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रणथम्भौर के चौहान वंश का इतिहास

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By NotesMind

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि ने सदियों से ऐसे योद्धाओं को जन्म दिया है जिन्होंने अपने स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। अरावली की दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित रणथम्भौर का दुर्ग केवल पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि चौहानों के उस अदम्य साहस का साक्षी है, जिसने दिल्ली सल्तनत के शक्तिशाली सुल्तानों के अहंकार को बार-बार चुनौती दी।

इस लेख में हम रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना से लेकर उसके पतन, विशेषकर हम्मीर देव चौहान के 'हठ' और 'शौर्य' का ऐसा गहन विश्लेषण करेंगे जो राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) और अन्य उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 'अंतिम मार्गदर्शिका' (Ultimate Guide) सिद्ध होगा।


अध्याय 1: रणथम्भौर के चौहानों का उदय और स्थापना

1.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजय भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय मानी जाती है। इस हार के बाद अजमेर और दिल्ली पर तुर्कों का अधिकार हो गया। लेकिन चौहानों की रक्त-धमनियों में बहने वाला वीरता का संचार अभी थमा नहीं था।

1.2 गोविन्दराज: एक नई शुरुआत (1194 ई.)

पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज को दिल्ली के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर का शासन सौंपा था, लेकिन उनके चाचा हरिराज ने विद्रोह कर दिया। शांति और एक स्वतंत्र राज्य की खोज में गोविन्दराज ने रणथम्भौर की ओर प्रस्थान किया।

  • स्थापना का वर्ष: 1194 ई.।

  • रणनीतिक महत्व: रणथम्भौर का दुर्ग अपनी भौगोलिक स्थिति (अरावली और विंध्याचल के संगम) के कारण अभेद्य था। यहाँ से चौहानों ने अपनी शक्ति को पुनर्गठित करना शुरू किया।


अध्याय 2: हम्मीर पूर्व के प्रतापी शासक (1194 - 1282)

गोविन्दराज के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने न केवल राज्य को संभाला, बल्कि दिल्ली सल्तनत के निरंतर हमलों का डटकर सामना किया।

2.1 वीर नारायण और इल्तुतमिश का संघर्ष

वीर नारायण इस वंश के एक साहसी योद्धा थे। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने रणथम्भौर को जीतने के कई प्रयास किए। जब वह युद्ध के मैदान में सफल नहीं हुआ, तो उसने छल का सहारा लिया। वीर नारायण को संधि के बहाने दिल्ली बुलाया गया और वहां उन्हें विष देकर मार दिया गया। यह घटना तुर्क शासकों की कूटनीति और छल को दर्शाती है।

2.2 वाग्भट्ट: राज्य का पुनरुद्धार

वीर नारायण की मृत्यु के बाद राज्य संकट में था, लेकिन उनके भाई वाग्भट्ट ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने मालवा के मार्ग से शक्ति संचित की और दिल्ली की सेनाओं को खदेड़ दिया। उनके समय में सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद और उसके सेनापति बलबन ने आक्रमण किए, लेकिन वाग्भट्ट ने अपनी छापामार युद्ध नीति से उन्हें सफल नहीं होने दिया।

2.3 जैत्रसिंह (जयसिंह): 32 वर्षों का न्यायप्रिय शासन

हम्मीर देव के पिता जैत्रसिंह ने 1250 से 1282 ई. तक शासन किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही अपने योग्य पुत्र हम्मीर को उत्तराधिकारी चुन लिया था। जैत्रसिंह ने मेवाड़ के शासकों को पराजित किया और अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। रणथम्भौर की '32 खंभों की छतरी' इन्हीं के 32 वर्षों के शासन का प्रतीक है।


अध्याय 3: हम्मीर देव चौहान - एक युगपुरुष (1282–1301)

हम्मीर देव चौहान का नाम लेते ही जहन में एक ऐसे योद्धा की छवि उभरती है जिसके लिए 'शरणागत की रक्षा' ही उसका परम धर्म था। उनका राज्यारोहण 1282 ई. में हुआ।

3.1 दिग्विजय अभियान और साम्राज्य विस्तार

हम्मीर देव ने अपनी गद्दी संभालते ही 'दिग्विजय' (चारों दिशाओं को जीतना) की नीति अपनाई।

  • धार का युद्ध: मालवा के परमार शासक भोज द्वितीय को पराजित किया।

  • मेवाड़ पर विजय: चित्तौड़ के शासक समर सिंह (रतन सिंह के पिता) को युद्ध में हराकर उनसे दंड (Tax) वसूला।

