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करौली और भरतपुर का गौरवशाली इतिहास: यादव एवं जाट राजवंश

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By NotesMind
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राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि ने अनेक राजवंशों को फलते-फूलते देखा है। जहाँ मेवाड़ के सिसोदिया और मारवाड़ के राठौड़ अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं पूर्वी राजस्थान (मत्स्य और शूरसेन क्षेत्र) में करौली के यादवों और भरतपुर के जाटों ने भारतीय इतिहास को एक नई दिशा दी। यह लेख इन दोनों रियासतों के उदय, उनके संघर्ष, स्थापत्य कला और आधुनिक भारत में उनके विलय की विस्तृत गाथा है।


करौली का यादव राजवंश (The Heritage of Yaduvanshi)

 पौराणिक उत्पत्ति और परिचय

करौली का यादव राजवंश स्वयं को चंद्रवंशी और भगवान श्रीकृष्ण का सीधा वंशज मानता है। ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र 'शूरसेन जनपद' का हिस्सा था, जिसकी राजधानी मथुरा हुआ करती थी। मध्यकाल में जब मुस्लिम आक्रमणों के कारण मथुरा असुरक्षित हो गई, तो यादवों की एक शाखा राजस्थान के बीहड़ों और पहाड़ियों की ओर बढ़ी।

  • शाखा: जादौन (यादव)।

  • कुलदेवी: कैला माता (त्रिकूट पर्वत पर स्थित)।

  • उपाधि: 'पाल' (इसका शाब्दिक अर्थ 'गोपालक' या रक्षक है)।

 प्रमुख शासक और ऐतिहासिक विकास

विजयपाल (संस्थापक - 1040 ई.)

विजयपाल को इस रियासत का 'आदि पुरुष' माना जाता है। उन्होंने मथुरा से पलायन कर बयाना (भरतपुर) को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया।

  • विजय मंदिर गढ़: इन्होंने बयाना की पहाड़ी पर एक विशाल दुर्ग बनवाया जिसे 'विजय मंदिर गढ़' कहा जाता है।

  • महत्व: यह दुर्ग उस समय सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह दिल्ली और मालवा के व्यापारिक मार्ग पर स्थित था।

तिमनपाल (तवनपाल)

विजयपाल के उत्तराधिकारी तिमनपाल ने राज्य का विस्तार किया।

  • तिमनगढ़ दुर्ग: इन्होंने करौली के पास 'तिमनगढ़' (तेहनगढ़) किले का निर्माण कराया। यह किला अपनी नक्काशी और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध था।

  • सांस्कृतिक प्रभाव: तिमनपाल के समय में यह क्षेत्र कला और संस्कृति का केंद्र बना।

कुंवरपाल और मुस्लिम आक्रमण

1196 ई. के आसपास, मोहम्मद गोरी ने बयाना और तिमनगढ़ पर आक्रमण किया। इसके बाद यादवों की शक्ति कुछ समय के लिए क्षीण हो गई और वे स्थानीय क्षेत्रों में सिमट गए।

महाराजा अर्जुनपाल (1327 ई.)

करौली के इतिहास में अर्जुनपाल का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता है।

  • पुनरुद्धार: इन्होंने मुस्लिमों से तिमनगढ़ वापस छीना और यादव वंश की खोई हुई प्रतिष्ठा बहाल की।

  • कल्याणपुरी की स्थापना: 1348 ई. में इन्होंने 'भद्रावती नदी' के किनारे 'कल्याणपुरी' नामक नगर बसाया, जिसे आज करौली के नाम से जाना जाता है।

  • अंजनी माता मंदिर: इन्होंने अपनी माता की स्मृति में इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण कराया।

महाराजा धर्मपाल II (1650 ई.)

इन्होंने करौली को औपचारिक रूप से अपनी राजधानी बनाया और शहर की किलेबंदी करवाई। इनके समय में प्रशासनिक व्यवस्था में काफी सुधार हुए।

महाराजा गोपाल पाल (17वीं शताब्दी)

गोपाल पाल के शासनकाल में करौली धार्मिक रूप से बहुत समृद्ध हुआ।

  • मदन मोहन मंदिर: इन्होंने जयपुर के राजाओं के सहयोग से मदन मोहन जी की प्रतिमा यहाँ स्थापित की। यह मंदिर आज भी 'गौड़ीय संप्रदाय' का एक प्रमुख केंद्र है।

महाराजा हरबक्षपाल (अंग्रेजों से संधि)

15 नवंबर 1817 को करौली राजस्थान की पहली रियासत बनी जिसने अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) के साथ 'अधीनस्थ पार्थक्य की संधि' (Subordinate Alliance) की।

महाराजा मदनपाल और 1857 की क्रांति

  • कोटा की सहायता: जब 1857 में कोटा के महाराव रामसिंह II को विद्रोहियों ने नजरबंद कर दिया था, तब मदनपाल ने अपनी सेना भेजकर उन्हें मुक्त कराया।

  • सम्मान: अंग्रेजों ने इनकी 'सलामी' 13 तोपों से बढ़ाकर 17 तोपों की कर दी और उन्हें 'G.C.S.I.' की उपाधि दी।


भरतपुर का जाट राजवंश (The Rise of Jat Power)

भरतपुर का इतिहास एक विद्रोही किसान शक्ति के साम्राज्य में बदलने की कहानी है। यह मुगलों के पतन के दौर में एक रक्षक के रूप में उभरा।

विद्रोह का सूत्रपात: गोकुल जाट और राजाराम

  • गोकुल जाट (1669): औरंगजेब की कट्टर नीतियों और भारी लगान के विरुद्ध तिलपत के जमींदार गोकुल ने विद्रोह किया। यद्यपि वे शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने जाटों में स्वाभिमान की लौ जला दी।

