उत्पत्ति सिद्धांत (पहले से चर्चित इमेज संदर्भ अनुसार)
- अग्निकुंड सिद्धांत (चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो) के अनुसार परमार वंश की उत्पत्ति भी आबू पर्वत पर वशिष्ठ मुनि के यज्ञकुंड से चार अग्निवंशी क्षत्रियों में से एक के रूप में हुई — परमार का अर्थ "शत्रु का नाश करने वाला" बताया गया है।
- अभिलेखीय साक्ष्यों (जैसे उदयपुर प्रशस्ति) में परमार स्वयं को पौराणिक ऋषि वशिष्ठ की गाय (नंदिनी) की रक्षा करने वाले वीर से उत्पन्न मानते हैं।
स्थापना व मुख्य शाखा (मालवा — धार)
- परमार वंश की स्थापना 9वीं शताब्दी में उपेंद्र (कृष्णराज) ने की, जो प्रारंभ में राष्ट्रकूटों के सामंत थे।
- मुख्य शाखा की राजधानी धार (वर्तमान मध्य प्रदेश) रही, जो आगे चलकर परमार वंश की सत्ता व संस्कृति का केंद्र बनी।
प्रमुख शासकों की सूची (मुख्य मालवा शाखा)
| शासक |
काल (लगभग) |
उपलब्धियाँ |
| उपेंद्र (कृष्णराज) |
9वीं शताब्दी प्रारंभ |
वंश-संस्थापक; राष्ट्रकूट सामंत के रूप में शुरुआत |
| सीयक द्वितीय (हर्ष) |
10वीं शताब्दी मध्य |
राष्ट्रकूटों से स्वतंत्र होकर स्वतंत्र सत्ता स्थापित की; उज्जैन पर विजय |
| वाक्पति मुंज (श्री वल्लभ) |
972-994 ई. |
विद्वानों (धनपाल आदि) का संरक्षक; चालुक्यों के विरुद्ध युद्ध में मारा गया |
| सिंधुराज |
994-1010 ई. |
मुंज का भाई; साम्राज्य पुनः संगठित किया |
| राजा भोज (भोज प्रथम) |
1010-1055 ई. |
वंश का सबसे प्रसिद्ध व विद्वान शासक; भोजशाला (उज्जैन/धार में संस्कृत शिक्षा केंद्र, देवी वाग्देवी/सरस्वती मंदिर) की स्थापना; स्वयं विद्वान — "समराङ्गण सूत्रधार", "सरस्वतीकंठाभरण" जैसे ग्रंथों के रचयिता माने जाते हैं; भोजपुर नगर व भोजताल झील का निर्माण |
| जयसिंह, उदयादित्य, नरवर्मन आदि |
11वीं-12वीं शताब्दी |
उत्तराधिकारी शासक; साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होता गया |
| अंतिम शासक |
14वीं शताब्दी (लगभग 1305 ई.) |
दिल्ली सल्तनत (अलाउद्दीन खिलजी) द्वारा मालवा विजय के साथ वंश का अंत |
राजा भोज — विशेष उल्लेख
- कला, साहित्य व शिक्षा के महान संरक्षक — इन्हीं के नाम पर धार जिले में भोजशाला मंदिर प्रसिद्ध है, जो वर्तमान में भी एक विवादित स्थल (भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर) के रूप में चर्चा में रहता है।
- जैन आचार्यों को भी संरक्षण दिया — जैन विद्वान धनपाल ने राजा भोज के दरबार में "तिलकमंजरी" नामक ग्रंथ की रचना की।
- भोज के समय परमार साम्राज्य सांस्कृतिक व साहित्यिक दृष्टि से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
राजस्थान में परमार वंश की शाखाएँ
मुख्य मालवा शाखा के अलावा परमार वंश की कई सामंती/स्वतंत्र शाखाएँ राजस्थान में भी स्थापित हुईं:
| शाखा |
क्षेत्र |
विशेषता |
| आबू के परमार (चंद्रावती) |
सिरोही (आबू क्षेत्र) |
धूमराज (आबू के तेजपाल मंदिर शिलालेख, 1230 ई. में उल्लिखित) जैसे शासक; इसी शाखा से गुहिलों/चौहानों से वैवाहिक-राजनीतिक संबंध रहे |
| वागड़ के परमार |
डूंगरपुर-बांसवाड़ा |
दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में सक्रिय स्वतंत्र सामंती शाखा |
| जालौर/भीनमाल क्षेत्र के परमार |
जालौर |
छोटी सामंती शाखा |
पतन के कारण
- उत्तराधिकार संघर्ष व आंतरिक विभाजन
- चालुक्यों (गुजरात के सोलंकी) व चंदेलों के साथ निरंतर संघर्ष से शक्ति क्षीण होना
- अंततः 13वीं-14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत (अलाउद्दीन खिलजी) के आक्रमण से मुख्य मालवा शाखा का अंत, जबकि राजस्थान की छोटी शाखाएँ धीरे-धीरे अन्य राजपूत शक्तियों में विलीन हो गईं
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