  • आबू और पुष्कर: इन क्षेत्रों के छोटे शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार करवाई।

  • कोटियज्ञ: अपनी विजयों के उपलक्ष्य में हम्मीर ने महान 'कोटियज्ञ' का आयोजन किया, जिसका पुरोहित विश्वरूप था।

3.2 जलालुद्दीन खिलजी का आक्रमण (1290-1292)

दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने जब हम्मीर की बढ़ती शक्ति को देखा, तो उसने रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया।

  1. झाईन का युद्ध: तुर्की सेना ने पहले 'झाईन' (रणथम्भौर की कुंजी) पर अधिकार किया।

  2. दुर्ग की घेराबंदी: जलालुद्दीन ने महीनों तक किले को घेरे रखा, लेकिन चौहानों की अभेद्य रक्षा दीवार को नहीं तोड़ सका।

  3. सुल्तान की हताशा: हार स्वीकार करते हुए जलालुद्दीन ने घेरा उठाया और अपनी बेइज्जती छिपाने के लिए कहा— "मैं ऐसे दस किलों को मुसलमान के एक इकबाल (बाल) के बराबर भी नहीं समझता।"


अध्याय 4: अलाउद्दीन खिलजी और रणथम्भौर का महासंग्राम (1301)

यह अध्याय राजस्थान के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा और हम्मीर का हठ टकराने वाले थे।

4.1 युद्ध के मुख्य कारण (Root Causes)

  1. महमूद शाह को शरण: अलाउद्दीन के मंगोल सेनापति महमूद शाह और केहब्रू ने विद्रोह कर दिया था। हम्मीर देव ने उन्हें अपने यहाँ शरण दी। अलाउद्दीन द्वारा मांगे जाने पर हम्मीर ने दो टूक जवाब दिया— "शरणागत की रक्षा करना चौहानों का धर्म है।"

  2. साम्राज्य विस्तार: अलाउद्दीन पूरे भारत को जीतना चाहता था।

  3. पुरानी हार का बदला: अपने चाचा जलालुद्दीन की हार का बदला लेना।

4.2 घेराबंदी और विश्वासघात

अलाउद्दीन ने उलुग खान और नुसरत खान को विशाल सेना के साथ भेजा। रणथम्भौर के पास भीषण युद्ध हुआ जिसमें खिलजी का मुख्य सेनापति नुसरत खान पत्थर लगने से मारा गया। इससे तुर्की सेना में भगदड़ मच गई।

अंत में स्वयं अलाउद्दीन खिलजी को रणथम्भौर आना पड़ा। जब एक साल तक घेरा डालने के बाद भी वह सफल नहीं हुआ, तो उसने छल किया। उसने हम्मीर के दो सेनापतियों रणमल और रतिपाल को लालच दिया। इन गद्दारों ने किले के गुप्त रास्तों और खाद्य आपूर्ति की जानकारी सुल्तान को दे दी।


अध्याय 5: प्रथम साका और जौहर (1301 ई.)

जुलाई 1301 में स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई। किले के भीतर अनाज खत्म हो गया। अमीर खुसरो लिखता है कि "सोने के दो दानों के बदले चावल का एक दाना भी नसीब नहीं हो रहा था।"

5.1 रानी रंगदेवी का जौहर

जब जीत की कोई उम्मीद नहीं बची, तो राजपूत ललनाओं ने अपनी अस्मत बचाने का निर्णय लिया। रानी रंगदेवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पदमला तालाब में कूदकर जल जौहर (कुछ मतों के अनुसार अग्नि जौहर) किया। यह राजस्थान के इतिहास का प्रथम साका कहलाता है।

5.2 केसरिया और हम्मीर का बलिदान

हम्मीर देव ने अपने परिवार और शरणागत मंगोलों के साथ अंतिम युद्ध किया। महमूद शाह ने भी सुल्तान के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए, जो हम्मीर की उदारता के प्रति उसकी वफादारी थी। हम्मीर देव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 11 जुलाई 1301 को रणथम्भौर पर खिलजी का झंडा फहरा गया।


अध्याय 6: प्रशासनिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विकास

रणथम्भौर केवल युद्धों का केंद्र नहीं था, बल्कि कला और साहित्य का भी पोषण केंद्र था।

