मारवाड़ का इतिहास
मारवाड़ क्षेत्र पर लंबे समय तक राठौड़ वंश का शासन रहा। इस वंश की वास्तविक उत्पत्ति को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं, और अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं:
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परंपरागत भाट-साहित्य में राठौड़ों को हिरण्यकश्यप के वंशज के रूप में दर्शाया गया है।
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जोधपुर रियासत की ऐतिहासिक ख्यातों में इनका संबंध राजा विश्वुतमान के पुत्र वृहदबल से जोड़ा गया है।
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इतिहासकार दयालदास इन्हें सूर्यवंशी शाखा और ब्राह्मण भल्लराव की संतान मानते हैं।
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मुहणौत नैणसी के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ मूलतः कन्नौज से यहाँ आकर बसे।
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कर्नल जेम्स टॉड ने वंशावली-अध्ययन के आधार पर इन्हें सूर्यवंशी घोषित किया।
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मतभेदों के बावजूद अधिकांश विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि राठौड़ों का संबंध दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट राजवंश से रहा है।
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इस प्रकार राठौड़ वंश की दो कड़ियाँ मानी जाती हैं — एक कन्नौज के गहडवाल वंश से, और दूसरी दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से।
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भारत की आज़ादी के समय क्षेत्रफल की दृष्टि से मारवाड़ राजस्थान की सबसे विशाल रियासत थी।
राव सीहा — वंश के आदिपुरुष
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राव सीहा को राजस्थान में राठौड़ों का मूल पुरुष माना जाता है; परंपरा इन्हें कन्नौज-नरेश गहडवाल जयचन्द की वंश-परंपरा से जोड़ती है।
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कहा जाता है कि पालीवाल ब्राह्मण समुदाय को सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से ये कन्नौज छोड़कर मारवाड़ आ बसे।
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इनकी राजधानी खेड़ (वर्तमान बाड़मेर) थी।
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इनकी स्मृति में बनी छतरी पाली के बीठू गाँव में स्थित है।
राव धूहड़
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इन्होंने कुलदेवी नागणेची माता की प्रतिमा कर्नाटक क्षेत्र से लाकर बाड़मेर के नागाणा गाँव में मंदिर स्थापित करवाया।
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प्रसिद्ध लोकदेवता पाबूजी इनके छोटे भाई धाँधल के पुत्र थे।
राव मल्लीनाथ
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इनकी राजधानी मेवानगर (बाड़मेर) थी।
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पश्चिमी राजस्थान में मल्लीनाथ जी को लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है।
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इन्हीं के नाम पर बाड़मेर क्षेत्र 'मालाणी' कहलाता है।
परंपरा के अनुसार गणगौर पर्व पर 'गींदोली' के गीत गाए जाते हैं।
मल्लीनाथ के बाद के प्रारंभिक शासक
राव मल्लीनाथ के पश्चात कुछ पीढ़ियों तक राठौड़ सत्ता छोटे-छोटे ठिकानों में बँटी रही और सतत संघर्ष के दौर से गुज़रती रही। इस कड़ी में राव आस्थान (जिन्होंने पाली-खेड़ क्षेत्र को सुदृढ़ किया, पर दिल्ली सल्तनत के शासक जलालुद्दीन खिलजी से युद्ध में मारे गए), तथा इसके बाद कान्हा, राव सोनगजी, राव दूहड़ (द्वितीय) व राव वीरमदेव जैसे शासक आते हैं, जिन्होंने मंडोर क्षेत्र में राठौड़ी सत्ता को क्रमशः विस्तार दिया। इन्हीं वीरमदेव के पुत्र राव चूण्डा को मारवाड़ का पहला सुदृढ़ एवं प्रभावी शासक माना जाता है, जिन्होंने राजधानी को मंडोर स्थानांतरित किया।
राव चूण्डा (1394–1423 ई.)
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मंडौर के प्रतिहार शासक ने अपनी पुत्री का विवाह चूण्डा से किया और दहेज-स्वरूप मंडौर क्षेत्र सौंप दिया; इस प्रकार राठौड़ों की राजधानी अब मंडौर बन गई।
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इनकी रानी चाँद कंवर के नाम पर जोधपुर में चाँद बावड़ी बनवाई गई।
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सन् 1423 में पूगल (बीकानेर क्षेत्र) के भाटी सरदारों ने छल से इनकी हत्या कर दी।
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चूण्डा ने अपने छोटे पुत्र कान्हा को गद्दी सौंपी, जिससे नाराज़ होकर बड़ा पुत्र रणमल मेवाड़ चला गया और अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से करवाया। आगे चलकर मेवाड़ की सैन्य सहायता से ही रणमल मारवाड़ की गद्दी पर बैठे।
राव जोधा (1438–1489 ई.)
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रणमल के पुत्र जोधा ने 1438 में चित्तौड़ में पिता की हत्या के बाद कुछ समय जंगलों में बिताकर अपनी शक्ति संगठित की, और 1453 की आँवल-बाँवल संधि के ज़रिए मंडौर पुनः प्राप्त किया।
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1459 में जोधपुर नगर की नींव रखी गई। चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण शुरू हुआ — दुर्ग की नींव रणमल की धर्म-बहन करणी माता ने रखी थी, और 1460 में दुर्ग परिसर में चामुण्डा माता का मंदिर बनवाया गया।
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जोधा ने दिल्ली सल्तनत के शासक बहलोल लोदी की सेना को युद्ध में परास्त किया।
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इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा इन्हें जोधपुर का पहला प्रतापी शासक मानते हैं।
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इनकी रानी जसमादे ने जोधपुर में राणीसर तालाब बनवाया।
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जोधा के पुत्र बीका ने आगे चलकर बीकानेर रियासत की स्थापना की।
राव मालदेव (1531–62 ई.)
