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गुर्जर प्रतिहार वंश और परमार वंश

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By NotesMind

राजस्थान और उत्तर भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में गुर्जर-प्रतिहार और परमार वंश का उदय एक युगांतकारी घटना थी। 6वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक, इन राजवंशों ने न केवल अपनी तलवारों के दम पर साम्राज्य विस्तार किया, बल्कि अपनी कलम और वास्तुकला से भारतीय संस्कृति को अमर बना दिया। जहाँ प्रतिहारों ने 'म्लेच्छों के नाशक' के रूप में ख्याति प्राप्त की, वहीं परमारों ने 'विद्वानों के आश्रयदाता' के रूप में अपनी पहचान बनाई।


भाग 1: गुर्जर-प्रतिहार वंश (The Imperial Gurjar-Pratiharas)

1.1 उत्पत्ति के विविध मत और शोध

इतिहासकारों ने इस वंश की उत्पत्ति पर कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है:

  1. अग्निकुंड सिद्धांत (Agnikula Theory): चंदबरदाई ने 'पृथ्वीराज रासो' में लिखा कि जब राक्षसों का प्रभाव बढ़ा, तो ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया। उससे चार योद्धा निकले—प्रतिहार (द्वारपाल), परमार (शत्रु नाशक), चालुक्य और चौहान।

  2. लक्ष्मण वंशज सिद्धांत: ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार, वे भगवान राम के भाई लक्ष्मण के वंशज हैं। लक्ष्मण 'प्रतिहार' (रक्षक) थे, उसी दायित्व को इस वंश ने निभाया।

  3. विदेशी मत: कनिंघम और डॉ. डी.आर. भंडारकर इन्हें 'खजर' जाति का मानते हैं जो हूणों के साथ भारत आए थे।

1.2 मण्डोर शाखा का विस्तार (The Mandore Branch)

हरिश्चंद्र (रोहिल्लद्धि) ने मण्डोर को राजधानी बनाया। उनके चार पुत्रों (भोगभट्ट, कज्जक, रज्जिल और दद्द) ने मण्डोर के चारों ओर विशाल दीवार बनवाई। इस शाखा का कक्कुक एक अत्यंत विद्वान शासक हुआ, जिसने घटियाला के शिलालेख (861 ई.) उत्कीर्ण करवाए।

1.3 कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle)

कन्नौज उस समय 'सत्ता की धुरी' था। वत्सराज के समय शुरू हुआ यह संघर्ष 200 वर्षों तक चला।

  • प्रतिहार: अपनी सैन्य कुशलता के लिए प्रसिद्ध थे।

  • पाल: बंगाल की धन-संपदा के स्वामी थे।

  • राष्ट्रकूट: दक्षिण के अजेय योद्धा थे।

    अंततः, मिहिर भोज और महेन्द्रपाल के समय प्रतिहारों ने कन्नौज पर अपनी स्थायी सत्ता स्थापित कर ली।

1.4 प्रतापी शासकों का गहन विवरण

नागभट्ट प्रथम (730–760 ई.)

इन्होंने अरब सेनापति जुनैद को हराया। ग्वालियर प्रशस्ति में इन्हें 'इंद्र के दंभ का नाशक' कहा गया है। इन्होंने उज्जैन को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया।

मिहिर भोज (836–885 ई.)

मिहिर भोज का शासनकाल प्रतिहारों का 'चरमोत्कर्ष' था।

  • सैन्य शक्ति: उनके पास भारत की सबसे बड़ी घुड़सवार सेना थी।

  • धर्म: वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे, इसलिए 'आदिवराह' की उपाधि धारण की।

  • सिक्के: उनके समय के 'वराह द्रम्म' सिक्के व्यापारिक समृद्धि के प्रतीक थे।

महेन्द्रपाल प्रथम और राजशेखर

महेन्द्रपाल के समय राजशेखर ने 'कर्पूरमंजरी' नामक नाटक प्राकृत भाषा में लिखा। राजशेखर ने महेन्द्रपाल को 'रघुकुल तिलक' की संज्ञा दी।


भाग 2: परमार वंश (The Parmar Dynasty)

2.1 उदय और क्षेत्रीय विस्तार

परमारों का मूल पुरुष उपेंद्र (कृष्णराज) था। प्रतिहारों की कमजोरी का लाभ उठाकर इन्होंने मालवा में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। राजस्थान में इनकी तीन प्रमुख शाखाएँ थीं:

  1. आबू के परमार: जिनका प्रभाव सिरोही क्षेत्र पर था।

  2. जालौर के परमार: जो बाद में चौहानों द्वारा विस्थापित हुए।

  3. वागड़ के परमार: जिन्होंने डूंगरपुर और बांसवाड़ा पर राज किया।

2.2 आबू के परमार: वीर गाथा

आबू के परमारों ने सोलंकी राजाओं के साथ मिलकर विदेशी आक्रांताओं का डटकर मुकाबला किया।

  • धारावर्ष परमार: इनके बारे में कहा जाता था कि वे एक ही बाण से तीन भैंसों को भेद देते थे। इन्होंने कायदरा के युद्ध (1178 ई.) में मोहम्मद गौरी की सेना को धूल चटाई थी।

2.3 राजा भोज: एक महान बहुमुखी प्रतिभा

राजा भोज (1010-1055 ई.) परमार वंश के सबसे प्रतापी राजा थे।

  • साहित्यिक रचनाएँ: इन्होंने 'समरांगण सूत्रधार' (वास्तुकला), 'सरस्वती कंठाभरण' (व्याकरण) और 'राजमार्तंड' (योग) जैसे उच्च कोटि के ग्रंथ लिखे।

