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राजस्थान के प्रमुख मंदिर: बीकानेर, अजमेर, अलवर, बांसवाड़ा, बूंदी और चित्तौड़गढ़ के प्रसिद्ध मंदिर

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By NotesMind
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राजस्थान के प्रमुख मंदिर: अजमेर, अलवर, बांसवाड़ा और अन्य जिलों की सम्पूर्ण जानकारी

राजस्थान वीरता, कला और आस्था की त्रिवेणी है। यहां के भव्य मंदिर, जैन तीर्थ और लोक देवताओं के स्थान श्रद्धालुओं के लिए अद्भुत आकर्षण का केंद्र हैं। इस लेख में हम आपको राजस्थान के प्रमुख जिलों के ऐतिहासिक एवं प्रसिद्ध मंदिरों की विस्तृत जानकारी प्रदान कर रहे हैं, जो आपकी धार्मिक यात्रा को सरल और ज्ञानवर्धक बनाएगी।


मंदिर का अर्थ और शास्त्रीय संरचना

मंदिर शब्द का अर्थ है – वह पवित्र स्थान जहाँ श्रद्धालु अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर का तलच्छंद, भूमितल, विस्तार (ग्राउंड प्लान) मुख्यतया तीन भागों में विभाजित होता है:

  1. प्रवेश मंडप

  2. सभा मंडप

  3. गर्भगृह

मंदिर का ऊपरी विस्तार (एलिवेशन) पीठ, मण्डोवर, शिखर आदि में बंटा होता है। गुप्त काल के बाद से आज तक मंदिर निर्माण की यही शास्त्रीय परम्परा चली आ रही है, जिसमें शिल्प शास्त्र के नियमों का अनुसरण किया जाता है।


अजमेर जिले के प्रमुख मंदिर

सोनीजी की नसीयां (लाल मंदिर)

  • यह जैन सम्प्रदाय का प्रसिद्ध मंदिर है जिसे लाल मंदिर भी कहते हैं।

  • शहर के मध्य स्थित ऊँचे शिखर एवं मान स्तम्भ वाली यह लाल पत्थर की इमारत प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव/आदीनाथ को समर्पित है।

  • निर्माण कार्य: स्वर्गीय सेठ मूलचन्द सोनी ने 1864 में शुरू करवाया, उनके पुत्र स्वर्गीय सेठ टीकमचन्द सोनी ने 1865 ई. में पूरा करवाया।

ब्रह्मा मन्दिर, पुष्कर

  • पुष्कर (अजमेर) में स्थित विश्व का एकमात्र प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर, जहाँ विधिवत पूजा होती है।

  • 14वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर अनूठा है।

  • मंदिर परिसर में पंचमुखी महादेव, लक्ष्मीनारायण, गौरीशंकर, पातालेश्वर महादेव, नारद और नवग्रह के छोटे-छोटे मन्दिर भी बने हुए हैं।

सावित्री मन्दिर, पुष्कर

  • पुष्कर के दक्षिण में रत्नागिरी पर्वत पर ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री का मंदिर स्थित है।

  • यहाँ भादवा शुक्ला सप्तमी को मेला भरता है और देवी सावित्री की पुत्री सरस्वती माँ की प्रतिमा भी मौजूद है।

  • मान्यता है कि यज्ञ के समय रूठकर सावित्री माता यहाँ आ गई थीं और उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि उनकी पूजा पुष्कर के अतिरिक्त कहीं नहीं होगी।

आनंदी माता का मंदिर, नोसल (किशनगढ़)

  • यह मंदिर 9वीं सदी का सूर्य मंदिर था जिसे बाद में आनंदी माता का मंदिर बनाया गया।