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मालदेव का जन्म 5 दिसंबर 1511 को हुआ; इनकी माता पद्मा कुमारी सिरोही के जगमाल देवड़ा की पुत्री थीं।
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विश्वेश्वरनाथ रेऊ, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा और गोपीनाथ शर्मा जैसे इतिहासकारों का मानना है कि मालदेव अपने पिता राव गांगा की हत्या करके ही सत्ता में आए।
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गद्दी संभालते समय इनके अधीन केवल जोधपुर और सोजत (जहाँ राजतिलक हुआ) थे, परंतु आगे चलकर विस्तारवादी नीति अपनाते हुए इन्होंने 52 युद्ध लड़कर कुल 58 परगनों पर अधिकार जमाया।
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प्रमुख विजयें — 1533 में जैसलमेर के भाटियों को हराकर फलौदी, 1535 में बौलत खाँ को हराकर नागौर, 1536 में सीरवियों को हराकर बिलाड़ा, 1538 में डूंगर सिंह को हराकर सिवाणा जीता। 1539 में वीर सीधल को पराजित कर भाद्राजुण व रायपुर पर कब्ज़ा किया, और सिकंदर खाँ को हराकर जालौर पर अधिकार जमाया। पिता गांगा के शासनकाल में भी सोजत व सेवकी के युद्धों में इन्होंने विजय प्राप्त की थी।
पाहेबा/साहेबा का युद्ध (1541 ई.) — मालदेव बनाम जैतसी (बीकानेर)
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युद्ध में जैतसी की मृत्यु हुई और मालदेव विजयी रहे, जिससे बीकानेर पर उनका अधिकार हो गया। उन्होंने कूम्पा को बीकानेर का प्रशासक नियुक्त किया। पराजित पक्ष के उत्तराधिकारी कल्याणमल ने एक हाथी को लेकर हुए विवाद के बाद दिल्ली के शासक शेरशाह सूरी से सहायता माँगी।
मालदेव और हुमायूँ के संबंध
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चौसा तथा कन्नौज के युद्धों में शेरशाह से पराजित होने के बाद हुमायूँ राजस्थान से गुज़र रहा था। जोगी तीर्थ नामक स्थान से उसने मीर समंद, रायमल सोनी और अतका खाँ — इन तीन दूतों को मालदेव के पास सहायता-याचना के लिए भेजा।
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मालदेव ने बीकानेर क्षेत्र और सैन्य सहायता का आश्वासन दिया।
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परंतु हुमायूँ को मालदेव की नीयत पर संदेह हुआ, और अपने पुस्तकालयाध्यक्ष मुल्ला सुर्ख की सलाह पर वह सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) की ओर चला गया।
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वहाँ उसने अमरकोट के शासक वीरसाल सोढ़ा के यहाँ शरण ली।
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इतिहासकारों का मानना है कि यदि उस समय मालदेव और हुमायूँ परस्पर समझ बना पाते, तो शेरशाह के विरुद्ध गठबंधन बनाकर भारत से अफगान सत्ता को समाप्त किया जा सकता था।
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आगे चलकर अकबर के समय जो मुग़ल-राजपूत संबंध विकसित हुए, उनकी नींव शायद इसी दौर में पड़ सकती थी।
मालदेव–शेरशाह सूरी संघर्ष: गिरी सुमेल / जैतारण का युद्ध (1544 ई.)
युद्ध के दोनों पक्ष — मालदेव (सेनापति कूम्पा व जैता) बनाम शेरशाह सूरी (सहयोगी: कल्याणमल-बीकानेर, वीरमदेव-मेड़ता/नागौर)।
संघर्ष के प्रमुख कारण:
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दोनों ही शासकों की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएँ टकरा रही थीं।
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मालदेव का बढ़ता राज्य दिल्ली सल्तनत की सीमाओं को छूने लगा था, जो शेरशाह के लिए चिंता का विषय था।
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हुमायूँ को सुरक्षित निकल जाने देने और उसकी सहायता का प्रयास करने के कारण शेरशाह मालदेव से नाराज़ था।
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कल्याणमल और वीरमदेव जैसे राठौड़-विरोधी सामंतों का साथ पाकर शेरशाह ने राठौड़ों में फूट का लाभ उठाने की रणनीति अपनाई।
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शेरशाह की चतुराई-भरी रणनीति के चलते मालदेव युद्धक्षेत्र से जोधपुर लौट गए, जबकि जैता और कूम्पा ने डटकर मुकाबला जारी रखा। अंततः जलाल खाँ जलवानी की मदद से शेरशाह विजयी हुआ, पर इतनी कठिन लड़ाई के बाद उसने स्वयं कहा था कि 'मुट्ठी भर बाजरे के लिए वह हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता।' उल्लेखनीय है कि शेरशाह के पास लगभग 80,000 सैनिक थे, जबकि जैता-कूम्पा की सेना मात्र 12,000 के आसपास थी।
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इसके बाद मालदेव बाड़मेर की पहाड़ियों में स्थित सिवाणा चले गए, जो राठौड़ों के लिए परंपरागत शरणस्थली रहा है, और शेरशाह ने जोधपुर पर कब्ज़ा कर लिया।
मालदेव और मेवाड़ के संबंध
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खानवा के युद्ध के समय मारवाड़ के युवराज के रूप में इन्होंने राणा सांगा का साथ दिया था।
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1533 में गुजरात के बहादुरशाह के विरुद्ध विक्रमादित्य की सहायता की।