6.1 स्थापत्य कला

  • रणथम्भौर दुर्ग: यह एक 'एरण दुर्ग' और 'गिरि दुर्ग' का मिश्रण है। अबुल फजल ने इसके बारे में कहा है— "बाकी सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह बख्तरबंद है।"

  • गणेश मंदिर: यहाँ विश्व प्रसिद्ध 'त्रिनेत्र गणेश मंदिर' स्थित है।

  • न्याय की छतरी: हम्मीर ने अपने पिता की याद में बनवाई, जहाँ बैठकर वे जनता का न्याय करते थे।

6.2 साहित्य और विद्वान

हम्मीर देव स्वयं एक उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने 'श्रृंगार हार' नामक ग्रंथ की रचना की। उनके दरबार में:

  • राघवदेव: हम्मीर के गुरु।

  • बीजादित्य: प्रसिद्ध कवि।


अध्याय 7: रणथम्भौर के इतिहास के प्रमुख स्रोत (Table)

स्रोत का नाम लेखक महत्व
हम्मीर महाकाव्य नयनचन्द्र सूरी हम्मीर के जीवन का सबसे सटीक विवरण।
खजाइन-उल-फुतुह अमीर खुसरो अलाउद्दीन के आक्रमण का आंखों देखा हाल।
हम्मीर रासो जोधराज / सारंगधर राजस्थानी साहित्य में वीरता का चित्रण।
हम्मीर हठ चंद्रशेखर हम्मीर के हठी स्वभाव और युद्ध का वर्णन।
सुर्जन चरित्र चंद्रशेखर चौहानों की वंशावली की जानकारी।

अध्याय 8: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण 'वन-लाइनर' तथ्य

  1. स्थापना: 1194, गोविन्दराज।

  2. प्रथम साका: 1301, रानी रंगदेवी और हम्मीर देव।

  3. राजस्थान का एकमात्र जल जौहर: पदमला तालाब, रणथम्भौर।

  4. हम्मीर के गुरु: राघवदेव।

  5. हम्मीर की न्याय की छतरी: 32 खंभे।

  6. किले की कुंजी: झाईन दुर्ग।

  7. अलाउद्दीन का विद्रोही जिसे हम्मीर ने शरण दी: मुहम्मद शाह (मंगोल)।

  8. विश्वासघाती सेनापति: रणमल और रतिपाल।


निष्कर्ष: इतिहास का सबक

रणथम्भौर के चौहानों का पतन बाहरी शक्ति से अधिक आंतरिक विश्वासघात के कारण हुआ। हम्मीर देव चौहान आज भी राजस्थान के जन-मानस में अपनी वीरता से अधिक अपने 'हठ' और 'शरणागत वत्सलता' के लिए पूजे जाते हैं। उनका बलिदान यह सिखाता है कि सिद्धांतों के लिए सिंहासन का त्याग करना ही सच्ची क्षत्रियता है।

FAQ

Q1. रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना किसने की थी?
उत्तर: गोविन्दराज ने।

Q2. रणथम्भौर में चौहान सत्ता की स्थापना कब हुई?
उत्तर: 1194 ई.

Q3. गोविन्दराज किसके पुत्र थे?
उत्तर: पृथ्वीराज चौहान तृतीय के।

Q4. गोविन्दराज को अजमेर का शासन किसने सौंपा था?
उत्तर: कुतुबुद्दीन ऐबक ने।

Q5. गोविन्दराज रणथम्भौर क्यों गए?
उत्तर: उनके चाचा हरिराज के विद्रोह के बाद उन्होंने रणथम्भौर जाकर चौहान सत्ता को पुनर्गठित किया।


⚔️ हम्मीर से पहले के शासक

Q6. वीर नारायण का संघर्ष किस सुल्तान से हुआ था?
उत्तर: इल्तुतमिश से।

Q7. वीर नारायण की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर: दिए गए नोट्स के अनुसार, उन्हें संधि के बहाने दिल्ली बुलाकर विष देकर मार दिया गया।

Q8. वीर नारायण के बाद रणथम्भौर की शक्ति को किसने पुनर्जीवित किया?
उत्तर: वाग्भट्ट ने।

Q9. वाग्भट्ट ने किन दिल्ली सल्तनत के शासकों की सेनाओं का सामना किया?
उत्तर: नसीरुद्दीन महमूद और बलबन की सेनाओं का।

Q10. जैत्रसिंह का शासनकाल कितना था?
उत्तर: लगभग 32 वर्ष (1250–1282 ई.)

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