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राजस्थान की प्रमुख जनजातियाँ (Tribes of Rajasthan) – सहरिया, भील, सांसी, डामोर, कंजर पूरी जानकारी Part-2

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By NotesMind
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सांसी जनजाति (Sansi Tribe)

  • उत्पत्ति और क्षेत्र: ये मुख्य रूप से भरतपुर जिले में खानाबदोश जीवन व्यतीत करते हैं। इनकी उत्पत्ति 'सांसमल' नामक व्यक्ति से मानी जाती है।
  • उपजातियाँ: इनकी दो उपजातियाँ हैं— बीजा व माला
  • सामाजिक रीति-रिवाज: इनके यहाँ विवाह तय करने के लिए दो समूहों के बीच नारियल के गोले का लेनदेन करने की अनूठी रस्म है। इनका कोई स्थायी व्यवसाय नहीं है, ये छोटे-मोटे हस्तशिल्प पर निर्भर हैं।

सहरिया जनजाति (Sahariya Tribe)

भारत सरकार ने इसे राजस्थान की एकमात्र 'आदिम जनजाति समूह' (Primitive Tribal Group) की सूची में रखा है।

  • निवास: इनका 99.47% जमाव बारां जिले की शाहबाद और किशनगंज तहसीलों में है। सहरिया बस्ती को 'सहराना' और गाँव को 'सहरोल' कहते हैं।
  • आवास: इनके घर मिट्टी, पत्थर और घास के बने होते हैं जिन्हें 'टापरी' कहते हैं। पेड़ों पर बनाई गई मचाननुमा झोंपड़ी 'गोपना', 'कोरुआ' या 'टोपा' कहलाती है।
  • प्रशासन और आस्था:
    • 'चौरासिया पंचायत' इनकी सबसे बड़ी पंचायत है जिसकी बैठक सीताबड़ी में वाल्मीकि मंदिर में होती है।
    • ये महर्षि वाल्मीकि को अपना आदिगुरु मानते हैं।
    • तेजाजी इनके प्रिय लोकदेवता हैं जिनका स्थान (चबूतरा) हर सहराने में होता है।
  • मेले और उत्सव: कार्तिक पूर्णिमा को कपिलधारा का मेला भरता है। इनमें ब्रज की भांति लठमार होली की परंपरा प्रचलित है।
  • स्वभाव: ये बहुत संतोषी होते हैं और भीख माँगना बुरा मानते हैं।

भील जनजाति से जुड़ी अतिरिक्त शब्दावली

  • नतारा प्रथा: विधवा स्त्री का पुनर्विवाह।
  • छेड़ा फाड़ना: भीलों में तलाक की प्रक्रिया।
  • हाथी वैडो: वृक्षों (पीपल, सागवान आदि) को साक्षी मानकर किया जाने वाला विवाह।
  • ढालिया: भील घरों के बाहर स्थित 6-8 फीट लंबा बरामदा।

सहरिया जनजाति: महत्वपूर्ण शब्दावली एवं तथ्य

  • धारी संस्कार: मृत्यु के तीसरे दिन मृतक की अस्थियों और राख को साफ आँगन में बिछाकर ढक दिया जाता है। अगले दिन उस राख पर बने पदचिन्हों के आधार पर यह माना जाता है कि मृतक ने किस योनि में पुनर्जन्म लिया है।
  • हथाई: सहराना (बस्ती) के बीच में बनी एक छतरीनुमा गोल या चौकोर झोंपड़ी, जिसे 'बंगला' भी कहते हैं।
  • कुसिला एवं भड़ेरी: अनाज और घरेलू सामान सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी और गोबर से बनी सुंदर कोठियाँ। छोटी कोठी को 'कुसिला' और आटा रखने की कोठी को 'भड़ेरी' कहते हैं।
  • चौरासिया पंचायत: यह सहरिया समुदाय की सबसे बड़ी पंचायत है, जिसकी बैठक सीताबड़ी स्थित वाल्मीकि मंदिर में होती है।
  • वेशभूषा:
    • सलुका: पुरुषों की अंगरखी।
    • पंछा: घुटनों तक ऊँची धोती।
    • रेजा: विवाहित महिलाओं का विशेष वस्त्र।
    • खपटा: पुरुषों का साफा।

डामोर जनजाति (Damor Tribe)

  • क्षेत्र: मुख्य रूप से डूंगरपुर जिले की सीमलवाड़ा पंचायत समिति और बांसवाड़ा जिले में पाए जाते हैं।
  • उत्पत्ति: ये अपनी उत्पत्ति राजपूतों से बताते हैं क्योंकि इनके गोत्र राजपूतों से मिलते-जुलते हैं।
  • सामाजिक एवं धार्मिक जीवन:
    • इनमें पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था है।
    • ये 'कालिका माता' की पूजा करते हैं और रोगग्रस्त होने पर देवी को प्रसन्न करने के लिए झाड़-फूँक का सहारा लेते हैं।
    • अर्थव्यवस्था: 93% लोग कृषि कार्यों में संलग्न हैं। ये पशुधन की पूजा दीपावली पर करते हैं।
    • प्रमुख मेले: गुजरात के पंचमहल में भरने वाला 'झैलाबावसी' का मेला और डूंगरपुर में भरने वाला 'ग्यारस की रेवाड़ी' का मेला।