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शुरुआत में बनवीर के विरुद्ध उदयसिंह का साथ दिया, परंतु बाद में उदयसिंह से मतभेद होने पर हरमाड़ा के युद्ध में उदयसिंह के विरोधी अजमेर के हाजी खाँ पठान का समर्थन किया।
रानी उमादे
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जैसलमेर-नरेश लूणकरण भाटी की पुत्री उमादे, दासी भारमली से जुड़े किसी प्रसंग के कारण मालदेव से रुष्ट हो गई थीं, जिस कारण इन्हें 'रूठी रानी' कहा जाता है। इन्होंने अपने जीवन का कुछ समय तारागढ़ किले में और बाद का समय राजसमंद के केलवा गाँव में बिताया।
मालदेव के समकालीन विद्वान
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आसानन्द — इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं 'उमादे भटियाणी रा कवित', 'बाघा भारमली का दूहा' तथा 'गोगाजी री पेढी'। ये स्वयं पाहेबा के युद्ध में भी शामिल हुए थे।
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ईसरदासजी — इनकी रचनाओं में 'हाला झाला री कुंडलिया' (सूर सतसई), 'देवीयाण' और 'हरिरस' प्रमुख हैं। पश्चिमी राजस्थान में इन्हें लोकदेवता माना जाता है।
मालदेव के निर्माण-कार्य
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मेड़ता, रीयां (नागौर), सोजत (पाली) और पोकरण (जैसलमेर) में इन्होंने कई दुर्गों का निर्माण करवाया।
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जोधपुर नगर के चारों ओर परकोटा बनवाया।
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इनकी रानी स्वरूपदे ने मंडौर में स्वरूपसागर तालाब (जिसे 'बहूजी रो तालाब' भी कहा जाता है) का निर्माण करवाया।
प्राप्त उपाधियाँ
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हिन्दू बादशाह
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हशमत वाला राजा
फ़ारसी इतिहासकार निज़ामुद्दीन की कृति 'तबकात-ए-अकबरी' तथा फ़रिश्ता की 'तारीख़-ए-फ़रिश्ता' में मालदेव को उस समय के हिन्दुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक बताया गया है।
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7 नवंबर 1562 को मालदेव का देहांत हुआ। अपने बड़े पुत्र रामसिंह से अप्रसन्न होकर उन्होंने उसे राज्य-निष्कासित कर दिया, उदयसिंह को भी उत्तराधिकारी नहीं बनाया, और तीसरे पुत्र चन्द्रसेन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया — जिससे नाराज़ रामसिंह व उदयसिंह अकबर की शरण में चले गए।
राव चन्द्रसेन (1562–81 ई.)
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बड़े भाई राम सहायता की तलाश में अकबर के दरबार पहुँचे, जिस पर अकबर ने राम के समर्थन में जोधपुर पर चढ़ाई कर दी (मुग़ल सेनापति हुसैन कुली बेग के नेतृत्व में)। इस दौरान चन्द्रसेन जालौर के भाद्राजूण क्षेत्र में शरण लेने चले गए। इतिहासकार विश्वेश्वरनाथ रेऊ इस आक्रमण का कारण हुमायूँ के प्रति मालदेव के असहयोग को मानते हैं।
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1570 में चन्द्रसेन अकबर के नागौर दरबार में उपस्थित तो हुए, परंतु अकबर का झुकाव उदयसिंह की ओर देखकर बिना मुलाकात किए ही वापस लौट गए।
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इस घटना की अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं — रामकरण आसोपा के अनुसार अकबर ने स्वयं चन्द्रसेन को भेंट का निमंत्रण भेजा था; विश्वेश्वरनाथ रेऊ के अनुसार अकबर चाहते थे कि चन्द्रसेन केवल नाममात्र अधीनता स्वीकार कर लें तो जोधपुर उन्हें सौंप दिया जाएगा; जबकि अबुल फज़ल और बदायूँनी का दावा है कि चन्द्रसेन ने अधीनता स्वीकार कर ली थी — यह दावा संदेहास्पद माना जाता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में न तो चन्द्रसेन को दरबार छोड़कर भागने की ज़रूरत पड़ती, न ही अकबर भाद्राजूण पर हमला करता।
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अकबर की सेना ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया, जिसके बाद चन्द्रसेन बाड़मेर के सिवाणा क्षेत्र चले गए। आगे के वर्षों में वे कांणूजा तथा पीपलूद की पहाड़ियों में रहकर मुग़ल-विरोध जारी रखते रहे।
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जीवनभर संघर्षरत रहने के बावजूद चन्द्रसेन ने कभी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
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1581 में सांरण की पहाड़ियों में सिंचयाई (पाली) नामक स्थान पर बैरीसाल नामक सामंत द्वारा विष दिए जाने से इनकी मृत्यु हो गई।
चन्द्रसेन को दी गई उपाधियाँ
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मारवाड़ का प्रताप (विश्वेश्वरनाथ रेऊ के अनुसार)
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प्रताप के मार्गदर्शक/अग्रगामी
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मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा
चन्द्रसेन और महाराणा प्रताप — समान बिंदु
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दोनों ने ही मुग़ल अधीनता स्वीकार करने से इनकार किया।
