चूरू, दौसा, धौलपुर, डूंगरपुर, जयपुर, जैसलमेर और जालौर के प्रमुख मंदिर की अद्भुत यात्रा
चूरू, दौसा, धौलपुर, डूंगरपुर, जयपुर, जैसलमेर और जालौर के शीर्ष मंदिर: आस्था और आश्चर्यों की अद्भुत यात्रा
राजस्थान के रेगिस्तानी जिलों से लेकर पहाड़ी क्षेत्रों तक फैले ये मंदिर अपनी अनूठी लोक मान्यताओं, ऐतिहासिक घटनाओं और चमत्कारिक कहानियों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। इस लेख में हम सालासर बालाजी, मेहंदीपुर बालाजी, शिलामाता, तनोट माता और संत मावजी जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों की सम्पूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
चूरू जिले के प्रमुख मंदिर
सालासर बालाजी का मंदिर
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इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर की स्थापना 1754 ईस्वी में महात्मा श्री मोहनदास जी ने की थी।
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आसोटा गांव में हल चलाते समय इन्हें दाढ़ी-मूंछ युक्त हनुमान जी की मूर्ति प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने सुजानगढ़ तहसील के सालासर गांव में यह भव्य मंदिर बनवाया।
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यह मंदिर दाढ़ी-मूंछ वाले हनुमानजी का देश का पहला मंदिर है।
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मंदिर परिसर के बीच में जाल का पेड़ है, जहाँ भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए नारियल और ध्वजा बाँधते हैं।
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प्रतिवर्ष आश्विन एवं चैत्र की पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है।
वेंकटेश्वर/तिरुपति बालाजी मंदिर, सुजानगढ़
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इस मंदिर का निर्माण वेंकटेश्वर फाउंडेशन ट्रस्ट के सोहनलाल जानोदिया ने 1994 में करवाया।
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यह मंदिर लगभग 75 फीट ऊंचा है और ग्रेनाइट, इटालियन मार्बल एवं मकराना मार्बल से लगभग 10,000 वर्ग फीट क्षेत्र में बना है।
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इसकी देखरेख डॉक्टर एम. नागराज एवं डॉक्टर वैकताचार्य वास्तुविद ने की।
शीर्षमेडी, ददरेवा (गोगाजी का जन्म स्थल)
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लोक देवता गोगाजी का जन्म स्थल ददरेवा (चूरू) है। मुस्लिम लुटेरों (महमूद गजनबी) से गौरक्षार्थ युद्ध के दौरान गोगाजी का सिर यहीं गिरा था, इसलिए इसे शीर्षमेडी/सिद्धमेडी कहते हैं।
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गोगानवमी पर भक्त गोगाजी को राखी चढ़ाते हैं। किसान खेत जोतते समय हल व हाली में नौ गाँठों वाली गोगा राखड़ी बाँधते हैं।
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उपनाम: गौरक्षक देवता, साँपों का देवता, नागराज (हिंदू), गोगापीर (मुस्लिम), जाहरपीर (महमूद गजनबी द्वारा)।
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परिवार विवरण: पिता – जेवर, माता – बाछल, पत्नी – केमलदे/रानी धीमल, गुरु – गोरखनाथ, पुत्र – केशरियाजी।
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गोगाजी की नीली घोड़ी को "गोगा बाप्पा" कहते हैं।
दौसा जिले के प्रमुख मंदिर
हर्षद माता का मंदिर, आभानेरी (दौसा)
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इस मंदिर का निर्माण प्रतिहार शासकों द्वारा आठवीं शताब्दी में करवाया गया था।
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यह वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है और प्रतिहार कला का अनुपम उदाहरण है।
झाँझीरामपुरा
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स्थापना ठाकुर रामसिंह ने की थी। यहाँ एक ही जलहरी में 121 शिवलिंग (महादेव) स्थापित हैं।
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यहाँ के गोमुख से सर्दियों में गर्म तथा गर्मियों में ठंडा पानी बहता है।
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श्रावण मास में विशाल मेला भरता है तथा यहाँ काल बाबा का मंदिर भी स्थित है।
मेहंदीपुर बालाजी का मंदिर
