सिरोही और हाड़ौती (बूँदी) के चौहान वंश का इतिहास
राजस्थान की भूमि वीरता, बलिदान और सांस्कृतिक धरोहरों की जननी रही है। यहाँ के इतिहास में चौहान वंश का स्थान सर्वोपरि है। जब हम चौहानों की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान अजमेर के सपादलक्ष या रणथंभौर के हम्मीर देव पर जाता है, लेकिन चौहानों की दो अन्य शाखाओं—सिरोही के देवड़ा चौहान और हाड़ौती के हाड़ा चौहान—ने भी राजस्थान के राजनीतिक और सांस्कृतिक मानचित्र पर अमिट छाप छोड़ी है।
यह लेख इन दोनों राजवंशों की स्थापना, उनके महान शासकों, महत्वपूर्ण युद्धों, प्रशासनिक उपलब्धियों और स्थापत्य कला का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
भाग 1: सिरोही के देवड़ा चौहान वंश का इतिहास
सिरोही, जिसे प्राचीन काल में 'शिवपुरी' और 'अर्बुद प्रदेश' के नाम से जाना जाता था, अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसा एक रणनीतिक क्षेत्र रहा है।
1.1 स्थापना और प्रारंभिक संघर्ष (राव लुम्बा का काल)
सिरोही में चौहानों की 'देवड़ा' शाखा का शासन रहा। देवड़ा शाखा मूलतः जालोर के चौहानों से निकली थी।
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राव लुम्बा (1311 ई.): सिरोही के चौहान वंश के वास्तविक संस्थापक राव लुम्बा माने जाते हैं। इन्होंने जालोर के सोनगरा चौहानों की हार के बाद, चन्द्रावती के परमारों को पराजित किया और आबू एवं चन्द्रावती पर अपना अधिकार स्थापित किया।
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धार्मिक योगदान: राव लुम्बा ने माउंट आबू के प्रसिद्ध अचलेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, जो आज भी सिरोही की धार्मिक पहचान है।
1.2 मध्यकालीन विस्तार: शिवभान और सहसमल
जैसे-जैसे समय बीता, राजधानी की सुरक्षा के लिए नई बस्तियों की आवश्यकता हुई।
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राव शिवभान (1405 ई.): इन्होंने सरणवा की पहाड़ियों पर एक दुर्ग बनाया और 'शिवपुरी' नामक नगर बसाया। आज भी पुरानी सिरोही को शिवपुरी के संदर्भ में देखा जाता है।
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राव सहसमल (1425 ई.): इन्होंने वर्तमान सिरोही नगर की स्थापना की। सहसमल एक विस्तारवादी शासक थे, लेकिन उन्हें मेवाड़ के शक्तिशाली शासक राणा कुम्भा के सैन्य अभियानों का सामना करना पड़ा। कुम्भा ने आबू के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था, जिसे बाद में सिरोही के शासकों ने कड़ी मशक्कत के बाद वापस पाया।
1.3 राव लाखा और राव जगमाल
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राव लाखा (1451-1483): लाखा के समय सिरोही ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पाने का प्रयास किया। इन्होंने आबू पर पुनः अधिकार किया और प्रजा के कल्याण के लिए 'लाखनाव तालाब' का निर्माण करवाया।
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राव जगमाल: जगमाल ने मेवाड़ के साथ संबंधों को संतुलित करने का प्रयास किया। उन्होंने जालोर के मुस्लिम शासकों को पराजित कर यह सिद्ध किया कि सिरोही की सेनाएँ किसी से कम नहीं हैं।
1.4 खानवा का युद्ध और राव अखैराज
इतिहास में राव अखैराज को "उड़ना अखैराज" भी कहा जाता है।
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जब 1527 ई. में महाराणा सांगा ने मुगलों के खिलाफ 'पाती परवण' परंपरा के तहत राजपूतों को एकत्रित किया, तब अखैराज ने अपनी सेना के साथ खानवा के मैदान में वीरता दिखाई। यह सिरोही की राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण था।
1.5 राव सुरताण और दत्ताणी का ऐतिहासिक युद्ध (1583 ई.)