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दोनों ने संघर्ष के लिए छापामार युद्ध-शैली अपनाई।
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दोनों को अपने ही भाइयों के विरोध का सामना करना पड़ा — प्रताप को जगमाल व सगर से, चन्द्रसेन को राम व उदयसिंह से।
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अकबर ने दोनों के अधिकांश राज्य पर कब्ज़ा कर लिया था, फिर भी शेष बची भूमि के सहारे दोनों ने संघर्ष जारी रखा।
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दोनों को अपने राज्य से बाहर शरण लेनी पड़ी — प्रताप को बांसवाड़ा के छप्पन क्षेत्र में, चन्द्रसेन को डूंगरपुर के शासक आसकरण के यहाँ।
दोनों के बीच अंतर
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प्रताप का मुग़ल-विरोध राजतिलक के साथ ही शुरू हो गया था, जबकि चन्द्रसेन का विरोध नागौर दरबार की घटना के बाद प्रारंभ हुआ।
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प्रताप की मृत्यु के बाद भी उनके पुत्र अमरसिंह ने संघर्ष जारी रखा, परंतु चन्द्रसेन की मृत्यु के साथ ही उनका आंदोलन समाप्त हो गया।
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प्रताप ने हल्दीघाटी और दिवेर जैसे युद्धों में मुग़ल सेना का सीधा सामना किया, जबकि चन्द्रसेन को ऐसा अवसर नहीं मिला।
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प्रताप ने चावंड को स्थायी केंद्र बनाया, जबकि चन्द्रसेन कोई स्थायी केंद्र स्थापित नहीं कर सके।
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प्रताप का संघर्ष मेवाड़ की जनता में राष्ट्रीय भावना जगाने में सफल रहा, जबकि चन्द्रसेन ऐसा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
इन अंतरों के बावजूद चन्द्रसेन को 'मारवाड़ का प्रताप' कहना उचित माना जाता है, क्योंकि भौगोलिक दृष्टि से उनकी परिस्थितियाँ कहीं अधिक प्रतिकूल थीं। मेवाड़ पहाड़ी क्षेत्र था जो छापामार युद्ध के अनुकूल था, जबकि चन्द्रसेन के पास समतल मरुस्थलीय भूभाग था, जहाँ लंबे समय तक छापामार रणनीति चला पाना कठिन था। साथ ही, प्रताप को भामाशाह व ताराचंद जैसे उदार सहयोगियों का साथ मिला, जिसकी कमी चन्द्रसेन को हमेशा खलती रही।
नागौर दरबार (1570 ई.)
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इस दरबार का आयोजन स्वयं अकबर ने करवाया था।
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सार्वजनिक रूप से इसका उद्देश्य अकाल-राहत बताया गया था।
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वास्तविक मकसद राजस्थान के शासकों से अधीनता स्वीकार करवाना था।
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इस अवसर पर बीकानेर के कल्याणमल, जैसलमेर के हरराज, और चन्द्रसेन के भाई उदयसिंह सहित कई शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार की।
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इसी अवधि में अकबर ने नागौर में शुक्र तालाब का निर्माण भी करवाया।
नागौर दरबार का ऐतिहासिक महत्व
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बिना युद्ध लड़े, केवल कूटनीति के बल पर अकबर ने राजस्थान के कई शासकों को अपने अधीन कर लिया।
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इस घटनाक्रम ने राजस्थान के शासकों को दो स्पष्ट खेमों में बाँट दिया — मुग़ल-समर्थक और मुग़ल-विरोधी।
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मानसिंह (आमेर) और रायसिंह (बीकानेर) जैसे मुग़ल-आश्रित शासकों की एक शृंखला यहीं से आरंभ हुई।
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संघर्ष थमने से क्षेत्र में शांति स्थापित हुई, जिसने कला और संस्कृति के विकास को प्रोत्साहन दिया।
1572–74 के दौरान अकबर ने बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया था; बाद में जोधपुर को सीधे 'खालसा' (केंद्रीय नियंत्रण की भूमि) घोषित कर दिया गया।
चन्द्रसेन से जुड़े अन्य तथ्य
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सिवाणा दुर्ग की सुरक्षा के लिए इन्होंने पंता राठौड़ को नियुक्त किया था; बाद में मुग़ल सेनापति शाहबाज़ खान ने वह दुर्ग जीत लिया।
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रामपुरा क्षेत्र में हुए संघर्ष में इन्होंने मुग़ल सेनापति जलाल खान को मार गिराया।
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अक्टूबर 1576 में जैसलमेर के रावल हरराय ने पोकरण पर आक्रमण किया; मुग़लों के विरुद्ध धन की आवश्यकता के चलते चन्द्रसेन ने एक लाख 'फदिये' (सिक्के) लेकर पोकरण दुर्ग जैसलमेर को सौंप दिया।
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मुग़ल दबाव के दौर में चन्द्रसेन ने मेवाड़, सिरोही, डूँगरपुर, बांसवाड़ा और अजमेर जैसे क्षेत्रों में शरण ली।
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राव सुखराज, सूजा और देवीदास इनके प्रमुख साथी रहे।
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लोहावट के युद्ध में इन्होंने भाई उदयसिंह को और नाडौल के युद्ध में भाई राम को पराजित किया।
मोटा राजा उदयसिंह (1583–95 ई.)
