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राजस्थान में अंग्रेजों की स्थिति और 1857 की क्रांति

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By NotesMind
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राजस्थान में अंग्रेजों की स्थिति

राजस्थान में अंग्रेजों का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ा और 19वीं शताब्दी में यह क्षेत्र ब्रिटिश सत्ता के नियंत्रण में आता गया। प्रारंभ में अंग्रेजों ने व्यापार के माध्यम से भारत में प्रवेश किया, लेकिन समय के साथ उन्होंने राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ाया और विभिन्न रियासतों को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल करना शुरू किया। राजस्थान, जिसे उस समय राजपूताना कहा जाता था, अनेक स्वतंत्र रियासतों का समूह था। यहाँ अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष शासन के बजाय संधियों, कूटनीति और राजनीतिक नियंत्रण के माध्यम से अपना प्रभाव स्थापित किया। राजस्थान में अंग्रेजों की स्थिति को समझने के लिए निम्न प्रमुख घटनाएँ महत्वपूर्ण हैं।

1. अजमेर पर अंग्रेजों का अधिकार (1818 ई.)

1818 ईस्वी राजस्थान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है, क्योंकि इसी वर्ष अंग्रेजों ने दौलतराव सिंधिया को पराजित कर अजमेर क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया। अजमेर उस समय सामरिक, राजनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था।

मराठा शक्ति के कमजोर होने और अंग्रेजों की बढ़ती सैन्य शक्ति के कारण अंग्रेजों को अजमेर पर कब्जा करने का अवसर मिला। अजमेर पर अधिकार प्राप्त करना राजस्थान में अंग्रेजी प्रभाव की शुरुआत का प्रमुख चरण था। इससे अंग्रेजों को राजपूताना की रियासतों पर नजर रखने और हस्तक्षेप करने का अवसर मिला।

अजमेर अंग्रेजों के लिए केवल एक क्षेत्र नहीं बल्कि रणनीतिक केंद्र था। यहाँ से वे राजस्थान की विभिन्न रियासतों—जैसे मेवाड़, मारवाड़, जयपुर, बीकानेर आदि—पर नियंत्रण और प्रभाव स्थापित कर सकते थे। इसी कारण अजमेर को अंग्रेजों ने अपने प्रशासनिक और राजनीतिक विस्तार का आधार बनाया।

2. अजमेर बना अंग्रेजों का मुख्यालय (1832 ई.)

1832 ईस्वी में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने अजमेर को राजपूताना क्षेत्र में अंग्रेजों का मुख्यालय घोषित किया। यह निर्णय अंग्रेजी प्रशासन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे राजस्थान की रियासतों पर अंग्रेजी नियंत्रण और अधिक संगठित हो गया।

अजमेर को मुख्यालय बनाए जाने के साथ ही यहाँ गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि के रूप में जॉर्ज लॉरेन्स को प्रथम A.G.G. (Agent to the Governor General) नियुक्त किया गया।

A.G.G. (Agent to the Governor General) क्या था?

A.G.G. अंग्रेज सरकार का वह अधिकारी होता था जो राजपूताना की रियासतों पर निगरानी रखता था और ब्रिटिश हितों की रक्षा करता था। यह रियासतों और अंग्रेज सरकार के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करता था।

A.G.G. के प्रमुख कार्य

  • राजपूताना की रियासतों पर नजर रखना
  • शासकों की गतिविधियों की रिपोर्ट अंग्रेज सरकार को भेजना
  • संधियों का पालन करवाना
  • रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना
  • राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना

अजमेर मुख्यालय बनने के बाद अंग्रेजों का राजस्थान में प्रभाव काफी बढ़ गया और धीरे-धीरे अधिकांश रियासतें ब्रिटिश नियंत्रण में आ गईं।

3. A.G.G. मुख्यालय का माउंट आबू स्थानांतरण (1845 ई.)

1845 ईस्वी में A.G.G. का मुख्यालय अजमेर से माउंट आबू स्थानांतरित कर दिया गया। यह परिवर्तन प्रशासनिक सुविधा और सामरिक कारणों से किया गया।

