राजस्थान के प्राचीन नाम और उसका इतिहास
राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा राज्य, अपने वर्तमान नाम से पहले इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में कई नामों से जाना जाता रहा है। मरुकान्तर, मरुदेश, राजपूताना से लेकर राजस्थान तक की यह यात्रा भौगोलिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों की कहानी कहती है। इस लेख में हम राजस्थान के प्राचीन नामों, उनके स्रोतों और राज्य के एकीकरण की संपूर्ण जानकारी विस्तार से जानेंगे।
1. वाल्मीकि रामायण में राजस्थान — 'मरुकान्तर'
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में राजस्थान क्षेत्र के लिए 'मरुकान्तर' शब्द का प्रयोग मिलता है। कालांतर में यह क्षेत्र भारतीय इतिहास में 'राजपूताना' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
2. 'राजस्थान' शब्द का प्राचीनतम स्रोत
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राजस्थान शब्द का सबसे पुराना ज्ञात स्रोत बसंतगढ़ (सिरोही) का शिलालेख है, जिसमें 'राजस्थानीयादित्य' शब्द उत्कीर्ण मिलता है।
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'मुहणोत नैणसी की ख्यात' तथा 'राजरूपक' नामक ग्रंथों में भी 'राजस्थान' शब्द का उल्लेख हुआ है।
3. मरुदेश / मरु प्रदेश
राजस्थान के सैकत (रेतीले) भू-भाग — जिसमें मारवाड़ तथा थार रेगिस्तान से जुड़े जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर जैसे जिले शामिल थे — के लिए 'मरु' या 'मरुदेश' शब्द का उल्लेख निम्न स्रोतों में मिलता है:
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ऋग्वेद
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महाभारत
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वृहत्संहिता
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रुद्रदामन का जूनागढ़ (गुजरात) अभिलेख
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पाल वंश के अभिलेख
(स्रोत: राजस्थान थ्रू द एजेज — दशरथ शर्मा)
सत्रहवीं शताब्दी में रचित 'शक्तिसंगमतंत्र' ग्रंथ में भी मरुदेश का रोचक वर्णन मिलता है।
4. जांगल प्रदेश
महाभारत में उल्लिखित 'कुरु-जांगल' एवं 'मरु-जांगल' से पता चलता है कि जांगल क्षेत्र में केवल राजस्थान का उत्तरी भाग ही नहीं, बल्कि पंजाब व हरियाणा का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा भी शामिल था।
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शाकम्भरी व अजमेर के चौहान शासकों को 'जांगलेश' कहा जाता था।
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बीकानेर के राजा इसी कारण 'जांगलधर पातिसाह' कहलाए।
5. मत्स्य प्रदेश (महाजनपद काल)
राजस्थान का पूर्वी भाग — वर्तमान जयपुर, दौसा, अलवर व भरतपुर का कुछ हिस्सा — महाजनपद काल में 'मत्स्य प्रदेश' कहलाता था।
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महाभारत के अनुसार मत्स्य राज्य की राजधानी बैराठ (वर्तमान विराटनगर, जयपुर) थी।
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मत्स्य राज्य पांडवों का प्रबल समर्थक था।
6. अन्य प्राचीन जनपद और क्षेत्रीय नाम
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क्षेत्र/जनपद |
विवरण |
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साल्व जनपद |
राजधानी 'साल्वपुर' (वर्तमान अलवर) — कनिंघम के अनुसार |
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शूरसेन जनपद |
मथुरा सहित अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली का सीमावर्ती क्षेत्र |
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शिवि जनपद |
चित्तौड़ के समीप, नगरी गाँव से प्राप्त सिक्कों से पुष्टि |
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मालव जनपद |
टोंक के पास रैढ़ की खुदाई में प्राप्त सिक्कों से सिद्ध |
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गुर्जर/गुर्जरत्रा |
राजधानी भीनमाल, ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में उल्लेख |
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मेदपाट/प्राग्वाट |
मेवाड़ का प्राचीन नाम, मेद/मेर जाति के शासन से जुड़ा |
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माड |
जैसलमेर व निकटवर्ती क्षेत्र, 'मांड राग' से संबद्ध |
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सप्तशत |