  • मंदिर पंचायतन शैली में निर्मित है।

काचरिया मंदिर, किशनगढ़

  • इस मंदिर में राधा-कृष्ण का स्वरूप विराजमान है।

  • भगवान कृष्ण की मूर्ति अष्ट धातु की तथा राधा की मूर्ति पीतल की है।

  • सेवा निम्बार्क पद्धति से होती है और होली के दूसरे दिन डोलोत्सव मनाया जाता है।

गायत्री मंदिर और अन्य प्रमुख मंदिर, पुष्कर

  • गायत्री मंदिर: पुष्कर के उत्तर में एक पहाड़ी पर प्रसिद्ध गायत्री मंदिर बना हुआ है।

  • रंगनाथ जी का मंदिर: द्रविड़ शैली में निर्मित भव्य विष्णु मंदिर।

  • वराह मंदिर: चौहान शासक अर्णोराज द्वारा 12वीं सदी में निर्मित विष्णु के वराह अवतार का मंदिर।

अजमेर के अन्य शीर्ष मंदिर

  • पीपलाज माता का मन्दिर – ब्यावर

  • बलाड़ का जैन मंदिर – ब्यावर

  • नौग्रहों का मंदिर – किशनगढ़

  • कल्पवृक्ष मंदिर – मांगलियावास (ब्यावर)

  • रघुनाथजी का मंदिर – अजमेर

  • बजरंगढ़ – अजमेर

  • पुष्कर के अन्य मंदिर: पातालेश्वर महादेव, नर्बदेश्वर, लक्ष्मीनारायण, गौरी शंकर, सप्तऋषि, नवग्रह, सूर्यनारायण, दत्तात्रेय, रमा बैकुंठ, आत्मेश्वर महादेव, श्राप विमोचनी माता, तुलसीदास मंदिर आदि।


अलवर जिले के प्रमुख मंदिर

नौगांवा के जैन मंदिर

  • अलवर-दिल्ली मार्ग पर स्थित नौगांवा उत्तरी भारत में दिगंबर जैन समाज का प्रमुख केंद्र है।

  • यहाँ तीर्थंकर श्री मल्लिनाथ जी का 9 चौकिया मंदिर अत्यंत प्राचीन है, निर्माण संवत 803 में करवाया गया।

  • खास विशेषता: मल्लिनाथ की प्रतिमा के आगे के भाग के बजाय पीठ पर प्रशस्ति अंकित है।

  • इसी स्थान पर जैन तीर्थंकर शांतिनाथ का विशाल मंदिर है, जो "ऊपर वाला मंदिर" नाम से प्रसिद्ध है।

तिजारा जैन मंदिर, तिजारा

  • अलवर के तिजारा में आठवें जैन तीर्थंकर भगवान चन्द्रप्रभु का विशाल मंदिर है।

  • देहरा नामक स्थान पर चन्द्रप्रभु की मूर्ति प्राप्त हुई थी।

  • प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ला सप्तमी व श्रावण शुक्ला दशमी को विशाल मेला लगता है।

नौगजा जैन मंदिर

  • अलवर के नौगजा स्थान पर विशाल जैन मंदिरों के अवशेष मिले हैं।

  • इनमें भगवान पार्श्वनाथ की 27 फीट ऊंची प्रतिमा शामिल है।

नारायणी माता का मंदिर

  • यह मंदिर अलवर की राजगढ़ तहसील में बरवा डूंगरी की पहाड़ी की तलहटी में स्थित है।

  • सघन वृक्षों से घिरा यह स्थल सभी संप्रदायों एवं वर्गों का आराध्य स्थल है।

  • प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ला एकादशी को नारायणी माता का विशाल मेला भरता है।

विजय मंदिर पैलेस

  • विजय सागर बांध के तट पर महाराजा जयसिंह द्वारा 1918 में निर्मित पर्यटन की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

  • यहां सीताराम का भव्य मंदिर स्थित है।

  • भव्य महल और ऊंची मीनार का प्रतिबिंब झील में झिलमिलाता दिखता है, जो मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है। भवन की दीवारें धार्मिक एवं पौराणिक भित्ति चित्रों से अलंकृत हैं।