माउंट आबू राजस्थान का पर्वतीय क्षेत्र है और प्राकृतिक रूप से सुरक्षित स्थान माना जाता था। यहाँ का मौसम भी अनुकूल था, इसलिए अंग्रेज अधिकारियों के लिए यह उपयुक्त केंद्र था।

माउंट आबू मुख्यालय बनाने के कारण

(1) सामरिक दृष्टि से सुरक्षित स्थान
माउंट आबू पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर था।

(2) प्रशासनिक सुविधा
यहाँ से राजपूताना की कई रियासतों पर नियंत्रण रखना आसान था।

(3) अंग्रेज अधिकारियों के लिए अनुकूल जलवायु
अजमेर की तुलना में माउंट आबू का मौसम ठंडा और आरामदायक था।

(4) राजनीतिक नियंत्रण
यहाँ से अंग्रेज रियासतों पर प्रभावी निगरानी रख सकते थे।

मुख्यालय स्थानांतरण के बाद अंग्रेजों की पकड़ राजस्थान की रियासतों पर और मजबूत हो गई। माउंट आबू आगे चलकर अंग्रेजी राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।

4. 1857 की क्रांति के समय राजस्थान का A.G.G. – पैट्रिक लॉरेन्स

1857 ईस्वी की क्रांति भारतीय इतिहास की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जानी जाती है। इस समय राजस्थान में A.G.G. पैट्रिक लॉरेन्स था।

जब 1857 की क्रांति शुरू हुई तो अंग्रेजों के लिए राजस्थान अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था क्योंकि यहाँ की रियासतों का समर्थन अंग्रेजों के लिए आवश्यक था। पैट्रिक लॉरेन्स ने कई रियासतों के शासकों को अंग्रेजों के पक्ष में बनाए रखने का प्रयास किया।

1857 में पैट्रिक लॉरेन्स की भूमिका

  • राजस्थान की रियासतों को अंग्रेजों के पक्ष में बनाए रखना
  • विद्रोह को फैलने से रोकना
  • अंग्रेजी सेना को सहायता उपलब्ध कराना
  • शासकों के साथ राजनीतिक समन्वय बनाए रखना

राजस्थान की अधिकांश रियासतों ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों का साथ दिया, जिसके कारण यहाँ विद्रोह सीमित रहा। इसमें A.G.G. पैट्रिक लॉरेन्स की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

राजस्थान में अंग्रेजी प्रभाव का महत्व

राजस्थान में अंग्रेजों की स्थिति मजबूत होने से कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए—

  • राजपूताना की रियासतें ब्रिटिश प्रभाव में आ गईं।
  • अंग्रेजों ने अप्रत्यक्ष शासन (Indirect Rule) की नीति अपनाई।
  • संधियों के माध्यम से शासकों को नियंत्रण में रखा गया।
  • राजनीतिक एजेंटों और A.G.G. के जरिए प्रशासनिक हस्तक्षेप बढ़ा।
  • 1857 की क्रांति में राजस्थान अंग्रेजों के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी क्षेत्र बना।

राजस्थान में अंग्रेजों की प्रमुख सैन्य छावनियाँ (बटालियन)

1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सत्ता को सुरक्षित बनाए रखने के लिए कई सैन्य छावनियाँ (Military Cantonments) और बटालियन स्थापित की हुई थीं। राजस्थान, जिसे उस समय राजपूताना कहा जाता था, राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था। यहाँ अनेक रियासतें होने के कारण अंग्रेजों ने प्रत्यक्ष शासन के बजाय सैन्य छावनियों, संधियों तथा राजनीतिक एजेंटों के माध्यम से अपना नियंत्रण बनाए रखा।

राजस्थान में स्थापित इन प्रमुख सैन्य छावनियों का मुख्य उद्देश्य शांति व्यवस्था बनाए रखना, विद्रोहों को दबाना, सीमाओं की सुरक्षा करना तथा रियासतों पर अंग्रेजी प्रभाव बनाए रखना था। 1857 की क्रांति के दौरान इन सैन्य इकाइयों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही।