नाडोल/नड्डुल (पाली) के चौहानों का राज्य |
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गौड़ावटी |
मारोठ (नागौर-मारवाड़), गौड़ों के शासन से नामित |
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खींचीवाड़ा |
गागरोण क्षेत्र, खींची चौहानों के अधीन |
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झालावाड़ |
झालाओं द्वारा शासित क्षेत्र |
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शेखावाटी |
राव शेखा कछवाहा के वंशजों का क्षेत्र |
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तोरावाटी |
तंवर क्षत्रियों का क्षेत्र (नीम का थाना-कोटपूतली) |
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मेवात |
अलवर-भरतपुर का मेव बाहुल्य क्षेत्र |
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मेरवाड़ा |
अजमेर के निकट मेर जाति बाहुल्य क्षेत्र |
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भीलवाड़ा |
भील आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र से नामकरण |
7. 'राजपूताना' नाम की उत्पत्ति
7वीं से 12वीं सदी (राजपूत काल) तथा मध्यकाल में इस क्षेत्र पर अधिकांशतः राजपूत शासकों का राज्य रहा, इसलिए इसे 'राजपूताना' कहा गया।
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'राजपूताना' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1800 ई. में जॉर्ज थॉमस ने किया।
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ब्रिटिश शासनकाल में स्वतंत्रता से पूर्व यह क्षेत्र 'राजपूताना' के नाम से ही जाना जाता था।
8. कर्नल जेम्स टॉड और 'राजस्थान'
प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने वर्ष 1829 ई. में प्रकाशित अपनी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'एनाल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान' (सेण्ट्रल एण्ड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स ऑफ इंडिया) में इस प्रदेश के लिए तीन शब्दों — 'रजवाड़ा', 'रायथान' और 'राजस्थान' — का प्रयोग किया।
9. स्वतंत्रता के बाद राजस्थान का एकीकरण
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25 मार्च, 1948: 'पूर्व राजस्थान संघ' के गठन में पहली बार आधिकारिक रूप से 'राजस्थान' शब्द प्रयुक्त हुआ।
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30 मार्च, 1949: एकीकरण के चौथे चरण में जोधपुर, जयपुर, बीकानेर व जैसलमेर — चार बड़ी रियासतों के विलय से 'वृहद् राजस्थान' का गठन हुआ। इसी तिथि को राजस्थान के गठन की तिथि माना गया, इसलिए हर वर्ष 30 मार्च को 'राजस्थान दिवस' मनाया जाता है।
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26 जनवरी, 1950: राज्य का नाम विधिवत रूप से 'राजस्थान' रखा गया।
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1 नवम्बर, 1956: 19 देशी रियासतों, 3 ठिकानों (लावा, नीमराणा, कुशलगढ़) तथा अजमेर-मेरवाड़ा केंद्रशासित प्रदेश के पूर्ण एकीकरण से राजस्थान का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में आया।
निष्कर्ष
राजस्थान का नाम-विकास मरुकान्तर से लेकर राजपूताना और अंततः राजस्थान तक भौगोलिक विविधता, राजपूत शौर्य-गाथा और स्वतंत्र भारत के एकीकरण की एक समृद्ध झलक प्रस्तुत करता है। यह इतिहास राजस्थान GK, RPSC, REET, RAS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
FAQ:
प्र. राजस्थान का प्राचीनतम नाम क्या था? उ. वाल्मीकि रामायण में राजस्थान के लिए 'मरुकान्तर' शब्द का प्रयोग हुआ है, जो अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन नाम है।
प्र. 'राजस्थान' शब्द का सबसे पुराना अभिलेखीय साक्ष्य कहाँ मिलता है? उ. बसंतगढ़ (सिरोही) के शिलालेख में 'राजस्थानीयादित्य' शब्द के रूप में यह साक्ष्य मिलता है।
प्र. राजस्थान दिवस कब मनाया जाता है और क्यों? उ. 30 मार्च को, क्योंकि इसी दिन 1949 में जोधपुर, जयपुर, बीकानेर व जैसलमेर के विलय से 'वृहद् राजस्थान' का गठन हुआ था।
प्र. राजस्थान का वर्तमान स्वरूप कब अस्तित्व में आया? उ. 1 नवम्बर, 1956 को पूर्ण एकीकरण के बाद राजस्थान का वर्तमान स्वरूप बना।
प्र. मेवाड़ का प्राचीन नाम क्या था? उ. मेवाड़ का प्राचीन नाम 'मेदपाट' था, जिसे 'प्राग्वाट' भी कहा जाता था।
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