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मारवाड़ के शासकों में सबसे पहले इन्होंने ही अकबर की अधीनता स्वीकार की थी (1570 के नागौर दरबार में)।
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अपनी पुत्री मानीबाई (जोधाबाई) का विवाह जहाँगीर से करवाया।
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मानीबाई को 'जगत गोसाई' (संसार की स्वामिनी) की उपाधि प्राप्त थी, और इनके पुत्र खुर्रम आगे चलकर शाहजहाँ के नाम से जाने गए।
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कल्ला रायमलोत
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ये उदयसिंह के भाई रायमल के पुत्र और सिवाणा के सामंत थे।
सामेला — वर-वधू की बारात के स्वागत के लिए आगे जाकर उसका अभिनंदन करने की परंपरा।
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1589 में अकबर ने सिवाणा पर हमला किया, जिसे सिवाणा का दूसरा साका कहा जाता है। कल्ला रायमलोत के नेतृत्व में केसरिया (मृत्यु तक संघर्ष) किया गया, और बूंदी के राव सुरजन की पुत्री भाण कंवर ने जौहर किया।
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बीकानेर के कवि पृथ्वीराज राठौड़ ने कल्ला रायमलोत की स्मृति में मरसिये (शोक-काव्य) रचे।
मरसिये — किसी वीर की मृत्यु के पश्चात उसकी वीरता के सम्मान में लिखे जाने वाले दोहे।
गजसिंह (1615–38 ई.)
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मुग़ल सम्राट जहाँगीर ने इन्हें 'दलथम्मन' (शत्रु सेनाओं को रोकने वाला) की उपाधि प्रदान की।
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अपनी प्रेयसी अनारा बेगम के आग्रह पर गजसिंह ने छोटे पुत्र जसवंत सिंह को जोधपुर की गद्दी सौंपी, जबकि बड़े पुत्र अमरसिंह को नागौर की जागीर दी गई।
समकालीन विद्वान
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केशवदास गाडण — रचनाएँ: 'गजगुणरूपक' तथा 'अमरसिंहजी रा दूहा'।
गजसिंह के निधन के बाद उनके दो पुत्रों — जसवंत सिंह (जोधपुर के उत्तराधिकारी) और अमरसिंह (नागौर के जागीरदार) — के बीच सत्ता का बँटवारा हुआ। अमरसिंह की जीवन-गाथा अपने आप में राजस्थानी वीर-काव्य का एक प्रसिद्ध अध्याय है।
अमरसिंह राठौड़ (नागौर के शासक)
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नागौर की गद्दी पर बैठे अमरसिंह का नाम राजस्थानी इतिहास में विशेष स्थान रखता है।
मतीरे री राड (1644 ई.) — अमरसिंह (नागौर) बनाम कर्णसिंह (बीकानेर)
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यह संघर्ष एक तरबूज़ (मतीरा) की फसल को लेकर नागौर के जाखणियाँ गाँव और बीकानेर के सीलवा गाँव की सीमा-रेखा पर हुआ था। इसका विवरण काशी छगांणी-कृत ग्रंथ 'छत्रपति रासौ' में मिलता है।
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शाहजहाँ के दरबार में इन्होंने 'मीर बख्शी' (रक्षा-मंत्री) सलावत खान की हत्या कर दी थी।
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वीरता के कारण इन्हें "कटार का धणी" कहा जाता है।
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इनकी हत्या स्वयं इनके साले अर्जुनसिंह गौड़ ने करवाई थी।
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नागौर में इनकी 16 स्तंभों वाली स्मारक-छतरी आज भी मौजूद है।
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आगरा किले के 'बुखारा दरवाज़े' को इन्हीं के नाम पर 'अमरसिंह दरवाज़ा' कहा जाता है — शाहजहाँ ने इसे बंद करवा दिया था, जिसे बाद में सन् 1809 में अंग्रेज़ अधिकारी जॉर्ज स्टील ने पुनः खुलवाया।
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समय के साथ अमरसिंह राठौड़ राजस्थानी लोकगीतों व लोककथाओं के एक लोकप्रिय नायक बन गए।
जसवंत सिंह (1638–78 ई.)
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राजतिलक के समय इनकी आयु मात्र 11 वर्ष थी, इसलिए आसोप के राजसिंह कूम्पावत को संरक्षक नियुक्त किया गया।
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इन्होंने मुग़ल उत्तराधिकार-संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई।
धरमत का युद्ध (मध्य प्रदेश, 1658 ई.)
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दाराशिकोह और औरंगज़ेब के बीच हुए इस संघर्ष में जसवंत सिंह और कासिम खाँ दाराशिकोह की ओर से सेनापति थे, किंतु कासिम खाँ की विश्वासघाती भूमिका के कारण दाराशिकोह को हार का सामना करना पड़ा।
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किंवदंती है कि युद्ध से लौटने पर जसवंत सिंह की रानी 'हाडी रानी जसवंत दे' ने किले के द्वार बंद कर दिए थे — इस प्रसंग को इतिहासकार कविराजा श्यामलदास ने प्रामाणिक माना है।
खजुआ का युद्ध (उत्तर प्रदेश, 1659 ई.)