1. मेर बटालियन

गठन

मेर बटालियन का गठन 1822-23 ईस्वी में अंग्रेजों द्वारा किया गया। इसका गठन मुख्यतः मेर जनजाति और आसपास के योद्धा समुदायों को संगठित करके किया गया था।

मुख्यालय

इसका मुख्यालय ब्यावर में स्थापित किया गया था। ब्यावर अंग्रेजों के लिए एक महत्वपूर्ण सैन्य और प्रशासनिक केंद्र था।

गठन का उद्देश्य

मेर क्षेत्र में अशांति और विद्रोही गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेजों ने इस बटालियन की स्थापना की। इसका उद्देश्य था—

  • क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना
  • अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह दबाना
  • राजपूताना में सैन्य नियंत्रण मजबूत करना
  • स्थानीय क्षेत्रों में शांति स्थापित करना

मेर बटालियन की विशेषताएँ

  • यह अंग्रेजों की प्रारंभिक सैन्य इकाइयों में से एक थी।
  • इसमें स्थानीय योद्धाओं की भर्ती की जाती थी।
  • यह अंग्रेजों के प्रति वफादार मानी जाती थी।

1857 की क्रांति में भूमिका

1857 की क्रांति के दौरान मेर बटालियन ने विद्रोह में भाग नहीं लिया। इस कारण अंग्रेजों को इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम चुनौती का सामना करना पड़ा।


2. शेखावाटी बटालियन ब्रिगेड

गठन

शेखावाटी बटालियन (Shekhawati Brigade) का गठन 1834 ईस्वी में किया गया।

मुख्यालय

इसका मुख्यालय सीकर था, जो शेखावाटी क्षेत्र का प्रमुख केंद्र था।

गठन का उद्देश्य

शेखावाटी क्षेत्र में अनेक जागीरदारों और ठिकानेदारों के विद्रोह तथा अशांति को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेजों ने इस बटालियन का गठन किया।

प्रमुख उद्देश्य

  • शेखावाटी क्षेत्र में व्यवस्था बनाए रखना
  • विद्रोही ठिकानों पर नियंत्रण रखना
  • अंग्रेजी प्रभाव को मजबूत करना
  • कर वसूली और प्रशासनिक सहायता देना

प्रमुख विशेषताएँ

इस बटालियन की कुछ विशेष विशेषताएँ थीं—

  • टूंगी और जबलहरी का संबंध शेखावाटी ब्रिगेड से था।
  • इसमें सीकर के बड़ौठ और पाटोदा गाँव के निवासी भी शामिल थे।
  • स्थानीय सैनिकों की भागीदारी के कारण यह क्षेत्रीय प्रभाव वाली सैन्य इकाई थी।

महत्व

शेखावाटी बटालियन ने अंग्रेजों को इस क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में सहायता प्रदान की और राजपूताना में अंग्रेजी शक्ति को मजबूत किया।


3. जोधपुर लीजन

गठन

जोधपुर लीजन का गठन 1835 ईस्वी में किया गया।

मुख्यालय

इसका मुख्यालय एरिनपुरा (Erinpura) में स्थापित किया गया था।

गठन का उद्देश्य

जोधपुर राज्य और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी नियंत्रण मजबूत करने के लिए इस सैन्य इकाई का गठन किया गया।

प्रमुख कार्य

  • सीमा सुरक्षा
  • रियासतों की निगरानी
  • सैन्य सहायता उपलब्ध कराना
  • विद्रोहों का दमन करना

महत्व

जोधपुर लीजन अंग्रेजों की प्रमुख सैन्य इकाइयों में से एक थी। इसने राजपूताना में अंग्रेजी शक्ति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एरिनपुरा छावनी अंग्रेजों के लिए रणनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यहाँ से वे मारवाड़ और आस-पास के क्षेत्रों पर नजर रख सकते थे।

1857 में भूमिका

1857 की क्रांति के दौरान जोधपुर लीजन से संबंधित घटनाएँ महत्वपूर्ण रही थीं और यह छावनी क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ी रही।


