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राजस्थान की जातियाँ एवं जनजातियाँ: इतिहास, वर्गीकरण, विशेषताएँ और महत्वपूर्ण तथ्य Part-1

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By NotesMind
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राजस्थान की जातियाँ एवं जनजातियाँ: एक ऐतिहासिक परिचय

राजस्थान में सभ्यता का विकास प्राचीन काल से ही रहा है। यहाँ सिन्धु सभ्यता और उसके बाद आहड़ सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इसके बाद आर्यों के आगमन से ब्राह्मण संस्कृति का उदय हुआ। जनपद युग के दौरान यहाँ मालव, शिवि, अर्जुनायन, शातव और यौधेय जैसी जातियाँ बसीं। कुषाण और गुप्त वंश के शासन के बाद, यहाँ हूणों का भी प्रभाव रहा। राजस्थान विभिन्न जातियों का संगम स्थल रहा है, जिसका प्रभाव यहाँ के लोगों की शारीरिक संरचना, खान-पान और रीति-रिवाजों पर स्पष्ट दिखता है।


प्रमुख जातियों का उदय

  • राजपूत: सातवीं शताब्दी में राजपूतों का अभ्युदय हुआ। इनकी उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत हैं, लेकिन इन्हें आर्यों, कुषाणों और हूणों का समन्वय माना जाता है। प्रमुख राजपूत वंशों में सिसोदिया, राठौड़, कच्छवाहा, चौहान और परमार शामिल हैं। इन्होंने मुगलों से संघर्ष भी किया और मेल-मिलाप भी।
  • जाट: उत्तर-पूर्व के भागों में जाटों का अधिकार रहा। स्वतंत्रता के बाद पंजाबी और सिंधी भी यहाँ आकर बस गए।
  • आदिवासी: राज्य में प्राचीन काल से ही भील, मीणा, गरासिया जैसी आदिवासी जातियाँ निवास कर रही हैं। इसके अलावा डोम, मछुए, धोबी, नट, जुलाहे जैसी अन्य जातियाँ भी यहाँ आदि काल से मौजूद हैं।

राजस्थान की प्रमुख जातियों का वर्गीकरण

  • हिन्दू जातियाँ: लगभग 150 जातियाँ।
  • मुसलमान: लगभग 5 से 7 जातियाँ।
  • खानजादा: धर्म से मुसलमान लेकिन व्यवहार से हिन्दुओं के समान।
  • कायमखानी/मेव: ये भी मुस्लिम समुदाय का हिस्सा हैं।
  • आदिम जातियाँ: इनमें मुख्य रूप से सात जातियाँ हैं—मीणा, भील, गरासिया, सहरिया, डामोर, सांसी और कथौड़ी।
  • उपेक्षित जातियाँ: इनकी संख्या करीब 35 है।

प्रमुख हिन्दू जातियाँ (Main Hindu Castes)

  1. राजपूत: ये रियासतों के शासक थे। अपनी मर्यादा और देश की रक्षा के लिए 'केसरिया बाना' पहनकर वीरगति प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं।
  2. ब्राह्मण: सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान। पूजा-पाठ, व्यापार और खेती इनकी जीविका के साधन रहे हैं। ये मुख्य रूप से वैष्णव और शैव धर्म को मानते हैं। इनमें विधवा-विवाह और तलाक वर्जित है।
  3. वैश्य: मुख्य रूप से व्यापार में संलग्न और आर्थिक रूप से संपन्न। इनमें ओसवाल, माहेश्वरी, सरावगी और अग्रवाल प्रमुख हैं।