रावण पार्श्वनाथ मंदिर

  • अलवर शहर में स्थित एक प्रसिद्ध जैन मंदिर।

अलवर के अन्य शीर्ष मंदिर

  • नलदेश्वर महादेव मंदिर – थानागाजी

  • प्राचीन हनुमान मंदिर – पांडुपोल

  • चन्द्रप्रभु जैन मंदिर – तिजारा

  • भर्तृहरि मंदिर – भर्तृहरि


बांसवाड़ा जिले के प्रमुख मंदिर

छींछ बांसवाड़ा का ब्रह्मा मंदिर

  • बांसवाड़ा के छींछ में स्थित इस मंदिर में ब्रह्माजी की चतुर्मुखी मूर्ति विराजमान है।

  • स्थापना महारावल जगमाल ने की और निर्माण 12वीं सदी में हुआ।

  • यहां आम्बलिया तालाब की पाल पर छींछ देवी का प्राचीन मंदिर भी है।

घोटिया अंबा

  • अंबा माता धाम के अलावा यहाँ केलापानी, पांडवकुंभ और घोटेश्वर महादेव के प्रमुख पवित्र तीर्थ हैं।

  • मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहाँ व्यतीत किया और यहां पांडवों की प्रतिमा लगी है।

  • चैत्र अमावस्या को विशाल मेला भरता है।

  • पास ही सुरंग द्वारा जुड़ा भीमकुंड है, जो आदिवासियों का दूसरा कुंभ कहलाता है।

अर्थुणा का मंदिर

  • वागड़ के परमार राजाओं द्वारा निर्मित इस मंदिर का प्राचीन नाम उथ्युनक था और यह स्थान उन शासकों की प्राचीन राजधानी रहा है।

कालिंजरा जैन मंदिर

  • हिरण नदी के समीप कालिंजरा गांव में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की मूर्ति स्थापित है।

त्रिपुरा सुंदरी मंदिर

  • राजस्थान की प्रथम महिला मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की आराध्य देवी त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर तलवाड़ा के निकट है।

  • इसे स्थानीय लोग तुरताई माता मंदिर भी कहते हैं।

  • काले पत्थर से बनी देवी की अष्टादश भुजा वाली मूर्ति विराजमान है और नवरात्र पर मेला लगता है। यह पांचालों की कुलदेवी है।

घूणी के रणछोड़ रायजी का मंदिर

  • हर मनोकामना पूर्ण करने वाला एवं फसलों के रक्षक देवता का यह महाभारतकालीन तीर्थ उदयपुर मार्ग पर गनोड़ा के निकट है।

  • फाल्गुन शुक्ला एकादशी (आंवला एकादशी) को वार्षिक मेला भरता है।


बारां जिले के प्रमुख मंदिर

ब्रह्माणी माता का मंदिर

  • राजस्थान का एकमात्र ब्रह्माणी माता का मंदिर सोरसन (बारां) में है, जहाँ देवी की पीठ की पूजा होती है।

  • इसे शैलाश्रय गुहा मंदिर भी कहते हैं।

  • झालावाड़ के शासक झाला जालिमसिंह ने सीढ़ियां बनवाई थीं। यह कुम्हारों की कुल देवी है।

  • माघ शुक्ल सप्तमी को "गधों का मेला" लगता है।

भण्डदेवरा शिवमंदिर (रामगढ़)

  • "राजस्थान का मिनी खजुराहो" या "हाड़ौती का खजुराहो" उपनाम से प्रसिद्ध।

  • भण्डदेवरा का अर्थ टूटा-फूटा देवालय है। मेदवंशीय राजा मलयवर्मन ने विजय उपलक्ष्य में निर्माण करवाया।

  • पंचायतन शैली का उत्कृष्ट नमूना, मिथुन मुद्रा में उत्कीर्ण आकृतियों के कारण यह खजुराहो से तुलनीय है।

बारां जिले के अन्य प्रमुख स्थल

  • अन्नपूर्णा देवी मंदिर – पहाड़ी पर स्थित।

  • काकुनी मंदिर समूह – छिपाबड़ोद तहसील की मुकुंदरा पहाड़ियों में परवन नदी के किनारे।