राव सुरताण सिरोही के इतिहास के सबसे स्वाभिमानी शासकों में से एक थे। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया था।
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दत्ताणी का युद्ध: अकबर ने सिरोही को जीतने के लिए जगमाल (महाराणा प्रताप के भाई) और रायसिंह को भेजा। 1583 ई. में दत्ताणी नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ।
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परिणाम: राव सुरताण ने मुगलों की विशाल सेना को धूल चटा दी। इस युद्ध में जगमाल मारा गया।
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सांस्कृतिक प्रभाव: सुरताण के दरबार में प्रसिद्ध कवि दुसा आढा रहते थे, जिन्होंने 'विरुद छतहरी' और 'किरतार बावनी' जैसे ग्रंथों की रचना की।
1.6 अंतिम काल और ब्रिटिश संधि
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राव शिवसिंह: 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मराठों और पिंडारियों के आक्रमणों ने सिरोही को कमजोर कर दिया। अंततः, अपनी सुरक्षा के लिए राव शिवसिंह ने 11 सितंबर 1823 को अंग्रेजों के साथ संधि की।
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महत्वपूर्ण तथ्य: सिरोही राजस्थान की अंतिम रियासत थी जिसने अंग्रेजों के साथ सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर किए।
भाग 2: हाड़ौती (बूँदी) के हाड़ा चौहानों का गौरव
हाड़ौती क्षेत्र (बूँदी, कोटा, झालावाड़ और बारां) अपने ऊबड़-खाबड़ रास्तों, घने जंगलों और चंबल नदी के प्रवाह के लिए जाना जाता है। यहाँ 'हाड़ा' चौहानों का अधिपत्य रहा।
2.1 स्थापना: राव देवा (1241 ई.)
बूँदी राज्य की स्थापना का श्रेय राव देवा (देवी सिंह) को जाता है।
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उस समय बूँदी पर 'मीणा' शासकों का अधिकार था। राव देवा ने अपनी कूटनीति और शक्ति से मीणा शासक जेता को पराजित किया और बूँदी को अपनी राजधानी बनाया। यहीं से 'हाड़ौती' नाम प्रसिद्ध हुआ।
2.2 स्थापत्य का उदय: बरसिंह हाड़ा
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तारागढ़ दुर्ग (1354 ई.): राव बरसिंह ने बूँदी की पहाड़ी पर एक विशाल किले का निर्माण करवाया, जिसे 'तारागढ़' कहा जाता है। यह किला अपनी रहस्यमयी सुरंगों और 'तिलिस्मी' बनावट के लिए जाना जाता है। कर्नल टॉड ने इस किले के महलों को राजस्थान के सर्वश्रेष्ठ महलों में से एक बताया है।
2.3 मुगल काल और राव सुरजन हाड़ा
राव सुरजन के काल में बूँदी का इतिहास एक नया मोड़ लेता है।
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रणथंभौर का समझौता (1569): अकबर ने जब रणथंभौर पर आक्रमण किया, तो सुरजन हाड़ा ने आमेर के मानसिंह की मध्यस्थता से अकबर से संधि कर ली।
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शर्तें: सुरजन हाड़ा ने कुछ विशेष सम्मानजनक शर्तें रखी थीं, जैसे—हाड़ा शासकों को मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाना पड़ेगा और उन्हें नगाड़े बजाने की अनुमति होगी।
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विद्वता: सुरजन हाड़ा स्वयं एक विद्वान थे। उनके संरक्षण में चंद्रशेखर ने 'सुरजन चरित्र' और 'हम्मीर हठ' जैसे महाकाव्य लिखे।
2.4 राव रतन सिंह और राव शत्रुशाल
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राव रतन सिंह: जहाँगीर ने इन्हें 'सरबुलंद राय' की उपाधि दी। इनके समय में ही बूँदी की चित्रकला शैली विकसित होना शुरू हुई।
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राव शत्रुशाल (छत्रसाल): ये शाहजहाँ के बहुत करीबी थे। 1658 में औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच हुए सामूगढ़ के युद्ध में ये दारा शिकोह की ओर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। बूँदी के '84 खंभों की छतरी' का इतिहास भी इन्हीं के वंशजों से जुड़ा है।
2.5 रानीजी की बावड़ी और राव अनिरुद्ध सिंह