4. कोटा कंटिन्जेंट

गठन

कोटा कंटिन्जेंट का गठन 1838 ईस्वी में हुआ।

मुख्यालय

इसके तीन प्रमुख मुख्यालय थे—

  • नीमच
  • देवली
  • आगरा

गठन का उद्देश्य

यह अंग्रेजों की सहायक सैन्य व्यवस्था (Subsidiary Force) का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसका उद्देश्य था—

  • अंग्रेजी सेना को सहायता देना
  • विद्रोहों को दबाना
  • रियासतों की सुरक्षा करना
  • सामरिक नियंत्रण बनाए रखना

विशेषता

कोटा कंटिन्जेंट अंग्रेजी सैन्य व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई थी और इसे अंग्रेजी शक्ति के सहायक सैन्य बल के रूप में देखा जाता था।

1857 की क्रांति में भूमिका

1857 की क्रांति के दौरान कोटा कंटिन्जेंट की भूमिका उल्लेखनीय रही। विशेष रूप से कोटा क्षेत्र क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना।

इस कंटिन्जेंट का संबंध 1857 के कोटा विद्रोह से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।


5. मेवाड़ भील कोर

गठन

मेवाड़ भील कोर का गठन 1841 ईस्वी में किया गया।

मुख्यालय

इसका मुख्यालय खेरवाड़ा (उदयपुर) में था।

गठन का उद्देश्य

अंग्रेजों ने भील जनजाति को संगठित करके इस सैन्य कोर का निर्माण किया। इसका उद्देश्य था—

  • जनजातीय क्षेत्रों में शांति बनाए रखना
  • पहाड़ी क्षेत्रों पर नियंत्रण रखना
  • विद्रोहों को रोकना
  • अंग्रेजी सत्ता की रक्षा करना

विशेषताएँ

  • इसमें भील समुदाय के लोगों की भर्ती होती थी।
  • यह जनजातीय सैन्य इकाई थी।
  • पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता अधिक थी।

1857 की क्रांति में भूमिका

मेवाड़ भील कोर ने 1857 की क्रांति में भाग नहीं लिया। यह अंग्रेजों के प्रति वफादार बनी रही, जिससे अंग्रेजों को दक्षिणी राजस्थान में नियंत्रण बनाए रखने में सहायता मिली।

 


प्रमुख सैन्य छावनियों का सारांश

सैन्य छावनी/बटालियन

गठन वर्ष

मुख्यालय

1857 में भूमिका

मेर बटालियन

1822-23

ब्यावर

भाग नहीं लिया

शेखावाटी बटालियन

1834

सीकर

अंग्रेजी नियंत्रण मजबूत किया

जोधपुर लीजन

1835

एरिनपुरा

महत्वपूर्ण भूमिका

कोटा कंटिन्जेंट

1838

नीमच, देवली, आगरा

उल्लेखनीय भूमिका

मेवाड़ भील कोर

1841

खेरवाड़ा

भाग नहीं लिया

1857 की क्रांति के समय राजस्थान की 6 प्रमुख सैनिक छावनियाँ

1857 की क्रांति, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं थी बल्कि इसका प्रभाव राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) पर भी पड़ा। उस समय अंग्रेजों ने राजस्थान में अपनी सत्ता को मजबूत बनाए रखने के लिए कई महत्वपूर्ण सैन्य छावनियाँ स्थापित कर रखी थीं। ये छावनियाँ केवल सैनिक ठिकाने नहीं थीं, बल्कि अंग्रेजी शासन की सुरक्षा, नियंत्रण और विद्रोहों के दमन के प्रमुख केंद्र भी थीं।

राजस्थान में 1857 की क्रांति के समय 6 प्रमुख सैनिक छावनियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय थीं। इन छावनियों का क्रांति में अलग-अलग प्रकार से योगदान रहा।


1. नसीराबाद छावनी (अजमेर)

परिचय

नसीराबाद छावनी राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख अंग्रेजी सैन्य छावनियों में से एक थी। यह अजमेर जिले में स्थित थी और राजपूताना में अंग्रेजों की सबसे मजबूत सैन्य शक्ति का केंद्र मानी जाती थी।

तैनात सैन्य बल

यहाँ निम्न सैन्य टुकड़ियाँ तैनात थीं—

  • 30वीं पैदल बटालियन (30th Native Infantry)
  • 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (15th Bengal N.I.)