काश्तकार (खेतीहर) जातियाँ

  • जात, माली, गुर्जर, कलमी, धाकड़ आदि: ये जातियाँ मुख्य रूप से कृषि पर आधारित हैं। इनके यहाँ विवाह और मृत्यु-भोज (ओसर-मोसर) पर काफी खर्च किया जाता है।
  • जाट: ये स्वयं को यदुवंशी मानते हैं। बीकानेर, जैसलमेर और भरतपुर रियासतों की स्थापना और विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
  • अहीर: 'अभीर' शब्द से व्युत्पन्न, जिसका अर्थ 'दूधवाला' है। ये स्वयं को भगवान कृष्ण का पालक और नंद का वंशज मानते हैं।
  • गुर्जर: 'गुर्ज' (लकड़ी का ठोस गोला) से लड़ने में निपुण होने के कारण गुर्जर कहलाए। सातवीं सदी में इनका शासन मारवाड़ और पंजाब तक फैला था। इनकी राजधानी राजोरगढ़ (राजगढ़) थी।
  • माली: ये पहले क्षत्रिय थे, लेकिन शाहबुद्दीन गौरी के समय इन्होंने बागवानी का पेशा अपनाया।
  • चमार: चर्म-कार्य में संलग्न। इन्हें इस्लाम में परिवर्तित होने से रामदेव तंवर (रामसा पीर) ने बचाया था, इसलिए ये उनकी पूजा करते हैं।

जोगी और उनका वर्गीकरण

जोगी समाज नाथ संप्रदाय से प्रभावित है, जिसके जन्मदाता आदि शंकराचार्य माने जाते हैं।

  • औघड़ जोगी: कान छिदवाना और जटा रखना इनकी पहचान है।
  • अघोरी जोगी: श्मशान निवासी और मैली विद्या के साधक।
  • रावल जोगी: गाँवों में फेरी लगाते हैं और 'सींगी' नामक वाद्य यंत्र बजाते हैं।
  • कनफटे जोगी: कानों में मुद्राएँ और गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं। मारवाड़ में इनकी अधिकता है।
  • कालबेलिया जोगी: साँप पकड़ना इनका मुख्य कार्य है।

राजस्थान की जनजातियाँ (Tribes of Rajasthan)

जो लोग आधुनिक सभ्यता से दूर रहकर अपने प्राकृतिक वातावरण और पुरानी परंपराओं के अनुसार जीवन जीते हैं, उन्हें आदिवासी या जनजाति कहा जाता है।

  • विशेषताएँ: इनके सामाजिक प्रतिबंध बहुत कठोर होते हैं। ये प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य बनाकर रहते हैं।
  • निवास: ये पहाड़ी, पठारी और वन क्षेत्रों में आदिम ढंग की अर्थव्यवस्था (शिकार, वनोपज) पर निर्भर रहते हैं।
  • विकास: स्वतंत्रता के बाद सरकार ने इनकी शिक्षा और आर्थिक उत्थान पर विशेष ध्यान दिया है। उदयपुर जिला जनजातियों की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है।

जनजातियों का भौगोलिक एवं जिलेवार वितरण

राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में जनजातियों का निवास इस प्रकार है:

  • भील: दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी भाग (उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कोटा) में मुख्य रूप से निवास करते हैं।
  • मीणा: जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, बूंदी और कोटा क्षेत्र में प्रमुखता से पाए जाते हैं।
  • गरासिया: सिरोही और आबू रोड क्षेत्र में इनकी सर्वाधिक संख्या है।
  • डामोर: डूंगरपुर जिले की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में इनका 96.82% निवास है।
  • सहरिया: बारां जिले की शाहबाद और किशनगंज पंचायत समितियों में इनका 99.47% निवास है।
  • सांसी: मुख्य रूप से भरतपुर जिले में पाए जाते हैं।
  • कथौड़ी: उदयपुर जिले के कोटड़ा क्षेत्र में इनका निवास है।

मीणा जनजाति (Meena Tribe)