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राव अनिरुद्ध सिंह के काल में बूँदी में स्थापत्य कला का चरम विकास हुआ। उनकी रानी नाथावती ने 'रानीजी की बावड़ी' का निर्माण करवाया, जिसे 'बावड़ियों का सिरमौर' कहा जाता है।
2.6 मराठा हस्तक्षेप और राव बुद्धसिंह
बूँदी का इतिहास इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यहाँ के उत्तराधिकार संघर्ष ने ही राजस्थान में मराठों को आमंत्रित किया।
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राव बुद्धसिंह और आमेर के सवाई जयसिंह के बीच विवाद के कारण, बुद्धसिंह की रानी (आनंद कंवरी) ने मराठा सरदार मल्हारराव होलकर को राखी भेजकर मदद मांगी। यह राजस्थान की राजनीति का एक निर्णायक मोड़ था।
2.7 आधुनिक बूँदी और महाराव रामसिंह हाड़ा
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महाराव रामसिंह: ये एक महान विद्वान और सुधारक थे। प्रसिद्ध कवि सूर्यमल मिश्रण (मिश्रण) इन्हीं के दरबारी कवि थे, जिन्होंने 'वंश भास्कर' और 'वीर सतसई' की रचना की।
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1857 की क्रांति: रामसिंह हाड़ा ने अंग्रेजों का खुलकर साथ नहीं दिया, बल्कि नैतिक रूप से क्रांतिकारियों का समर्थन किया, जिसके कारण अंग्रेज उनसे नाराज रहे।
भाग 3: कला, संस्कृति और स्थापत्य का तुलनात्मक विश्लेषण
सिरोही और बूँदी के शासकों ने केवल तलवार के दम पर नहीं, बल्कि अपनी कलम और वास्तुकला से भी इतिहास रचा।
3.1 चित्रकला (Painting)
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बूँदी शैली: यह शैली पशु-पक्षियों के चित्रण के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ की 'चित्रशाला' (महाराव उम्मेद सिंह द्वारा निर्मित) को "भित्ति चित्रों का स्वर्ग" कहा जाता है। इसमें सुनहरे रंगों और नीले आकाश का सुंदर प्रयोग मिलता है।
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सिरोही शैली: यहाँ की चित्रकला पर जैन शैली और स्थानीय लोक कला का प्रभाव अधिक दिखता है।
3.2 स्थापत्य कला (Architecture)
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बावड़ियाँ: बूँदी को 'City of Stepwells' कहा जाता है। यहाँ की नवलखा झील और शिकार बुर्ज स्थापत्य के बेजोड़ नमूने हैं।
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दुर्ग: जहाँ तारागढ़ (बूँदी) अपनी नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, वहीं अचलगढ़ (सिरोही) अपनी सामरिक स्थिति और मंदिरों के लिए जाना जाता है।
भाग 4: प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liners)
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सिरोही की स्थापना: 1425 ई. में सहसमल द्वारा।
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दत्ताणी युद्ध का नायक: राव सुरताण।
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बूँदी का तारागढ़: राव बरसिंह (1354 ई.)।
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राजस्थान में मराठों का प्रवेश: बूँदी रियासत के कारण।
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84 खंभों की छतरी: बूँदी में (राव अनिरुद्ध द्वारा निर्मित)।
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सूर्यमल मिश्रण: बूँदी के दरबारी कवि।
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अंतिम संधि: सिरोही रियासत (1823 ई.)।
निष्कर्ष
सिरोही और हाड़ौती के चौहानों का इतिहास वीरता के साथ-साथ कूटनीति और सांस्कृतिक संरक्षण का भी इतिहास है। जहाँ सिरोही के देवड़ाओं ने अपनी दुर्गम भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर मुगलों को कड़ी चुनौती दी, वहीं बूँदी के हाड़ाओं ने अपनी प्रशासनिक कुशलता और कलात्मक अभिरुचि से राजस्थान को समृद्ध किया।
आज भी बूँदी की बावड़ियाँ और सिरोही के मंदिर हमें उन महान शासकों की याद दिलाते हैं जिन्होंने अपने राज्य की सीमा से बढ़कर भारतीय संस्कृति की रक्षा की। परीक्षा की दृष्टि से इन दोनों राजवंशों की तिथियाँ, युद्ध और स्थापत्य कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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