महत्व

नसीराबाद छावनी अंग्रेजों के लिए अत्यंत रणनीतिक थी क्योंकि—

  • यह राजपूताना की प्रमुख सैन्य छावनी थी।
  • यहाँ से अंग्रेज पूरे राजस्थान की गतिविधियों पर नजर रखते थे।
  • यह विद्रोह दमन का प्रमुख केंद्र थी।
  • उत्तर भारत और राजपूताना के बीच संपर्क केंद्र के रूप में कार्य करती थी।

1857 की क्रांति में भूमिका

1857 की क्रांति में नसीराबाद छावनी विद्रोह का प्रमुख केंद्र बनी। यहाँ सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया और यह राजस्थान में क्रांति की शुरुआत के महत्वपूर्ण केंद्रों में गिनी जाती है।


2. नीमच छावनी

परिचय

नीमच छावनी वर्तमान मध्यप्रदेश में स्थित है, लेकिन 1857 के समय इसका संबंध राजपूताना की सैन्य व्यवस्था से था।

तैनात सैन्य बल

यहाँ कोटा कंटिन्जेंट बटालियन तैनात थी।

महत्व

नीमच छावनी का महत्व इसलिए था क्योंकि—

  • यह अंग्रेजों की प्रमुख सैन्य चौकी थी।
  • मध्य भारत और राजस्थान को जोड़ने वाला सामरिक केंद्र था।
  • कोटा कंटिन्जेंट के संचालन का महत्वपूर्ण आधार था।

1857 में भूमिका

नीमच छावनी भी 1857 की क्रांति से प्रभावित हुई और विद्रोही गतिविधियों का केंद्र बनी। यहाँ की घटनाओं का प्रभाव राजस्थान के अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ा।


3. देवली छावनी (टोंक)

परिचय

देवली छावनी टोंक क्षेत्र में स्थित थी और अंग्रेजी सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

तैनात सैन्य बल

यह छावनी कोटा कंटिन्जेंट से संबंधित थी।

महत्व

देवली छावनी—

  • अंग्रेजों की सहायक सैन्य शक्ति का प्रमुख केंद्र थी।
  • टोंक तथा आसपास के क्षेत्रों में नियंत्रण बनाए रखने में सहायक थी।
  • विद्रोह की स्थिति में अंग्रेजी सेना के लिए सुरक्षा केंद्र का कार्य करती थी।

क्रांति में भूमिका

1857 की क्रांति के दौरान देवली छावनी की भूमिका उल्लेखनीय रही और यह अंग्रेजी सैन्य व्यवस्था का सक्रिय केंद्र रही।


4. एरिनपुरा छावनी (सिरोही-पाली)

परिचय

एरिनपुरा छावनी सिरोही-पाली क्षेत्र में स्थित थी और यह अंग्रेजों की प्रमुख सैन्य छावनियों में शामिल थी।

तैनात सैन्य बल

यहाँ जोधपुर लीजन तैनात थी।

महत्व

एरिनपुरा छावनी—

  • मारवाड़ क्षेत्र पर नियंत्रण का प्रमुख केंद्र थी।
  • अंग्रेजों की सैन्य शक्ति का मजबूत आधार थी।
  • राजपूताना में अंग्रेजी प्रभाव बनाए रखने में महत्वपूर्ण थी।

1857 की क्रांति में भूमिका

एरिनपुरा छावनी 1857 की क्रांति में अत्यंत महत्वपूर्ण रही। यहाँ जोधपुर लीजन से संबंधित विद्रोही गतिविधियाँ देखने को मिलीं।


5. ब्यावर छावनी (अजमेर)

परिचय

ब्यावर अंग्रेजों की महत्वपूर्ण सैन्य छावनी थी और मेर बटालियन का मुख्यालय यहीं था।