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मेहंदीपुर बालाजी का यह प्रसिद्ध मंदिर दौसा के सिकंदरा से महुआ के बीच दो पहाड़ियों की घाटी पर स्थित है, जिसे घाटा मेहंदीपुर भी कहते हैं।
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मूर्ति पर्वत का ही अंग है। यहाँ होली, दशहरा और हनुमान जयंती पर मेला लगता है।
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यह मंदिर बुरी आत्माओं, भूत-प्रेत तथा जादू-टोने के निवारण के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
दौसा के अन्य शीर्ष मंदिर
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लक्ष्मण मंदिर (सिकंदरा)
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कटारमल भैरव मंदिर (सिकंदरा)
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गोपालजी का मंदिर (सिकंदरा)
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गिर्राजजी मंदिर (दौसा)
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नाथ सम्प्रदाय का गुरुद्वारा (हींगवा)
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नीलकंठ महादेव मंदिर (दौसा)
धौलपुर जिले के प्रमुख मंदिर
मचकुंड, धौलपुर
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"तीर्थों का भांजा" उपनाम से प्रसिद्ध मचकुंड हिंदुओं का एक अनूठा तीर्थ है (जैसे पुष्कर को तीर्थों का मामा कहते हैं)।
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यह तीर्थ गंधमादन पर्वत पर स्थित है और यहाँ स्नान करने से चर्म रोग दूर होने की मान्यता है।
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भादव सुदी छठ को प्रतिवर्ष मेला लगता है।
राधा बिहारी मंदिर
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धौलपुर पैलेस के पास स्थित इस मंदिर की बारीक नक्काशी धौलपुर के लाल पत्थर (धौलपुर स्टोन) से ताजमहल की तरह की गई है। यह पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक है।
महाकालेश्वर मंदिर
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धौलपुर के सरमथुरा कस्बे में स्थित, जहाँ भाद्रपद शुक्ल सप्तमी से चतुर्दशी तक मेला भरता है।
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कस्बे की स्थापना 1327 ईस्वी में पालवंश के शासक अर्जुन देव ने की थी।
सैपऊ महादेव मंदिर, सैपऊ (धौलपुर)
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सैपऊ कस्बे के निकट पार्वती नदी के किनारे स्थित इस मंदिर में एक चमत्कारी विशाल शिवलिंग मौजूद है।
डूंगरपुर जिले के प्रमुख मंदिर
संत मावजी का मंदिर, साबला
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संत मावजी को विष्णु का कल्कि (निष्कलंकी) अवतार माना जाता है।
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साबला ग्राम में संत मावजी का मुख्य हरि मंदिर है, जो बेणेश्वर धाम के समीप स्थित है।
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उन्होंने भील समाज के लिए धार्मिक एवं सामाजिक सुधार हेतु आंदोलन चलाया और निष्कलंक संप्रदाय की स्थापना की, जिसकी प्रधान पीठ माही नदी के किनारे साबला में है।
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संत मावजी स्वयं श्रीकृष्ण के परम भक्त थे तथा रासलीलाएँ करते थे। उन्होंने बेणेश्वर धाम की स्थापना की।
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उनके द्वारा वागडी भाषा में लिखे उपदेश चोपड़ा कहलाते हैं, जिनमें वर्णित भविष्यवाणियाँ (जाति प्रथा का अंत, मुद्रा अवमूल्यन, राजतंत्र की समाप्ति, कागजी मुद्रा का प्रचलन आदि) आज सत्य सिद्ध हो रही हैं।
देव सोमनाथ मंदिर
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सफेद पत्थरों से निर्मित यह मंदिर बिना सीमेंट-चूने के विशिष्ट शिल्प विधि से केवल पत्थर जोड़कर बनाया गया है।
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आकर्षक झरोखे और कलात्मक शिखरों वाला यह मंदिर डूंगरपुर जिले में स्थित है।
विजय राजेश्वर मंदिर
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महारावल विजय सिंह ने निर्माण शुरू करवाया, उनके पुत्र महारावल लक्ष्मण सिंह ने पूरा करवाया।
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यह डूंगरपुर के गैप सागर पर पारेवा प्रस्तर से चतुर्भुज आकार में बना है और माही नदी के तट पर स्थित है।
गवरी बाई का मंदिर