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औरंगज़ेब और शुजा के बीच हुए इस युद्ध में जसवंत सिंह औरंगज़ेब के पक्ष से गए थे, परंतु आपसी अविश्वास के चलते उन्होंने औरंगज़ेब की छावनी लूट ली और जोधपुर लौट आए — इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से उनका सहयोग शुजा को मिल गया।
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बाद में आमेर-नरेश मिर्ज़ा राजा जयसिंह की मध्यस्थता से दोनों के बीच तनाव कम हुआ, और जसवंत सिंह को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया गया।
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1662 में मराठों के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता के लिए इन्हें दक्षिण भारत भेजा गया।
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1673 में औरंगज़ेब ने इन्हें काबुल का गवर्नर नियुक्त किया। 28 नवंबर 1678 को अफ़गानिस्तान के जमरूद नामक स्थान पर इनका निधन हुआ, जिस पर औरंगज़ेब ने टिप्पणी की थी कि 'आज कुफ्र (धर्म-विरोध) का द्वार टूट गया।'
जसवंत सिंह द्वारा रचित ग्रंथ
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आनन्द विलास
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भाषा भूषण
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प्रबोध चन्द्रोदय
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अपरोक्ष सिद्धान्तसार
इनके प्रमुख निर्माण-कार्य
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महाराष्ट्र में जसवंतपुरा नामक नगर की स्थापना की।
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जोधपुर में काका उद्यान बनवाया, जहाँ काबुल से लाए गए अनार के बीज रोपे गए।
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रानी अतिरंगदे ने जानसागर तालाब बनवाया, जिसे 'शेखावत जी का तालाब' भी कहा जाता है।
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रानी जसवंतदे ने राईका बाग में महल तथा कल्याण सागर तालाब (रातानाडा) का निर्माण करवाया।
जसवंत सिंह के समकालीन विद्वान
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मुहणौत नैणसी — जसवंत सिंह के दीवान और उस युग के सबसे प्रसिद्ध इतिहासकार-लेखक। पिता जयमल और माता स्वरूप देवी। ऋण-भार के कारण जसवंत सिंह ने इन्हें बंदी बनाया, जहाँ इन्होंने अपने भाई सुन्दरदास के साथ आत्महत्या कर ली। मुंशी देवीप्रसाद ने इन्हें 'राजपूताने का अबुल फज़ल' कहकर सम्मानित किया।
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इनकी कृति 'नैणसी री ख्यात' राजस्थान की पहली ख्यात मानी जाती है, जिसमें मारवाड़ के साथ-साथ अन्य रियासतों का भी विवरण मिलता है।
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दूसरी कृति 'मारवाड़ रा परगना री विगत' मारवाड़ का प्रशासनिक दस्तावेज़ है, जिसे 'मारवाड़ का गजट' भी कहा जाता है; इससे तत्कालीन जनगणना और कर-व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
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नरहरिदास — रचना: 'अवतार चरित्र'
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नवीन कवि — रचना: 'नेह निधान'
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सूरत मिश्र
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बनारसी दास
जसवंत सिंह के पुत्र
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पृथ्वीसिंह — जसवंत सिंह के पुत्र, जिन्होंने एक बार शेर से भी मुकाबला किया था। औरंगज़ेब ने इन्हें विषाक्त वस्त्र भेंट कर मरवा दिया।
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अजीत सिंह और दलथम्मन — दोनों जसवंत सिंह के पुत्र थे। औरंगज़ेब ने इन्हें दिल्ली में रूपसिंह राठौड़ की हवेली में नज़रबंद रखा। दिल्ली से जोधपुर लौटते समय रास्ते में दलथम्मन की मृत्यु हो गई।
इन्द्रसिंह राठौड़
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अमरसिंह राठौड़ के पौत्र और नागौर के शासक इन्द्रसिंह को औरंगज़ेब ने 36 लाख रुपये लेकर जोधपुर का राजा घोषित कर दिया, परंतु जोधपुर की प्रजा ने इस निर्णय को अस्वीकार कर दिया।
जोधपुर को 'खालसा' घोषित करने के पीछे औरंगज़ेब के उद्देश्य
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गुजरात के व्यापारिक केंद्रों को दिल्ली-आगरा से जोड़ने वाले मार्गों की सुरक्षा के लिए मारवाड़ पर सीधा नियंत्रण ज़रूरी समझा गया।
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अपनी हिन्दू-विरोधी नीति को आगे बढ़ाने के लिए वह किसी विश्वस्त समर्थक को जोधपुर की गद्दी पर बैठाना चाहता था।
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चूँकि जसवंत सिंह आरंभ से ही औरंगज़ेब के विरोधी रहे थे, इसलिए औरंगज़ेब इसका प्रतिशोध जोधपुर को नष्ट या पूर्णतः अधीन करके लेना चाहता था।
अजीत सिंह (1679–1724 ई.)
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दुर्गादास राठौड़, मुकुन्ददास खींची और गौरा नामक सहयोगियों की मदद से अजीत सिंह को सुरक्षित मारवाड़ लाया गया।
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गौरा को 'मारवाड़ की पन्नाधाय' के रूप में सम्मानित किया जाता है — मारवाड़ के राष्ट्रगीत 'धूंसो' में भी इनका उल्लेख मिलता है, और जोधपुर में इनकी स्मृति में छतरी बनी है।
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बाल अजीत सिंह को सिरोही क्षेत्र के कालिन्द्री गाँव में जयदेव पुरोहित के घर मुकुन्ददास की देखरेख में गुप्त रूप से पाला गया।
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औरंगज़ेब ने एक नकली बालक को 'मुहम्मदीराज' नाम देकर अजीत सिंह के रूप में प्रस्तुत किया और उसे अपनी पुत्री ज़ेबुन्निसा को सौंप दिया।
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मेवाड़-नरेश राजसिंह ने अजीत सिंह के पक्ष का समर्थन किया।