  • गड़गच्च देवालय, अटरू – प्राचीन नाम अटलपुरी, जहाँ "फूलदेवरा मंदिर" को मामा-भांजा का मंदिर भी कहते हैं।

  • शाही जामा मस्जिद – शाहाबाद में औरंगजेब के समय की बनी हुई।


बाड़मेर जिले के प्रमुख मंदिर

किराडू के मंदिर (राजस्थान का खजुराहो)

  • नागर शैली की स्थापत्य कला, प्राचीन नाम किरात कूप, परमार शासकों की राजधानी रहा।

  • हाथमा गांव के पास स्थित किराडू में भगवान विष्णु व शिव मंदिर स्थित हैं।

  • सोमेश्वर मंदिर सबसे प्रमुख एवं बड़ा मंदिर है। किराडू को पुरातत्व, इतिहास, अध्यात्म की त्रिवेणी कहा जाता है।

  • यहाँ रणछोड़ मंदिर और सचिया माता मंदिर भी हैं। मिथुन मूर्तियों की भव्यता के कारण इसे राजस्थान का खजुराहो कहलाता है।

श्री नाकोड़ा

  • "मेवानगर के जैन तीर्थ" उपनाम से प्रसिद्ध, बालोतरा के पश्चिम में भाकरियाँ पहाड़ी पर स्थित।

  • मुख्य मंदिर में 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। पौष कृष्णा दशमी को जन्म दिवस पर विशाल मेला।

विरातरा माता का मंदिर

  • चौहटन तहसील की पहाड़ियों पर भव्य मंदिर। भोपा जनजाति की कुलदेवी

  • प्रतिवर्ष माघ एवं भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी को मेला भरता है।

बाड़मेर के अन्य प्रमुख मंदिर

  • ब्रह्मा मंदिर (आसोतरा) – सिद्ध पुरुष खेताराम जी महाराज द्वारा निर्मित।

  • श्री रणछोड़रायजी का खेड़ा मंदिर – लूणी नदी किनारे हिंदुओं का पवित्र धाम, यहाँ भूरिया बाबा, खोड़िया बाबा, पंचमुखी महादेव मंदिर आदि हैं।

  • मल्लीनाथ मंदिर – तिलवाड़ा में समाधि स्थल।

  • मां नागणेशी का मंदिर – राठौड़ों की कुलदेवी, नागाणा गांव में लकड़ी की प्रतिमा विराजित।

  • आलमजी का मंदिर – धोरीमना क्षेत्र में ऊंचे धोरे पर।

  • अन्य: जूना बाड़मेर, शिव मुंडी महादेव, जसोल राणी भटियाणी, गरीबनाथ शिव मंदिर, पीपलूद का हल्देश्वर महादेव मंदिर।


भरतपुर जिले के प्रमुख मंदिर

गंगा मंदिर

  • 1846 में महाराजा बलवंत सिंह ने निर्माण शुरू किया, बंसी पहाड़पुर के लाल पत्थरों से निर्मित।

  • 2 मंजिला इमारत 84 खंभों पर टिकी है। सामने का हिस्सा मुगल शैली, पीछे का बौद्ध शैली में प्रतीत होता है।

  • 12 फरवरी, 1937 को महाराज बृजेंद्र सिंह ने गंगा की मूर्ति प्रतिष्ठित करवाई।

  • साथ ही गंगा मैया के वाहन मगरमच्छ की विशाल मूर्ति भी विराजमान है।

उषा मंदिर (बयाना)

  • कन्नौज के महाराजा महिपाल की रानी चित्रलेखा ने भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की पत्नी के नाम पर 956 ई. में निर्माण करवाया।

  • बाद में आक्रमणकारियों ने तुड़वाकर इसे उषा मस्जिद का रूप दे दिया।

लक्ष्मण मंदिर

  • महाराजा बलदेव सिंह ने शुरू करवाया, महाराजा बलवंत सिंह ने पूरा किया। भरतपुर शहर के मध्य स्थित है।