राजस्थान की जनजातियों में मीणा सबसे अधिक सम्पन्न और शिक्षित मानी जाती है।

  • उत्पत्ति: 'मीणा' शब्द का अर्थ मत्स्य (मछली) है। भगवान महावीर के अनुसार, प्राचीन 'मत्स्य' जनपद के शासक इन्हीं के पूर्वज थे। कछवाहा वंश के शासन से पूर्व आमेर पर मीणाओं का राज था।
  • ग्रंथ व गोत्र: मुनि मगन सागर द्वारा लिखित 'मीणा पुराण' में इनके 5,200 गोत्रों का उल्लेख है, हालाँकि वर्तमान में मुख्य रूप से 24 खांपें मानी जाती हैं।
  • सामाजिक वर्ग: समाज मुख्य रूप से दो वर्गों में बंटा है:
    1. जमींदार या काश्तकार मीणा: जो खेती और पशुपालन करते हैं।
    2. चौकीदार मीणा: जो सुरक्षा का कार्य करते थे और स्वयं को ऊंचा मानते हैं।
  • अन्य समूह: इनमें चौथिया, आदि, रावत, चमरया, सुरतेवाल और ढेढ़िया मीणा जैसे कई सामाजिक समूह शामिल हैं।
  • सामाजिक जीवन: इनमें पितृ-वंशीय परंपरा और संयुक्त परिवार प्रणाली है। ये शक्ति (दुर्गा) के उपासक हैं और जादू-टोने में विश्वास रखते हैं।

भील जनजाति (Bheel Tribe)

भील राजस्थान की प्राचीनतम जनजातियों में से एक हैं।

  • अर्थ और उत्पत्ति: 'भील' शब्द द्रविड़ भाषा के 'बिल्लु' से बना है जिसका अर्थ है 'तीर चलाने वाला व्यक्ति'। मानवशास्त्री इन्हें 'मुंडा जाति' के वंशज या द्रविड़ मानते हैं। संस्कृत साहित्य में इन्हें 'निषाद' या 'पुलिन्त' कहा गया है।
  • निवास: इनका मुख्य निवास अरावली पर्वत श्रेणियों के पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों (उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़) में है।
  • उपजातियाँ और पहचान: भीलों की कई उपशाखाएँ हैं, जैसे ओवरी ग्राम के भील, पारडा क्षेत्र के भील, देवरा के भील और गरासिया भील आदि। मेवाड़ राज्य में इनकी 16, डूंगरपुर में 36 और जोधपुर में 58 उपशाखाओं का पता चलता है।

क्षेत्रीय वितरण का सारांश

क्षेत्र

प्रमुख जनजातियाँ

विवरण

दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्र

भील, मीणा, गरासिया

कुल जनजाति का लगभग 49.06% हिस्सा इसी क्षेत्र में है।

दक्षिणी क्षेत्र

भील, डामोर

बांसवाड़ा, डूंगरपुर और उदयपुर जिले।

पश्चिमी क्षेत्र

सांसी, भील

जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर सहित शुष्क प्रदेश के 11 जिले।

शारीरिक लक्षण

  • पुरुष: छोटा कद, गहरा काला रंग, चौड़ी नाक, रूखे बाल और लाल आँखें। इनका जबड़ा कुछ बाहर निकला हुआ और हाथ-पैर की हड्डियाँ मोटी होती हैं।
  • स्त्री: पुरुषों की तुलना में अधिक सुंदर, गेहुँआ रंग, कत्थई आँखें और शरीर सुगठित होता है।

वेशभूषा और आभूषण

वस्त्रों के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बाँटा गया है:

  1. लंगोटिया भील: पुरुष कमर में 'खोयतू' (लंगोटी) पहनते हैं और स्त्रियाँ घुटने के नीचे तक का घाघरा पहनती हैं जिसे 'कछावू' कहते हैं।
  2. पोतीदा भील: ये धोती, बंदी, पगड़ी और अंगोछा (फालू) पहनते हैं। पुरुषों की तंग धोती 'ढेपाड़ा' कहलाती है।
  • अन्य: भील स्त्री-पुरुषों को गोदने (टैटू) गुदवाने का बहुत शौक होता है। सिर पर पहने जाने वाले साफे को 'पोत्या' कहा जाता है।