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1680 में देबारी (उदयपुर) के युद्ध में मुग़ल सेना ने मेवाड़-मारवाड़ की संयुक्त सेना को पराजित किया।
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दुर्गादास ने चतुराई से औरंगज़ेब के ही पुत्र अकबर को अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए उकसाया। 1 जनवरी 1681 को नाडोल (पाली) में अकबर को मुग़ल बादशाह घोषित कर दिया गया, परंतु औरंगज़ेब की कूटनीति के आगे अकबर को दक्षिण भारत में मराठा शासक शंभाजी की शरण लेनी पड़ी।
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अकबर की संतानें बुलन्द अख्तर और सफ़ीयतुन्निसा का पालन-पोषण दुर्गादास राठौड़ ने ही किया — इन्हें बाड़मेर के जूना गाँव में जगन्नाथ रामचन्दोत के घर रखा गया और धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था की गई। 1695-96 में ईश्वरदास नागर के सुझाव पर दुर्गादास ने सफ़ीयतुन्निसा को औरंगज़ेब को सौंप दिया। इस निष्ठापूर्ण व्यवहार से प्रभावित होकर कट्टर हिन्दू-विरोधी औरंगज़ेब ने भी इन्हें मेड़ता परगना और एक लाख रुपये यात्रा-व्यय के रूप में भेंट किए। 1698 में दुर्गादास स्वयं बुलन्द अख्तर को लेकर औरंगज़ेब के समक्ष उपस्थित हुए, जिस पर औरंगज़ेब ने इन्हें 3000 ज़ात व 2000 सवार का मनसब तथा जैतारण, मेड़ता और सिवाणा के परगने प्रदान किए; अजीत सिंह को भी 1500 ज़ात व 500 सवार का मनसब देकर जालौर-सांचौर के परगने सौंपे गए।
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1708 में हुए देबारी समझौते के बाद अजीत सिंह विधिवत रूप से जोधपुर के शासक बने।
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गद्दी पर बैठते ही अजीत सिंह ने अपने ही उपकारी दुर्गादास राठौड़ को निर्वासित कर दिया।
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इन्होंने अपनी पुत्री इन्द्र कंवर का विवाह मुग़ल बादशाह फर्रुख़सियर से करवाया — इन्द्र कंवर अंतिम हिन्दू राजकुमारी थीं जिनका विवाह किसी मुग़ल शासक से हुआ।
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23 जून 1724 को इनके ही पुत्र बख्तसिंह ने इनकी हत्या करवा दी।
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इनके अंतिम संस्कार के समय कई पशु-पक्षी अग्नि में जलकर मारे गए थे, ऐसा वर्णन मिलता है।
अजीत सिंह द्वारा रचित ग्रंथ
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दुर्गापाठ भाषा
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गुणसागर
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निर्वाण रा दूहा
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अजीतसिंह री कविता
दुर्गादास राठौड़ — मारवाड़ के वीर सेनानायक
पिता: आसकरण | माता: नेत कंवर
जन्म: 13 अगस्त 1638 | जन्म-स्थान: सालवा (जोधपुर)
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पिता आसकरण से इन्हें लूणवा की जागीर विरासत में मिली।
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अजीत सिंह को गद्दी दिलाने के लिए इन्होंने लगातार 30 वर्षों (1678–1708) तक संघर्ष किया, जिसे मारवाड़ के इतिहास में '30 वर्षीय संघर्ष' के नाम से जाना जाता है।
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मेवाड़-नरेश अमरसिंह द्वितीय ने इनकी सेवाओं के बदले रामपुरा और विजयपुर की जागीरें प्रदान कीं।
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इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने अपनी कृति 'जोधपुर राज्य का इतिहास' का दूसरा संस्करण इन्हीं को समर्पित किया था।
दुर्गादास के योगदान का मूल्यांकन
दुर्गादास राठौड़ ने अपना पूरा जीवन मातृभूमि और अपने स्वामी की रक्षा के लिए मुग़लों से संघर्ष करते हुए बिताया। यदि वे न होते, तो अजीत सिंह को अपना पैतृक राज्य वापस पाना संभवतः असंभव ही रहता। जिन राठौड़ सरदारों को स्वयं मालदेव भी एकजुट नहीं कर पाए थे, दुर्गादास ने उन्हीं को संगठित कर मुग़ल सत्ता को चुनौती दी। एक कुशल राजनयिक के रूप में उन्होंने न केवल अजीत सिंह की प्राण-रक्षा की, बल्कि उन्हें सिंहासन तक भी पहुँचाया — इसके लिए मेवाड़ से सहयोग लिया और यहाँ तक कि औरंगज़ेब के अपने पुत्र अकबर को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। जब यह विद्रोह असफल हुआ, तब भी उन्होंने अकबर को सुरक्षित दक्षिण भारत पहुँचाया और उसकी संतानों की देखभाल व शिक्षा की ज़िम्मेदारी निभाई। उनके इन्हीं मानवीय और वीरतापूर्ण गुणों ने कठोर हृदय औरंगज़ेब का भी सम्मान अर्जित किया — मेवाड़ और मराठा शासक शंभाजी के दरबार में भी उन्हें आदर प्राप्त था। इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के शब्दों में, दुर्गादास का नाम राठौड़ वंश के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
अभयसिंह (1724–49 ई.)
खेजड़ली का बलिदान
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भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787 (सन् 1730 ई.) को यह ऐतिहासिक घटना घटी।
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अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
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इस बलिदान की स्मृति में खेजड़ली में हर वर्ष 'वृक्ष मेला' आयोजित होता है, और पर्यावरण-संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए 'अमृतादेवी बिश्नोई पुरस्कार' प्रदान किया जाता है।
अभयसिंह के समकालीन विद्वान
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करणीदान — रचना: 'सूरज प्रकास' (बिडद सिणगार)
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वीरभाण — रचना: 'राजरूपक'
इन दोनों ग्रंथों से अहमदाबाद के युद्ध की जानकारी मिलती है, जिसमें अभयसिंह ने गुजरात के गवर्नर बुलन्द खाँ को पराजित किया था।
मानसिंह (1803–43 ई.)