कंजर जनजाति (Kanjar Tribe)

  • उत्पत्ति: 'कंजर' शब्द संस्कृत के 'काननचार' से बना है, जिसका अर्थ है— जंगलों में विचरण करने वाला
  • सामाजिक विशेषताएँ:
    • इनमें जातीय एकता प्रबल होती है और ये 'पंचायत' के आदेशों को सर्वोपरि मानते हैं। इनके मुखिया को 'पटेल' कहा जाता है।
    • हाकम राजा का प्याला: किसी व्यक्ति की सच्चाई जानने के लिए उसे हाकम राजा का प्याला पिलाकर कसम खिलाई जाती है, जिसे कंजर जाति में सबसे बड़ी कसम माना जाता है।
    • पाती माँगना: अपराध करने से पूर्व ईश्वर का आशीर्वाद लेना 'पाती माँगना' कहलाता है।
    • मकान: इनके घरों में किवाड़ (दरवाजे) नहीं होते, लेकिन पीछे के भाग में एक खिड़की अवश्य होती है।

कथौड़ी जनजाति (Kathodi Tribe)

  • क्षेत्र और आजीविका: इनका बाहुल्य उदयपुर (कोटड़ा तहसील) और बारां जिले में है। इनका मुख्य कार्य खैर के पेड़ों से कत्था तैयार करना है।
  • विशेषताएँ:
    • खोलरा: घास-फूँस और बाँस से बने छोटे झोंपड़े, जिनकी ऊँचाई 4-5 फीट होती है।
    • फड़का: कथौड़ी स्त्रियों द्वारा मराठी अंदाज में पहनी जाने वाली साड़ी।
    • मुखिया: इनका मुखिया 'भोपा' या 'पटेल' कहलाता है।
    • वाद्य यंत्र: बाँस से बनी 'पावरी' और लौकी से बनी 'तारपी' इनके प्रमुख वाद्य यंत्र हैं।
  • संस्कार: बच्चे के जन्म पर 'सूरज पूजा' का बड़ा आयोजन होता है।

जनजातीय परंपरा (सामान्य):

  • नाता प्रथा: किसी स्त्री द्वारा अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ जीवन बिताने का समझौता।

आदिवासी सामाजिक परंपराएं एवं शब्दावली

  • दापा: वर पक्ष द्वारा वधू के पिता को दिया जाने वाला 'वधू मूल्य'।
  • हमलो: जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग और माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान, उदयपुर द्वारा आयोजित आदिवासी लोकानुरंजन मेला।
  • झगड़ा राशि: जब कोई पुरुष किसी दूसरे की स्त्री को भगा ले जाता है, तो पंचायत द्वारा निर्धारित वह राशि जो विवाहित पुरुष को दी जाती है।
  • छेड़ा फाड़ना: कुछ जनजातियों में तलाक की प्रक्रिया, जिसमें पुरुष नई साड़ी के पल्ले में रुपया बाँधकर उसे चौड़ाई की तरफ से फाड़कर स्त्री को पहनाता है।
  • नातरा प्रथा: विधवा स्त्री का पुनर्विवाह।
  • लोकाई (कांदिया): मृत्यु भोज की परंपरा।
  • हलमा: सामुदायिक सहयोग की परंपरा, जिसमें पूरा समुदाय मिलकर किसी एक व्यक्ति का काम पूरा करता है।
  • वार: सामुदायिक सुरक्षा का प्रतीक। संकट के समय 'मारूढोल' बजाकर लोगों को एकत्रित किया जाता है।
  • मेलनी: गाँव में किसी के यहाँ विवाह होने पर गाँव के लोग 10 किलो मक्का उपहार स्वरूप देते हैं।
  • गारिये का ढोल: किसी दुर्घटना के समय लोगों को सावधान करने के लिए लगातार बजाया जाने वाला ढोल।
  • हुण्डेला: दो या अधिक परिवारों द्वारा श्रम और साधनों का साझा उपयोग करने का अनौपचारिक समझौता।
  • बड़ालिया: वैवाहिक संबंधों में मध्यस्थता करने वाले मामा या फूफा को कहा जाता है।

ऐतिहासिक कुप्रथाओं पर प्रतिबंध

  • सती प्रथा: 1829 में विलियम बेंटिक के कानून के बाद, राजस्थान में सबसे पहले अलवर (1830) और जयपुर (1844 में मेजर जॉन लुडलो द्वारा) में इस पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • त्याग प्रथा: राजपूत जाति में विवाह के अवसर पर अन्य जातियों को दी जाने वाली दान-दक्षिणा। इस पर सर्वप्रथम जोधपुर राज्य ने 1841 में नियंत्रण लगाया।

