मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है।
विशेष तथ्य: महाभारत के शंख
महाभारत के युद्ध में प्रमुख योद्धाओं के पास अलग-अलग शंख थे:
- श्रीकृष्ण: पांचजन्य
- अर्जुन: देवदत्त
- युधिष्ठिर: अनन्तविजय
- भीम: पौण्ड
- नकुल: सुघोष
- सहदेव: मणिपुष्पक
राजस्थान के लोक वाद्य विशेष
लोक संगीत और नृत्य की मधुरता बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले यंत्रों को 'लोक वाद्य' कहा जाता है। ये मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं: तत्, अवनद्ध, घन और सुषिर।
1. प्रमुख 'तत्' वाद्य (तारों वाले यंत्र)
ये वाद्य तारों की सहायता से अँगुलियों या 'मिजराफ' से बजाए जाते हैं।
- कमायचा: यह 'सारंगी' के समान होता है जो शीशम, आम या रोहिड़ा की लकड़ी से बना होता है। इसमें 16 तार होते हैं और इसे 'गज' की सहायता से मांगणियार तथा लंगा जाति द्वारा बजाया जाता है।
- गुजरातन सारंगी: इसकी तबली लंबी चतुष्कोणी होती है और इसकी लंबाई लगभग 2 फीट होती है। इसे पश्चिमी राजस्थान के लंगा कलाकारों द्वारा बजाया जाता है।
- डेढ़ पसली सारंगी: इसकी तबली का एक भाग सपाट और अन्य भाग अर्द्ध गोलाकार होता है। इसका उपयोग 'गोडवाड़' क्षेत्र के हिन्दू-ढोलियों द्वारा किया जाता है।
- सिंधी सारंगी: इसकी तबली अपेक्षाकृत लंबी और बीच में संकड़ी होती है। इसे सर्वाधिक विकसित सारंगी माना जाता है जो शास्त्रीय सारंगी के नजदीक है।
- धानी सारंगी: यह लकड़ी से निर्मित होती है और इसमें मुख्य चार तार होते हैं। इसे भरतपुर-अलवर क्षेत्र के 'निहालदे जोगियों' द्वारा बजाया जाता है।
- गरासिया चिकारा: इसकी तुम्बी नारियल की पोली लकड़ी से बनाई जाती है। इसमें तीन तार होते हैं और इसे गरासिया जनजाति के भोपों द्वारा बजाया जाता है।
- भपंग: यह कद्दू या लकड़ी से बना होता है और छोटी ढोलक जैसा दिखता है। इसमें बीच में एक छेद करके तांत का तार फँसाया जाता है जिसे अँगुलियों की चोट (नखली) से बजाया जाता है।
- रवाब: यह सारंगी जाति का यंत्र है जिसमें 5 तार होते हैं। इसे बजाने के लिए 'नखली' (मिजराब) का प्रयोग होता है और यह मेवाड़ क्षेत्र में भाट व राव जाति में प्रसिद्ध है।
- केनरा (केंदरा): इसमें दो खोखली तुम्बियों के बीच दो तार खींचे होते हैं। इसे वागड़ क्षेत्र में आदिवासी रावल जोगी बजाते हैं।
- सुरिंदा: इसका ढांचा 'रोहिड़ा' की लकड़ी से बना होता है। इसे मारवाड़ के लंगा कलाकारों द्वारा 'सतारा' या 'मुरली' की संगत में बजाया जाता है।
2. प्रमुख 'अवनद्ध' वाद्य (चमड़े वाले यंत्र)
- चंग: यह लकड़ी से बना अष्टकोणीय वाद्य है, जिसके एक तरफ बकरी की खाल मढ़ी होती है। इसे कंधे पर रखकर बजाया जाता है और होली के अवसर पर इस पर धमाल व चलत के गीत गाए जाते हैं।
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