  • राजाराम (1687): इन्होंने विद्रोह को गोरिल्ला युद्ध में बदल दिया। राजाराम ने अकबर के मकबरे (सिकंदरा) को लूटा और कहा जाता है कि प्रतिशोध स्वरूप अकबर की अस्थियों को निकालकर जला दिया था।

 राज्य की स्थापना: चुडामन और बदनसिंह

  • चुडामन (1695-1721): चुडामन ने जाटों को एक संगठित सेना में बदला और 'थूण' के किले को अपना केंद्र बनाया। उन्हें 'जाट राज्य का संस्थापक' माना जाता है।

  • बदनसिंह (1723-1756): सवाई जयसिंह (जयपुर) की मदद से बदनसिंह शासक बने। उन्हें 'बृजराज' की उपाधि मिली। इन्होंने डीग, कुम्हेर और भरतपुर में किलों का निर्माण शुरू कराया।

स्वर्ण काल: महाराजा सूरजमल (1756-1763)

महाराजा सूरजमल को 'जाटों का प्लेटो' या 'अफलातून' कहा जाता है क्योंकि वे एक महान योद्धा होने के साथ-साथ अत्यंत चतुर राजनीतिज्ञ भी थे।

  • लोहागढ़ दुर्ग: सूरजमल ने भरतपुर में एक ऐसे किले का निर्माण कराया जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं। यह मिट्टी तोप के गोलों को सोख लेती थी, जिससे यह दुर्ग 'अजेय' बन गया।

  • डीग के जलमहल: इन्होंने डीग में भव्य महलों और उद्यानों का निर्माण कराया जो मुगल और राजपूत स्थापत्य का मिश्रण हैं।

  • राजनीतिक सूझबूझ: पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) में उन्होंने मराठों को सलाह दी थी, लेकिन मतभेदों के कारण वे अलग हो गए। युद्ध के बाद जब मराठा सैनिक घायल अवस्था में लौटे, तो सूरजमल और उनकी रानी किशोरी देवी ने हजारों सैनिकों की जान बचाई और उन्हें आश्रय दिया।

  • दिल्ली विजय: 1754 में इन्होंने दिल्ली पर आक्रमण कर उसे जीता और वहां से कीमती सामान (जैसे नूरजहाँ का झूला) भरतपुर ले आए।

महाराजा जवाहर सिंह (1764-1768)

सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए दिल्ली पर जोरदार हमला किया।

  • अष्टधातु दरवाजा: वे दिल्ली के लाल किले से ऐतिहासिक अष्टधातु के दरवाजे उखाड़कर भरतपुर ले आए। यह दरवाजा मूलतः चित्तौड़गढ़ किले का था, जिसे अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली ले गया था।

  • जवाहर बुर्ज: दिल्ली विजय की याद में भरतपुर किले में जवाहर बुर्ज का निर्माण कराया गया, जहाँ आज भी भरतपुर के राजाओं का राजतिलक होता है।

अंग्रेजों से संघर्ष: रणजीत सिंह

1803-1805 के दौरान भरतपुर और अंग्रेजों के बीच कड़ा संघर्ष हुआ।

  • यशवंतराव होल्कर को शरण: रणजीत सिंह ने अंग्रेज विरोधी मराठा सरदार होल्कर को शरण दी।

  • जनरल लेक की विफलता: अंग्रेज सेनापति लॉर्ड लेक ने लोहागढ़ किले पर 5 बार आक्रमण किया, लेकिन हर बार उसे हार का सामना करना पड़ा। अंततः अंग्रेजों को संधि करनी पड़ी।


स्थापत्य, संस्कृति और विरासत

प्रमुख दुर्ग और उनकी विशेषताएँ

  1. लोहागढ़ (भरतपुर): अभेद्य मिट्टी का किला। इसके चारों ओर एक गहरी खाई है जिसे 'सुजान गंगा नहर' से भरा जाता था।

  2. तिमनगढ़ (करौली): अपनी मूर्तिकला और 'नन्द-भोजाई के कुएं' के लिए प्रसिद्ध।

  3. डीग का किला: जलमहलों और फव्वारों के लिए प्रसिद्ध। यहाँ का 'गोपाल भवन' सबसे भव्य है।

धार्मिक महत्व

  • कैला माता मंदिर (करौली): यहाँ लक्खी मेला भरता है। यहाँ के 'लाँगुरिया' गीत विश्व प्रसिद्ध हैं।

  • मदन मोहन जी: करौली के शासकों के इष्ट देव।

  • गंगा मंदिर (भरतपुर): महाराजा बलवंत सिंह द्वारा शुरू किया गया एक अद्वितीय मंदिर जहाँ हिंदू धर्म के सभी देवताओं की मूर्तियां हैं।


आधुनिक राजस्थान में विलय

15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के बाद, इन रियासतों के विलय की प्रक्रिया शुरू हुई।

  • मत्स्य संघ (Matsya Union): 18 मार्च 1948 को करौली, भरतपुर, धौलपुर और अलवर को मिलाकर 'मत्स्य संघ' बनाया गया।

  • अंतिम शासक: भरतपुर के बृजेंद्र सिंह और करौली के गणेशपाल देव ने विलय पत्रों पर हस्ताक्षर किए।
     

    निष्कर्ष

    करौली के यादवों ने जहाँ अपनी धार्मिक कट्टरता और प्राचीन परंपराओं को अक्षुण्ण रखा, वहीं भरतपुर के जाटों ने उत्तर भारत की राजनीति में एक शक्तिशाली 'बफर स्टेट' के रूप में कार्य किया। इन दोनों राजवंशों का इतिहास आज भी राजस्थान की शौर्य गाथाओं में जीवंत है।

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