तैनात सैन्य बल

यहाँ मेर बटालियन तैनात थी।

महत्व

ब्यावर छावनी—

  • अंग्रेजी प्रशासन का सहायक सैन्य केंद्र थी।
  • अजमेर क्षेत्र में नियंत्रण बनाए रखने में उपयोगी थी।
  • मेर क्षेत्र की सुरक्षा के लिए स्थापित की गई थी।

1857 की क्रांति में भूमिका

मेर बटालियन ने 1857 की क्रांति में भाग नहीं लिया।

यह अंग्रेजों के प्रति वफादार रही, जिससे इस क्षेत्र में अंग्रेजी नियंत्रण बना रहा।


6. खेरवाड़ा छावनी (उदयपुर)

परिचय

खेरवाड़ा छावनी दक्षिणी राजस्थान में स्थित थी और जनजातीय क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण थी।

तैनात सैन्य बल

यहाँ मेवाड़ भील कोर स्थित थी।

महत्व

यह छावनी—

  • जनजातीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण थी।
  • अंग्रेजों की पर्वतीय क्षेत्रों पर पकड़ मजबूत करती थी।
  • भील क्षेत्र में विद्रोह रोकने में सहायक थी।

1857 में भूमिका

मेवाड़ भील कोर ने भी 1857 की क्रांति में भाग नहीं लिया।

इससे अंग्रेजों को दक्षिण राजस्थान में स्थिरता बनाए रखने में सहायता मिली।


राजस्थान की 6 प्रमुख सैनिक छावनियों का महत्व

इन छावनियों ने अंग्रेजों को—

  • सैन्य शक्ति बनाए रखने में मदद की
  • विद्रोहों को दबाने में सहायता दी
  • रियासतों पर नियंत्रण बनाए रखा
  • 1857 की क्रांति के दौरान रणनीतिक समर्थन दिया

सारांश तालिका

सैन्य इकाई

गठन वर्ष

मुख्यालय

क्रांति में भूमिका

मेर बटालियन

1822-23

ब्यावर

भाग नहीं लिया

शेखावाटी बटालियन

1834

सीकर

सीमित भूमिका

जोधपुर लीजन

1835

एरिनपुरा

महत्वपूर्ण

कोटा कंटिन्जेंट

1838

नीमच, देवली, आगरा

सक्रिय

मेवाड़ भील कोर

1841

खेरवाड़ा

भाग नहीं लिया


राजस्थान में 1857 की क्रांति : विभिन्न रियासतों के शासक, पॉलिटिकल एजेंट एवं प्रमुख विद्रोह

परिचय

1857 की क्रांति भारतीय इतिहास की एक महान और निर्णायक घटना थी, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है। इस क्रांति का प्रभाव केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) भी इससे अछूता नहीं रहा। राजस्थान की विभिन्न रियासतों में कहीं अंग्रेजों के प्रति निष्ठा दिखाई दी, तो कहीं शासकों, ठिकानेदारों और सैनिकों ने क्रांतिकारियों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन किया।

इस समय रियासतों के शासकों, अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंटों तथा सैनिक छावनियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। विशेष रूप से नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा तथा आऊवा जैसे केंद्र राजस्थान की क्रांति के प्रमुख आधार बने।


1857 की क्रांति के समय विभिन्न रियासतों के शासक एवं पॉलिटिकल एजेंट

1. मेवाड़ रियासत

शासक — महाराणा स्वरूप सिंह

1857 की क्रांति के समय मेवाड़ के शासक महाराणा स्वरूप सिंह थे। उन्होंने अंग्रेजों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे तथा खुलकर विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया।

पॉलिटिकल एजेंट — के. शावर्स

मेवाड़ में अंग्रेजों का राजनीतिक प्रतिनिधि के. शावर्स था, जो अंग्रेजी हितों की रक्षा और रियासत की गतिविधियों पर निगरानी रखता था।


2. मारवाड़  रियासत

शासक — तख्त सिंह

मारवाड़ के शासक तख्त सिंह थे। यद्यपि राज्य स्तर पर अंग्रेजों के प्रति सहयोग रहा, लेकिन मारवाड़ के कई ठिकानेदार, विशेषकर आऊवा के ठाकुर कुशलसिंह, क्रांति के प्रमुख नेता बने।