गोकुलचन्द्र मंदिर, कामां

  • कामवन व काम्यक वन के नाम से प्रसिद्ध कामां में पुष्टिमार्गीय वैष्णवों के आराध्य गोकुलचन्द्र का प्रसिद्ध मंदिर है।


भीलवाड़ा जिले के प्रमुख मंदिर

सवाई भोज मंदिर (देवनारायण जी का मंदिर)

  • आसींद (भीलवाड़ा) में खारी नदी के तट पर स्थित लगभग ग्यारह सौ वर्ष पुराना मंदिर।

  • गुर्जर जाति के आराध्य, 24 बगड़ावत भाइयों में से एक सवाई भोज को समर्पित, इसलिए यह नाम पड़ा। गुर्जर समाज इन्हें विष्णु का अवतार/आयुर्वेद ज्ञाता मानता है।

  • मंदिर में कोई मूर्ति नहीं, केवल ईंट की पूजा नीम की पत्तियों से होती है।

  • भाद्रपद शुक्ला छठ को विशाल मेला लगता है।

  • देवनारायण जी की फड़ राजस्थान की सबसे लंबी और प्राचीन फड़ है, जिस पर 1992 में 5 रुपये का टिकट जारी हुआ था। इसे बांचने के लिए जंतर वाद्य यंत्र का उपयोग होता है।

शाहपुरा का रामद्वारा

  • शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय का प्रधान मठ है। संस्थापक श्री रामचरण जी महाराज ने 1751 में मुख्य गद्दी स्थापित की।

  • प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक फूलडोल महोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।

बाईसा महारानी का मंदिर

  • गंगापुर (भीलवाड़ा) में ग्वालियर के महाराजा महादजी सिंधिया की पत्नी महारानी गंगाबाई की स्मृति में निर्मित।

  • वे उदयपुर के महाराणा और उमराव देवगढ़ राव के बीच सुलह कराने गई थीं, लौटते समय देहांत हो गया। यहाँ उनकी छतरी और मूर्ति है।

भीलवाड़ा के अन्य महत्वपूर्ण मंदिर

  • हरणी महादेव मंदिर – शिवरात्रि पर विशाल मेला, झुकी चट्टान के नीचे शिव मंदिर।

  • तिलस्वा महादेव मंदिर – मांडलगढ़ के पास, शिवरात्रि को मेला, चर्म रोग निवारण के लिए प्रसिद्ध जलकुंड।

  • धनोप माता मंदिर – धनोप गांव में राजा धुंध की कुलदेवी, चैत्र सुदी एकम से दशमी तक विशाल मेला।

  • अन्य शीर्ष मंदिर: कुशाल माता (बदनौर), देवडूंगरी (पुर), बिजासन माता (मांडलगढ़), यक्षणी माता (माण्डल), महानालेश्वर व हजारेश्वर (मेनाल), चावंड माता व नृसिंह मंदिर (हमीरगढ़), जोगणिया माता (ऊपरमाल), चारभुजा नाथ मंदिर (मांडलगढ़)।

बीकानेर, बूंदी और चित्तौड़गढ़ के प्रसिद्ध मंदिर: आस्था, इतिहास और चमत्कारों का संगम

राजस्थान की माटी में अनेक ऐसे मंदिर हैं जो न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र हैं बल्कि अद्भुत स्थापत्य कला और लोक आस्था के प्रतीक भी हैं। इस लेख में हम बीकानेर, बूंदी और चित्तौड़गढ़ जिलों के उन प्रमुख मंदिरों का वर्णन कर रहे हैं, जो हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।


बीकानेर जिले के प्रमुख मंदिर

करणी माता का मंदिर, देशनोक

  • करणी माता को बीकानेर के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी तथा चारणों की कुलदेवी कहा जाता है।