आदिवासियों के प्रमुख वस्त्र

  • अंगोछा: सफेद रंग का वस्त्र जिसे पुरुष सिर पर बाँधते हैं।
  • अंगरखा (बदन): काले रंग का वस्त्र जिस पर सफेद धागे से कढ़ाई होती है।
  • जामसाई साड़ी: विवाह के समय पहनी जाने वाली साड़ी, जिसमें लाल जमीन पर फूल-पत्तियाँ बनी होती हैं।
  • नान्दणा (नान्दा): आदिवासियों का प्राचीनतम वस्त्र, जो नीले रंग की छींट से बना होता है और 'दाबू' पद्धति से छपाई होती है।
  • कटकी (पावनी भांत की ओढ़नी): अविवाहित युवतियों और बालिकाओं की ओढ़नी।
  • रेनसाई: लहंगे की छींट, जिसमें काले रंग की जमीन पर लाल और भूरे रंग की बूटियाँ होती हैं।
  • लूगड़ा (अंगोछा साड़ी): विवाहिताओं का पहनावा, जिसमें सफेद जमीन पर लाल बूटे होते हैं।
  • ज्वार भांत की ओढ़नी: सफेद जमीन पर ज्वार के दाने जैसी बिन्दियों वाली ओढ़नी।
  • तारा भांत की ओढ़नी: भूरी लाल जमीन वाली ओढ़नी जिसे आदिवासी स्त्रियाँ बहुत पसंद करती हैं।
  • चूनड़: लाल रंग की ओढ़नी जिस पर सफेद बिंदियाँ होती हैं, इसका निर्माण आहड़ में किया जाता है।

जनजाति विकास एवं योजनाएं

  • संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 46 के तहत कमजोर वर्गों के उत्थान का उत्तरदायित्व राज्यों को दिया गया है।
  • जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग: इसकी स्थापना 1975 में जयपुर में की गई थी, लेकिन 1978 में इसका मुख्यालय उदयपुर स्थानांतरित कर दिया गया। यह विभाग जनजातियों के सर्वांगीण विकास के लिए योजनाओं के निर्देशन और कार्यान्वयन का कार्य करता है।

जनजाति विकास के लिए क्षेत्र विकास दृष्टिकोण

राज्य में जनजातियों के उत्थान के लिए पाँच प्रकार के क्षेत्र विकास कार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं:

  1. जनजाति उपयोजना क्षेत्र (Tribal Sub-Plan - TSP): इसका गठन 1974-75 में किया गया। इसमें डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ (पूर्ण जिले), उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और सिरोही के कुछ क्षेत्र शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों में आर्थिक स्थिति सुधारना और समानता लाना है।
  2. MADA (Modified Area Development Approach): यह उपयोजना क्षेत्र से बाहर के उन खंडों के लिए है जहाँ जनसंख्या 10,000 से अधिक है और 50% से अधिक जनसंख्या जनजाति की है। यह कार्यक्रम 1978-79 में शुरू किया गया और इसमें 13 जिलों के 44 खंड शामिल हैं।
  3. MADA क्लस्टर (Cluster): यह उन क्षेत्रों के लिए है जहाँ 5,000 की जनसंख्या में से 50% अनुसूचित जनजाति हो। राज्य के 7 जिलों में 11 क्लस्टर स्वीकृत किए गए हैं।
  4. सहरिया विकास कार्यक्रम: यह बारां जिले की किशनगंज और शाहबाद तहसील के 435 गाँवों के लिए 1977-78 में शुरू किया गया था।
  5. बिखरी जनजाति विकास कार्यक्रम: यह राज्य के उन क्षेत्रों के लिए है जहाँ जनजाति समूह छितराए हुए रूप में रहते हैं। यह कार्यक्रम 1979 में लागू किया गया था।

प्रमुख विकास संस्थाएं

  • राजस संघ (RAJAS SANGH): इसकी स्थापना 27 मार्च, 1976 को हुई। इसका मुख्यालय उदयपुर में है और मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को बिचौलियों व साहूकारों के शोषण से मुक्ति दिलाना है।
  • माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान: उदयपुर में स्थित इस संस्थान की स्थापना 2 जनवरी, 1964 को हुई। यह जनजातियों की समस्याओं और संस्कृति पर शोध कार्य करता है।
  • राजस्थान अनुसूचित जाति, जनजाति वित्त एवं सहकारी विकास निगम लि.: 28 मार्च, 1980 को स्थापित इस निगम का कार्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को ऋण उपलब्ध कराना है।

स्वच्छ परियोजना (नारू रोग उन्मूलन)

  • प्रारंभ: यह परियोजना 1986 में राजस्थान सरकार और यूनिसेफ (UNICEF) की सहायता से शुरू की गई थी।
  • कारण: नारू रोग 'क्रेस्टेशिया' जाति के कृमि 'ड्रैकेन्कुलस मैडीनेंसिस' के कारण होता था, जो दूषित पानी के माध्यम से फैलता था।
  • प्रभाव: यह योजना मुख्य रूप से डूंगरपुर, बाँसवाड़ा और उदयपुर जिलों में लागू की गई थी। इसमें यूनिसेफ और राजस्थान सरकार का वित्तीय हिस्सा 60:40 का था। इसका उद्देश्य पानी से होने वाली बीमारियों की रोकथाम और पेयजल संसाधनों का विकास करना था।
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