पॉलिटिकल एजेंट — मैक मोशन (मैक मेसन)

मारवाड़ का पॉलिटिकल एजेंट मैक मेसन था, जो बाद में चेलावास युद्ध में मारा गया।


3. जयपुर रियासत

शासक — रामसिंह द्वितीय

जयपुर के शासक रामसिंह द्वितीय थे। इन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया और क्रांति के प्रसार को रोकने का प्रयास किया।

पॉलिटिकल एजेंट — कर्नल ईडन

कर्नल ईडन जयपुर में अंग्रेजी हितों की रक्षा करने वाला प्रमुख अधिकारी था।


4. कोटा रियासत

शासक — रामसिंह द्वितीय

कोटा के शासक भी रामसिंह द्वितीय थे।

पॉलिटिकल एजेंट — मेजर बर्टन

मेजर बर्टन कोटा का अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट था और क्रांति के दौरान मारा गया।


5. भरतपुर रियासत

शासक — जसवंत सिंह

पॉलिटिकल एजेंट — मॉरिसन

भरतपुर में भी अंग्रेजी प्रभाव बना रहा और मॉरिसन अंग्रेजी प्रशासन का प्रतिनिधित्व करता था।


6. बीकानेर रियासत

शासक — सरदार सिंह

बीकानेर के शासक सरदार सिंह ने अंग्रेजों को समर्थन दिया।


7. करौली रियासत

शासक — मदन सिंह

करौली के शासक मदन सिंह थे।


नसीराबाद विद्रोह (28 मई 1857)

राजस्थान में क्रांति की शुरुआत

राजस्थान में 1857 की क्रांति की शुरुआत 28 मई 1857 को नसीराबाद छावनी से मानी जाती है। यह राजस्थान में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध पहला बड़ा सैनिक विद्रोह था।

विद्रोह की शुरुआत

इस विद्रोह का प्रारंभ 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री ने किया।

नेतृत्व

इस क्रांति का नेतृत्व बख्तावर सिंह ने किया।

अंग्रेज अधिकारियों की हत्या

क्रांतिकारियों ने दो अंग्रेज अधिकारियों—

  • स्पोटिसवुड (Spottiswoode)
  • न्यूबेरी (Newbery)

को मार गिराया।

दिल्ली की ओर प्रस्थान

18 जून 1857 को नसीराबाद के क्रांतिकारी दिल्ली की ओर रवाना हुए और बहादुर शाह ज़फर का समर्थन किया।

नसीराबाद विद्रोह का महत्व

  • राजस्थान में 1857 क्रांति का पहला बड़ा केंद्र
  • सैनिक विद्रोह का प्रारंभिक बिंदु
  • दिल्ली विद्रोह से सीधा जुड़ाव
  • राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त हुआ

नीमच विद्रोह (3 जून 1857)

विद्रोह की शुरुआत

नसीराबाद के बाद 3 जून 1857 को नीमच में विद्रोह शुरू हुआ।

नेतृत्व

इसका नेतृत्व किया—

  • तीरासिंह
  • मोहम्मद अली बेग

अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष

मोहम्मद अली बेग ने अंग्रेज अधिकारी एबॉट के समक्ष राजभक्ति की शपथ लेने से इंकार कर दिया, जो खुले विद्रोह का प्रतीक था।

अंग्रेज परिवारों को शरण

विद्रोह के दौरान—

  • चित्तौड़गढ़ के इंगला गाँव में
  • रधाराम किसान के घर

कुछ अंग्रेज परिवारों को शरण दी गई।

बाद में मेवाड़ महाराणा ने उन्हें पिछोला झील के जगमंदिर में आश्रय दिया।

महत्व

  • प्रमुख सैनिक विद्रोह
  • अंग्रेजों के विरुद्ध खुला असंतोष
  • क्रांति के प्रसार में योगदान

एरिनपुरा विद्रोह (21 अगस्त 1857)