  • उन्हें चूहों वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनका बचपन का नाम रिद्धि बाई था।

  • इनका प्रसिद्ध मंदिर देशनोक (बीकानेर) में स्थित है।

  • मंदिर में सफेद चूहे पाए जाते हैं जिन्हें काबा कहा जाता है। काबा के दर्शन अत्यंत शुभ माने जाते हैं।

  • करणी माता का प्रमुख मेला चैत्र व आश्विन के नवरात्र में भरता है।

  • मंदिर परिसर में सावन-भादो कड़ाइयाँ स्थित हैं।

भांडासर के जैन मंदिर

  • इस भव्य जैन मंदिर में जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर सुमितनाथ की प्रतिमा विराजित है।

  • ओसवाल महाजन भांडाशाह ने मंदिर का निर्माण 1468 ई. में प्रारंभ करवाया था, जो 1514 ई. में पूर्ण हुआ।

  • इस मंदिर की प्रथम मंजिल के निर्माण में पानी के स्थान पर घी का प्रयोग किया गया था, इसी कारण यह घी वाला मंदिर भी कहलाता है।

मुकाम – तालवा, नोखा (बीकानेर)

  • यह विश्नोई संप्रदाय का प्रमुख पवित्र तीर्थ स्थान है।

  • यहां विश्नोई संप्रदाय के प्रवर्तक जाम्भोजी का समाधि स्थल है। जाम्भोजी ने 1526 ईस्वी में यहां समाधि ली थी।

  • जाम्भोजी का वास्तविक नाम धनराज था। उन्हें विष्णु के अवतार, गूंगा-गहला, और पर्यावरण वैज्ञानिक जैसे नामों से भी जाना जाता है।

श्री कोलायत जी

  • सांख्य दर्शन के प्रतिपादक कपिल मुनि की तपोभूमि श्री कोलायतजी का महत्व गंगा स्नान के समान माना जाता है।

  • यहां पर कार्तिक पूर्णिमा को प्रसिद्ध मेला भरता है।

  • परिसर में कपिल मुनि का मंदिर भी स्थित है।

बीकानेर के अन्य शीर्ष मंदिर

  • नागणेशी माता का मंदिर (बीकानेर)

  • लक्ष्मीनारायण मंदिर (बीकानेर)

  • धुनीनाथ मंदिर (बीकानेर)

  • भैरव मंदिर (कोडमदेसर)

  • रतन बिहारी मंदिर (बीकानेर)

  • हेरम्ब गणपति (बीकानेर)

  • रसिक बिहारी मंदिर (बीकानेर)

  • कपिल मुनि मंदिर (कोलायत)


बूंदी जिले के प्रमुख मंदिर

केशवरायजी का मंदिर

  • इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण बूंदी के राजा शत्रुसाल ने 1601 ईस्वी में करवाया था।

  • यहां के अन्य मंदिरों में पंच शिवलिंग, अंजनी माता के मंदिर, हनुमान जी के मंदिर, तथा पांडवों की गुफा आदि स्थित हैं।

  • केशोरायपाटन में सुब्रतनाथ मुन्नी का प्रसिद्ध जैन मंदिर भी मौजूद है।

बिजासन माता का मंदिर, इंद्रगढ़

  • बूंदी के इंद्रगढ़ में स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर को इंद्रगढ़ माता का मंदिर भी कहा जाता है।

बूंदी के अन्य शीर्ष मंदिर

  • रक्त दन्तिका माता का मंदिर – सतूर

  • केदारेश्वर महादेव मंदिर – बाणगंगा

  • खटकड़ महादेव मंदिर – नैनवा

  • सतूर माता का मंदिर – बूंदी

  • हुडेश्वर महादेव मंदिर – हिण्डोली

  • लड़केश्वर महादेव मंदिर – बूंदी


चित्तौड़गढ़ जिले के प्रमुख मंदिर

श्रृंगार चंवरी (शांतिनाथ जैन मंदिर)