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भाई भीमसिंह से मतभेद होने पर इन्होंने जालौर दुर्ग में शरण ली, जहाँ संत देवनाथ ने भविष्यवाणी की थी कि यही राजा बनेंगे।
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नाथ संप्रदाय के प्रति आस्था के चलते इन्होंने जोधपुर में महामंदिर बनवाया और 'नाथ चरित्र' नामक ग्रंथ की रचना भी की।
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इसी कारण इन्हें मारवाड़ का 'सन्न्यासी राजा' कहा जाता है।
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जोधपुर में 'मान पुस्तक प्रकाश' नामक पुस्तकालय की स्थापना इन्हीं के प्रयासों से हुई।
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16 जनवरी 1818 को अंग्रेज़ों के साथ संधि हुई, जिसमें अंग्रेज़ों की ओर से चार्ल्स मेटकॉफ तथा जोधपुर की ओर से युवराज छत्रसिंह व बिशनराम व्यास ने प्रतिनिधित्व किया।
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1827 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोही रहे नागपुर के शासक आपा साहिब भोंसले को जोधपुर में शरण दी, और अंग्रेज़ी क्षेत्र से भागकर आए ठगों को लौटाने से भी इनकार किया।
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1832 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक के अजमेर-दरबार का बहिष्कार किया।
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देवनाथ के निधन के बाद उनके पुत्र लाडुनाथ और भाई भीमनाथ के बीच उत्तराधिकार को लेकर विवाद हुआ, जिसे मानसिंह ने भीमनाथ के लिए उदय मंदिर बनवाकर शांत किया।
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आगे चलकर लक्ष्मीनाथ के नेतृत्व में नाथ संप्रदाय के अनुयायियों ने जोधपुर में अशांति फैलानी शुरू की, जिसे 1839 में अंग्रेज़ अधिकारी सदरलैंड ने नियंत्रित किया।
मानसिंह के समकालीन विद्वान
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कविराजा बांकीदास जी — इनकी कृति 'बांकीदास री ख्यात' में जोधपुर व जयपुर की स्थापना-तिथियों का उल्लेख मिलता है। अन्य रचनाएँ हैं 'मान जसो मण्डन', 'दातार बावनी' और 'कुकवि बतीसी'।
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एक लोकगीत 'आयो अंग्रेज मुल्क रे ऊपर' भी इसी काल से जुड़ा है, जिसमें उन राजाओं की आलोचना की गई है जिन्होंने अंग्रेज़ों का साथ दिया।
मानसिंह के पश्चात्: ब्रिटिश संरक्षण काल
मानसिंह की मृत्यु के बाद मारवाड़ पूर्ण रूप से ब्रिटिश अधीनता के दौर में प्रवेश कर गया। इस काल में निम्नलिखित शासक हुए —
तख्त सिंह (1843–73 ई.)
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मानसिंह की कोई प्रत्यक्ष संतान न होने पर आहवा (सिरोही) के ठिकानेदार तख्त सिंह को जोधपुर की गद्दी पर बिठाया गया।
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इनके शासनकाल में अंग्रेज़ों का प्रशासनिक हस्तक्षेप और अधिक बढ़ गया तथा रियासत में ब्रिटिश रेजिडेंट की भूमिका सुदृढ़ हुई।
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1857 के विद्रोह के समय जोधपुर रियासत ने अंग्रेज़ों का साथ दिया; इसी दौरान आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत के नेतृत्व में हुआ विद्रोह मारवाड़ के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है।
जसवंत सिंह द्वितीय (1873–95 ई.)
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इनके शासनकाल में जोधपुर में आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं, शिक्षा व रेलवे के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया।
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जोधपुर में चोपासनी तथा अन्य शिक्षण संस्थाओं की स्थापना इसी दौर में हुई।
सरदार सिंह (1895–1911 ई.)
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इनके समय जोधपुर में सरदार म्यूज़ियम व उम्मेद क्लब जैसी संस्थाओं की नींव पड़ी।
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आधुनिक पोलो खेल के संरक्षण में भी इनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।
सुमेर सिंह (1911–18 ई.)
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मात्र 13 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठे सुमेर सिंह के अल्पवय होने के कारण इडर के महाराजा सर प्रताप सिंह को संरक्षक (रीजेंट) नियुक्त किया गया।
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1911 के दिल्ली दरबार में इन्होंने सम्राट जॉर्ज पंचम के 'पेज ऑफ ऑनर' के रूप में भाग लिया।
उम्मेद सिंह (1918–47 ई.)
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अल्पायु में ही भाई सुमेर सिंह की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठे; प्रारंभिक वर्षों में शासन सर प्रताप सिंह की देखरेख में चला।
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इनके काल में जोधपुर में उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण करवाया गया, जो आज भी मारवाड़ की स्थापत्य-कला का प्रतीक है।
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रियासत में रेलवे, जलापूर्ति और शिक्षा जैसी आधुनिक सुविधाओं के विस्तार का श्रेय भी इन्हें दिया जाता है।
हनवंत सिंह (1947–49 ई.) — अंतिम शासक
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भारत की स्वतंत्रता के समय जोधपुर रियासत के अंतिम शासक हनवंत सिंह थे।
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प्रारंभ में उन्होंने भारत में विलय को लेकर कुछ हिचकिचाहट दिखाई, परंतु सरदार वल्लभभाई पटेल तथा वी.पी. मेनन के प्रयासों से अंततः जोधपुर रियासत का भारत संघ में विलय सम्पन्न हुआ।
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इस प्रकार 1949 में जोधपुर (मारवाड़) रियासत औपचारिक रूप से स्वतंत्र भारत का अभिन्न अंग बन गई, और राजस्थान राज्य के गठन में सम्मिलित हो गई।
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