सामाजिक व्यवस्था

  • परिवार: पितृसत्तात्मक और संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित है, जहाँ संपत्ति के सारे अधिकार पिता के पास होते हैं।
  • विवाह: ये अपने ही गोत्र (अटक) में विवाह नहीं करते। विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से आता है और कभी-कभी कन्या का मूल्य (दापा) भी देना पड़ता है।
  • नाता प्रथा: इसमें विवाहित स्त्री किसी अन्य पुरुष के साथ रह सकती है, जिसे 'नाता' होना कहते हैं। विवाह विच्छेद की प्रक्रिया को 'छेड़ा फाड़ना' कहा जाता है।
  • स्वभाव: ये भोले, वीर और स्वामीभक्त होते हैं। 'केसरियानाथ' का केसर का पानी पीकर ये कभी झूठ नहीं बोलते। 'फाइरे-फाइरे' इनका रणघोष है।

बस्तियाँ और घर

  • कु (Ku): भीलों के आयताकार घर, जो बाँस, पत्थर और घास-फूँस से बने होते हैं।
  • पाल: बहुत से झोंपड़ियों के समूह को पाल कहते हैं और इसके मुखिया को 'गमेती' या 'पालवी' कहा जाता है।
  • तदवी: एक ही वंश की ढाणी के मुखिया को 'तदवी' या 'वंशाओ' कहते हैं।

धार्मिक एवं आर्थिक व्यवस्था

  • धर्म: ये महादेव, राम, हनुमान और दुर्गा के उपासक हैं। 'भगत' धार्मिक संस्कार संपन्न कराता है, जबकि 'भोपा' झाड़-फूँक का कार्य करता है।
  • अर्थव्यवस्था: 86% भील कृषि कार्यों में संलग्न हैं। पहाड़ी ढालों पर की जाने वाली खेती को 'चिमाता' और मैदानी भागों की खेती को 'दजिया' कहते हैं।

महत्वपूर्ण भील शब्दावली

  • भंगोरिया: वह त्यौहार जिस पर भील युवक-युवतियाँ अपना जीवन साथी चुनते हैं।
  • हाथीमणा: विवाह के अवसर पर पुरुषों द्वारा घुटने टेककर तलवार घुमाते हुए किया जाने वाला नृत्य।
  • सिंदूरी/पिरिया: विवाह के अवसर पर दुल्हन द्वारा पहनी जाने वाली लाल (सिंदूरी) या पीली (पिरिया) साड़ी/लहंगा।
  • भराड़ी: वैवाहिक भित्ति चित्रण की लोक देवी।
  • पाखरिया: यदि कोई भील सैनिक किसी घोड़े को मार डालता है, तो उसे 'पाखरिया' की उपाधि दी जाती है।

गरासिया जनजाति (Garasia Tribe)

यह मीणा और भील के बाद राजस्थान की तीसरी बड़ी जनजाति है।

  • क्षेत्र और उत्पत्ति: इनका सर्वाधिक जमाव सिरोही जिले में है। ये मूलतः बड़ौदा के निकट चैन पारीन क्षेत्र से चित्तौड़ के पास आए थे। 'गरासिया' शब्द 'गिरास' से बना है जिसका अर्थ 'छोटा समूह' होता है।
  • सामाजिक जीवन:
    1. इनके घर 'घेर' और मुखिया 'सहलोत' कहलाते हैं।
    2. किसी व्यक्ति की मृत्यु पर बनाए जाने वाले स्मारक को 'हुरे' कहा जाता है।
    3. 'हेलारु' इनकी सामाजिक सहकारी संस्था है।
    4. ये नक्की झील (आबू) को अपना पवित्र स्थान मानते हैं जहाँ पूर्वजों की अस्थियाँ विसर्जित की जाती हैं।
    5. 'मनखारो मेलो' इनका प्रमुख विवाह उत्सव मेला है।
  • विवाह के प्रकार:
    1. मोर-बंधिया: ब्रह्म विवाह के समान, इसमें फेरे और चौरी की रस्में होती हैं।
    2. पहरावना: नाम मात्र के फेरे होते हैं, ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती।
    3. ताणणा: इसमें वर पक्ष, कन्या पक्ष को 'कन्या मूल्य' देता है।

अन्य: मोर को आदर्श पक्षी और सफेद पशुओं को पवित्र मानते हैं।

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