राजस्थान का प्रमुख क्रांति केंद्र

एरिनपुरा को 1857 की क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

प्रारंभिक नेतृत्व

विद्रोह का नेतृत्व प्रारंभ में—

  • शीतल प्रसाद
  • तिलकराम
  • मोती खाँ

ने किया।

कुशलसिंह का नेतृत्व

बाद में क्रांतिकारी सैनिक खैरा में ठाकुर कुशलसिंह से मिले और नेतृत्व उन्हें सौंप दिया गया।

कुशलसिंह

  • आऊवा ठिकाने के जागीरदार
  • राजस्थान के प्रमुख क्रांतिकारी नेता

प्रसिद्ध नारा

"चलो दिल्ली, मारो फिरंगी"

यह नारा क्रांति का प्रतीक बन गया।

क्रांति केंद्र

कुशलसिंह ने निम्न मंदिरों को क्रांति केंद्र बनाया—

  • सुगाली माता मंदिर
  • काजेश्वर महादेव मंदिर

बिठौड़ा युद्ध (8 सितम्बर 1857)

परिचय

यह युद्ध क्रांतिकारियों और जोधपुर राज्य की सेना के बीच लड़ा गया महत्वपूर्ण युद्ध था।

नेतृत्व

क्रांतिकारी सेना

  • ठाकुर कुशलसिंह

जोधपुर सेना

  • अनाड़ सिंह

परिणाम

  • अनाड़सिंह पराजित और मारा गया
  • अंग्रेज अधिकारी हीथकोट भी मारा गया
  • क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़ा

महत्व

यह युद्ध आगे चलकर आऊवा विद्रोह की पृष्ठभूमि बना।


चेलावास (आऊवा) युद्ध (18 सितम्बर 1857)

युद्ध किसके बीच हुआ?

यह युद्ध लड़ा गया—

  • क्रांतिकारी सेना
  • जोधपुर राज्य की सेना
  • अंग्रेजों की संयुक्त सेना

नेतृत्व

क्रांतिकारी पक्ष

ठाकुर कुशलसिंह

संयुक्त सेना

A.G.G. पैट्रिक लॉरेन्स


युद्ध की प्रमुख घटनाएँ

अंग्रेजों को भारी क्षति

  • मारवाड़ का पॉलिटिकल एजेंट मैक मेसन मारा गया।
  • पैट्रिक लॉरेन्स को जान बचाकर भागना पड़ा।

अन्य नाम

चेलावास युद्ध को कहा जाता है—

  • आऊवा युद्ध
  • मारवाड़ का काला-गोरा युद्ध

मैक मेसन की स्मृति

मारवाड़ की खेजड़ी जाति आज भी मैक मेसन को लोकदेवता के रूप में पूजती है।


आऊवा पर अंग्रेजों का अधिकार

पुनः अंग्रेजी आक्रमण

अंग्रेज सेनापति लॉरेन्स ने पुनः हमला कर आऊवा क्रांति को दबाया।

आऊवा पर कब्जा

20 जनवरी 1860 को अंग्रेजों ने आऊवा पर अधिकार कर लिया।

कुशलसिंह का आत्मसमर्पण

8 अगस्त 1860 को ठाकुर कुशलसिंह ने आत्मसमर्पण किया।


टेलर आयोग

टेलर आयोग ने साक्ष्यों के अभाव में कुशलसिंह को क्रांति से जुड़े आरोपों से मुक्त कर दिया।


कुशलसिंह के बाद नेतृत्व

कुशलसिंह के बाद आऊवा क्रांति का नेतृत्व आसोप के जागीरदार शिवनाथ सिंह ने किया।


नीमच, एरिनपुरा एवं आऊवा विद्रोह का महत्व

प्रमुख बिंदु

✔ नसीराबाद के बाद क्रांति को गति मिली।
✔ कुशलसिंह जैसे स्थानीय क्रांतिकारी नेता उभरे।
✔ अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित सैन्य विद्रोह हुआ।
✔ “चलो दिल्ली मारो फिरंगी” जैसे नारों ने जनआंदोलन का रूप दिया।
✔ चेलावास युद्ध राजस्थान की क्रांति का निर्णायक संघर्ष बना।
✔ पैट्रिक लॉरेन्स को पीछे हटना पड़ा। 

 

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