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वागड़ की मीरा के नाम से विख्यात गवरी बाई का यह मंदिर डूंगरपुर में महारावल शिवसिंह ने बनवाया था।
जयपुर जिले के प्रमुख मंदिर
शाकंभरी माता का मंदिर
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सांभर के चौहानों की कुलदेवी शाकंभरी माता का मंदिर सांभर के निकट देवयानी ग्राम के पास है।
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यहाँ भाद्रपद शुक्ल 8 को मेला लगता है। शाकंभरी चौहान वंश की पहली राजधानी थी।
श्री गोविंद देव जी मंदिर
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जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने इस मंदिर का निर्माण सन 1735 में करवाया।
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यह गौड़ीय सम्प्रदाय का मंदिर है; गोविन्द देवजी की प्रतिमा वृन्दावन से लाकर प्रतिस्थापित की गई।
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जयपुर के राजा स्वयं को दीवान मानकर गोविन्द देवजी को अपना शासक मानते थे।
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यहाँ स्थित सत्संग भवन विश्व का सबसे बड़ा बिना खम्भों वाला भवन है, जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।
बिड़ला मंदिर (लक्ष्मी-नारायण मंदिर)
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प्रसिद्ध उद्योगपति गंगाप्रसाद बिड़ला के हिंदुस्तान चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा निर्मित।
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इसमें बी. एम. बिड़ला संग्रहालय स्थित है और यह राजस्थान का एकमात्र मंदिर है जो हिंदू, मुस्लिम एवं ईसाई डिजाइन का संगम है।
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यह एशिया का प्रथम वातानुकूलित मंदिर है।
गलता जी तीर्थ, जयपुर
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"जयपुर का बनारस" और "राजस्थान की मिनी काशी" के नाम से प्रसिद्ध, यह ऋषि गालव की तपोभूमि है।
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बंदरों की अधिकता के कारण इसे मंकी वैली भी कहते हैं। इसे उत्तर तोताद्रि माना जाता है।
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मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा को गलता स्नान का विशेष महात्म्य है। पर्वत की चोटी पर सूर्य मंदिर स्थित है।
जगत शिरोमणि मंदिर, आमेर
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राजा मानसिंह प्रथम की पत्नी कनकावती ने अपने पुत्र जगत की याद में बनवाया। इसे मीरा मंदिर भी कहते हैं।
शीतला माता, चाकसू (जयपुर)
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शील की डूंगरी, चाकसू में स्थित। वाहन गधा है और परम्परागत पुजारी कुम्हार होते हैं। प्रतीक चिह्न मिट्टी की कटोरियाँ (दीपक) हैं।
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निर्माण महाराजा श्री माधोसिंह ने करवाया। इन्हें सैढ़ल माता, चेचक व बोदरी की देवी भी कहते हैं।
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यह राजस्थान की एकमात्र देवी हैं जिनकी खंडित रूप में पूजा होती है। बाँझ स्त्रियाँ इनकी पूजा करती हैं।
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चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतलाष्टमी) पर मेला भरता है और खेजड़ी वृक्ष की पूजा की जाती है।
अन्य प्रमुख जयपुर मंदिर
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जमुवाय माता मंदिर: आमेर के कच्छवाहों की कुलदेवी, निर्माण दुल्हेराय ने करवाया।
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गणेश मंदिर: मोती डूंगरी तलहटी पर, गणेश चतुर्थी पर मेला।
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नकटी माता: जयभवानीपुरा में, प्रतिमा की नाक चोरों ने काट दी थी।
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कल्कि मंदिर: ईश्वरीसिंह ने बनवाया, संगमरमर का घोड़ा प्रमुख है।
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ज्वाला माता: जोबनेर, खंगारोत राजपूतों की कुलदेवी।
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शिलामाता मंदिर (आमेर): कच्छवाहा राजवंश की आराध्य देवी, मूर्ति 1604 ई. में जस्सोर (बांग्लादेश) से मानसिंह लाए। ढाई प्याला शराब चढ़ती है।