  • चित्तौड़गढ़ किले में स्थित इस मंदिर का निर्माण महाराणा कुंभा के कोषाधिपति के पुत्र वेल्का ने करवाया था।

  • यह मंदिर राजपूत व जैन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है।

  • यहां कुंभा की पुत्री रमाबाई की चंवरी बनी हुई है।

मीरा मंदिर

  • मेवाड़ के राणा सांगा के द्वितीय पुत्र भोज की पत्नी मीराबाई के इस मंदिर में मीरा की प्रतिमा के स्थान पर केवल एक तस्वीर लगी है।

  • सामने उनके गुरु संत रैदास की छतरी है।

  • यह मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इंडो-आर्य शैली में निर्मित है।

  • मीराबाई श्रीकृष्ण की परम भक्त थीं।

समिद्धेश्वर मंदिर (मोकल जी का मंदिर)

  • इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में मालवा के परमार राजा भोज ने करवाया था।

  • एक प्राप्त शिलालेख के अनुसार इसका जीर्णोद्धार महाराणा मोकल ने सूत्रधार जेता के निर्देशन में 1428 में करवाया, अतः इसे मोकल जी का मंदिर भी कहते हैं।

  • मंदिर नागर शैली में बना है।

मातृकुंडिया, राशमी (चित्तौड़गढ़)

  • यह तीर्थस्थल राशमी पंचायत समिति के हरनाथपुरा गांव के पास बनास एवं चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित है।

  • इसे मेवाड़ का हरिद्वार या मेवाड़ का प्रयाग भी कहा जाता है।

  • यहां जल में अस्थियां प्रवाहित की जाती हैं।

  • यहां लक्ष्मण झूला भी स्थित है।

सतबीसी जैन मंदिर

  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंदर 11वीं सदी में बना यह भव्य जैन मंदिर 27 देवरियों (27 छोटे-छोटे मंदिर) के कारण सतबीस देवरी कहलाता है।

सांवलिया जी मंदिर, मंडफिया

  • विश्वविख्यात यह मंदिर चित्तौड़गढ़ के मंडफिया गांव में स्थित है।

  • यहां भगवान श्रीकृष्ण की काले पत्थर से बनी मूर्ति विराजमान है।

  • श्रद्धालु इन्हें प्रेम से सांवलिया सेठ भी कहते हैं।

बाडोली के शिव मंदिर

  • इस मंदिर का निर्माण परमार राजा हून ने करवाया था।

  • यह चंबल और बामणी नदी के संगम क्षेत्र में राणा प्रताप सागर बांध के पास भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है।

  • यह 9 मंदिरों का समूह है, जिसमें सबसे प्रमुख घोटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

  • यह गुर्जर प्रतिहार कला का उत्कृष्ट नमूना है।

तुलजा भवानी मंदिर

  • इसका निर्माण उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंतिम द्वार रामपोल से दक्षिण की ओर करवाया था।

  • मंदिर के पास पुरोहित जी की हवेली भी स्थित है।

  • यह छत्रपति शिवाजी की आराध्य देवी थीं।

असवारी माता का मंदिर (आवरी माता मंदिर)

  • यह चित्तौड़गढ़ की भदेसर पंचायत समिति के निकट निकुंभ में स्थित है।

  • इस मंदिर में लकवे के मरीजों का विशेष इलाज किया जाता है।

  • यहां दो तिबारियाँ हैं, जिनमें से बीमार बच्चे को निकाला जाता है।

चित्तौड़गढ़ का कुंभ श्याम मंदिर एवं कालिका माता मंदिर

  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित ये दोनों मंदिर आठवीं सदी में निर्मित हैं तथा प्रतिहारकालीन मंदिर हैं।

  • ये महामारू शैली के उदाहरण हैं।

  • कालिका माता मंदिर गोहिल वंश की इष्ट देवी को समर्पित है।

  • महाराणा कुंभा ने कुंभ श्याम मंदिर का जीर्णोद्धार 15वीं सदी में करवाया था।

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