  • नगर निर्माण: इन्होंने भोपाल के पास भोजपुर नगर बसाया और वहाँ एक विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया।

  • उक्ति: उनकी मृत्यु पर कहा गया— "अद्य धारा निराधारा निरालंबा सरस्वती" (आज धार नगरी आधारहीन हो गई और सरस्वती निराश्रित हो गई)।


भाग 3: कला, स्थापत्य और सामाजिक संरचना

3.1 गुर्जर-प्रतिहार (महामारू) शैली

इस काल में मंदिरों का निर्माण ऊँची पीठिका (Jagati) पर होता था।

  • ओसियां (जोधपुर): यहाँ के सूर्य मंदिर और सच्चियाय माता का मंदिर स्थापत्य के बेजोड़ उदाहरण हैं।

  • आभानेरी (दौसा): यहाँ की 'चाँद बावड़ी' अपनी कलात्मक सीढ़ियों और स्थापत्य के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

3.2 परमार कालीन स्थापत्य (भूमिज शैली)

परमारों ने मंदिर निर्माण में 'भूमिज शैली' का विकास किया, जिसमें शिखर पर लघु शिखरों की कतारें होती हैं।

  • किराडू के मंदिर (बाड़मेर): इन्हें 'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है। इनका निर्माण परमार शासकों के काल में ही हुआ था।

  • अर्थुणा के मंदिर: यहाँ के मंदिर वागड़ के परमारों की कलात्मक रुचि को दर्शाते हैं।


भाग 4: पतन का विश्लेषण

  1. आंतरिक कलह: शासकों के कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण सामंत (चौहान, चंदेल) स्वतंत्र होने लगे।

  2. गजनवी और गौरी के आक्रमण: 1018 ई. में महमूद गजनवी द्वारा कन्नौज की लूट ने प्रतिहारों की कमर तोड़ दी।

  3. खिलजी का उदय: 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने मालवा के अंतिम परमार शासक महलकदेव को मारकर परमार सत्ता का अंत कर दिया।


भाग 5: परीक्षा के लिए विशेष तुलनात्मक सारणी

मुख्य बिंदु गुर्जर-प्रतिहार परमार वंश
प्रारंभिक स्थान मण्डोर (राजस्थान) मालवा (मध्य प्रदेश)
प्रसिद्ध राजधानी कन्नौज धार / चंद्रावती
प्रमुख उपाधि आदिवराह, निर्भयराज कविराज, प्रमभट्टारक
सांस्कृतिक प्रतीक चाँद बावड़ी, ओसियां मंदिर दिलवाड़ा मंदिर, भोजशाला
मुख्य शत्रु पाल और राष्ट्रकूट सोलंकी और चालुक्य

निष्कर्ष (Final Summary)

गुर्जर-प्रतिहार और परमार वंश का इतिहास यह सिद्ध करता है कि भारत का मध्यकाल केवल युद्धों का काल नहीं था, बल्कि यह बौद्धिक और कलात्मक पुनर्जागरण का युग भी था। इन वंशों ने जो नींव रखी, उसी पर आगे चलकर राजपूतों के अन्य गौरवशाली वंशों का निर्माण हुआ।

गुर्जर-प्रतिहार एवं परमार वंश — Important FAQs

FAQ 1. गुर्जर-प्रतिहार वंश की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत कौन-कौन से हैं?
उत्तर: गुर्जर-प्रतिहारों की उत्पत्ति के संबंध में अग्निकुंड सिद्धांत, लक्ष्मण वंशज सिद्धांत और विदेशी उत्पत्ति का मत प्रमुख हैं।

FAQ 2. अग्निकुंड सिद्धांत का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है?
उत्तर: अग्निकुंड सिद्धांत का उल्लेख चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ में मिलता है।

FAQ 3. अग्निकुंड सिद्धांत के अनुसार आबू पर्वत के यज्ञ से कितने योद्धा उत्पन्न हुए?
उत्तर: यज्ञ से चार योद्धा—प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान उत्पन्न हुए।

FAQ 4. गुर्जर-प्रतिहारों को लक्ष्मण का वंशज किस स्रोत में बताया गया है?
उत्तर: ग्वालियर प्रशस्ति में गुर्जर-प्रतिहारों को भगवान राम के भाई लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।

FAQ 5. मण्डोर शाखा के प्रारंभिक शासक कौन थे?
उत्तर: हरिश्चंद्र (रोहिल्लद्धि) मण्डोर शाखा के प्रारंभिक शासक थे।

FAQ 6. गुर्जर-प्रतिहार वंश के कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष में कौन-कौन से राजवंश शामिल थे?
उत्तर: त्रिपक्षीय संघर्ष गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट राजवंशों के बीच हुआ।

FAQ 7. त्रिपक्षीय संघर्ष का मुख्य केंद्र कौन-सा नगर था?
उत्तर: त्रिपक्षीय संघर्ष का मुख्य केंद्र कन्नौज था।

FAQ 8. नागभट्ट प्रथम की प्रमुख उपलब्धि क्या थी?
उत्तर: नागभट्ट प्रथम ने अरब सेनापति जुनैद को पराजित किया था।

FAQ 9. मिहिर भोज की प्रमुख उपाधि क्या थी?
उत्तर: मिहिर भोज ने ‘आदिवराह’ की उपाधि धारण की थी।

FAQ 10. मिहिर भोज के समय प्रतिहार साम्राज्य की क्या स्थिति थी?
उत्तर: मिहिर भोज के शासनकाल में गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।

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