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देवयानी (सांभर): सब तीर्थों की नानी, वैशाख पूर्णिमा पर स्नान पर्व।
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सिद्धेश्वर शिव मंदिर: केवल शिवरात्रि पर खुलता है, राजघराने का निजी मंदिर।
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खलकाणी माता मंदिर: लूनियावास गांव के पास स्थित।
जैसलमेर जिले के प्रमुख मंदिर
रामदेवरा मंदिर (रुणेचा)
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पोकरण तहसील के निकट रुणेचा (रामदेवरा) में स्थित। यह मंदिर राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सद्भाव का प्रमुख केंद्र है।
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पुजारी तंवर राजपूत होते हैं और यात्रियों को जातरू कहते हैं। रामदेव जी ने पंच पीपली में पाँचों पीरों को पर्चा दिया और भैरव राक्षस का वध किया।
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रामदेव जी को श्वेत तथा नीले घोड़े चढ़ाए जाते हैं और 5 रंगों की ध्वजा नेजा कहलाती है।
तनोट माता का मंदिर
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इस मंदिर की पूजा सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान करते हैं और यह सेना के अधीन राजस्थान का एकमात्र मंदिर है।
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मंदिर के सामने 1965 के भारत-पाक युद्ध का विजय स्तंभ स्थित है। इन्हें भोजासरी, सैनिकों की देवी, थार की वैष्णो देवी भी कहते हैं।
हिंगलाज माता का मंदिर (गडसीसर)
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जैसलमेर के गडसीसर में स्थित; इनकी पूजा क्षत्रिय व चारण समाज करता है। मूल मंदिर बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में है।
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मान्यता है कि दर्शन मात्र से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
स्वांगिया माता का मंदिर
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जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी, जिन्हें सांगिया माता या सुग्गा माता भी कहते हैं।
अमर सागर जैन मंदिर
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1871 ईस्वी में अमर सागर तालाब के किनारे बना भव्य जैन मंदिर, शिल्प कला का उत्कृष्ट नमूना।
लक्ष्मी नारायण मंदिर
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1437 ईस्वी में महाराजा बेरीसाल ने बनवाया। जैसलमेर के शासक स्वयं को लक्ष्मी नारायण जी का दीवान मानते थे।
जालौर जिले के प्रमुख मंदिर
सुंधा माता का मंदिर
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दांतलावासा, जालौर में स्थित इस मंदिर में चामुंडा माता की प्रतिमा है।
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यहाँ दिसंबर 2006 में राजस्थान का प्रथम रोपवे लगाया गया।
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पास ही जसवंतपुरा में राजस्थान का पहला भालू अभ्यारण्य स्थित है।
मां आशापुरा का मंदिर
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इन्हें महोदरी माता भी कहते हैं और ये जालौर के सोनगरा चौहानों की कुलदेवी हैं।
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मंदिर मोदरा रेलवे स्टेशन के पास है; नवरात्रों में विशाल मेला होता है।
आपेश्वर महादेव मंदिर
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जालौर के रामसीन में स्थित गुर्जर-प्रतिहार कालीन मंदिर। प्राचीन नाम अपराजितेश्वर शिव मंदिर है।
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यहाँ राजस्थान का पहला श्वेत स्फटिक (कांच निर्मित) शिवलिंग मौजूद है।
सिरे मंदिर
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कन्यागिरी पर योगीराज जालंधरनाथ जी की तपोभूमि, जिनके नाम पर जालौर का नामकरण हुआ। निर्माण जोधपुर के राजा मानसिंह ने करवाया।
फता जी का मंदिर
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जालौर के सांथू गांव में फत्ताजी ने गांव की मान-मर्यादा के लिए बलिदान दिया था। भाद्रपद शुक्ल नवमी को यहाँ फता जी का मेला लगता है।
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