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राजस्थान की प्रमुख मस्जिदें, मीनारें और छतरियाँ | अजमेर दरगाह से लेकर तोपखाना मस्जिद तक की पूरी जानकारी | Notesmind

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By NotesMind
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राजस्थान की प्रमुख मस्जिदें, मीनारें एवं छतरियाँ – एक सम्पूर्ण धार्मिक एवं ऐतिहासिक यात्रा

राजस्थान, जो अपने किलों, महलों और राजपूत वीरता के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है, सूफी संतों, मस्जिदों, मीनारों और छतरियों की अद्भुत विरासत भी समेटे हुए है। यहाँ हिंदू-मुस्लिम स्थापत्य कला का अनूठा संगम देखने को मिलता है। आइए जानते हैं राजस्थान के ऐसे ही प्रमुख इस्लामिक स्थलों के बारे में।


1. ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह – अजमेर

अजमेर स्थित ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह न केवल भारत बल्कि विश्वस्तर पर कौमी एकता का प्रतीक है। इसे "भारत का मक्का" भी कहा जाता है। मक्का के बाद यह मुस्लिम सम्प्रदाय का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ स्थल है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • ख्वाजा साहब का जन्म 1135 ई. में संजरी (फारस) में हुआ। पिता का नाम हजरत ख्वाजा सैय्यद गयासुद्दीन और माता का नाम बीबी साहेनूर था।

  • बचपन का नाम खुरासान था। वे ब्रज भाषा में साहित्य रचना करते थे।

  • 1191 ई. में मोहम्मद गौरी के साथ भारत आये और अजमेर को अपना कार्यस्थल बनाया। गौरी ने उन्हें सुल्तान-ए-हिन्द की उपाधि दी।

दरगाह का निर्माण

  • ख्वाजा साहब के इंतकाल के 231 वर्ष बाद 1464 ई. में मांडू (मालवा) के सुल्तान गयासुद्दीन महमूद खिलजी ने पक्की मजार एवं गुम्बद बनवाया।

  • मुख्य मजार का निर्माण 1537 ई. में भी गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया।

प्रमुख संरचनाएँ

संरचना विवरण
बुलन्द दरवाजा (निजाम द्वार) 1469-1509 ई. के मध्य मांडू सुल्तान द्वारा निर्मित। दरगाह की सबसे पुरानी इमारत।
अकबरी मस्जिद 1570 ई. में अकबर ने पुत्र सलीम (जहाँगीर) के जन्म पर पैदल आकर निर्माण करवाया।
शाहजहानी (जुमा) मस्जिद 1638 ई. में शाहजहाँ ने 2.40 लाख रुपये लागत से बनवाई।
बेगमी दालान शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा द्वारा निर्मित।
महफिलखाना 1888-91 में बशीरुद्दौला सर असमान जाह ने बनवाया।
चाँदी का कटहरा जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा मुख्य द्वार के चारों ओर बनवाया गया।

देग एवं तबर्रुक

  • बड़ी देग – अकबर द्वारा 1567 ई. में भेंट की गई।

  • छोटी देग – जहाँगीर द्वारा 1613 ई. में भेंट की गई।

  • तबर्रुक – देग में पकाकर मुफ्त बाँटी जाने वाली सामग्री।

उर्स एवं परम्पराएँ

  • हिजरी संवत् के रज्जब माह की 1 से 6 तारीख तक उर्स का आयोजन।

  • झंडा चढ़ाने की रस्म – भीलवाड़ा के गौरी परिवार द्वारा बुलन्द दरवाजे पर उर्स से एक सप्ताह पूर्व।

  • यहाँ जायरीन (उर्स में आने वाले श्रद्धालु) देश-विदेश से आते हैं।

अन्य कब्रें

ख्वाजा साहब की पुत्री बीबी हाफिज जमाल, शाहजहाँ की बेटी चिमनी बेगम और हुमायूँ को गंगा में डूबने से बचाने वाले भिश्ती सुल्तान की कब्रें भी दरगाह परिसर में स्थित हैं।

होली बायोग्राफी – ख्वाजा साहब की जीवनी, लेखक: मिर्जा वहीदुद्दीन बेग


2. शेख अलाउद्दीन खान का मकबरा (सोला थम्बा)

  • यह 16 खम्भों पर टिका आयताकार भवन है जिसमें तीन गुम्बद हैं।

  • इसे सोला थम्बा के नाम से भी जाना जाता है।

  • 1659 ई. में निर्मित, इस मकबरे में 5 मजार हैं।


3. हजरत शक्कर पीर बाबा की दरगाह – नरहड़ (झुंझुनूं)

  • यह राजस्थान की सबसे बड़ी दरगाह है और साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल मानी जाती है।

  • हजरत शक्कर पीर बाबा को "बागड़ का धणी" एवं "हाजी बाबा" भी कहा जाता है।

  • प्रसिद्ध सूफी संत शेख सलीम चिश्ती इन्हीं के शिष्य थे।


4. शेख हमीमुद्दीन नागौरी की दरगाह – नागौर

  • 1192 ई. में मुहम्मद गौरी के साथ भारत आए।

  • ख्वाजा साहब ने उन्हें सुल्तान-ए-तारिकीन (संन्यासियों का सुल्तान) की उपाधि दी।

  • मस्जिद का निर्माण बादशाह मोहम्मद अकबर शाह द्वितीय के समय फैजुल्ला खाँ के पुत्र बहराम खाँ की देखरेख में हुआ।


5. सैय्यद फखरूद्दीन की दरगाह – गलियाकोट

  • यह दरगाह परमार राजाओं से संबंधित है और माही नदी के तट पर स्थित है।

  • गलियाकोट दाऊदी बोहरा सम्प्रदाय का प्रधान तीर्थस्थल है।

  • इसे मजार-ए-फखरी भी कहा जाता है।

  • ध्यातव्य: कालू मीर की मजार सरवाड़ (अजमेर) में स्थित है।


6. हजरत दीवानशाह की दरगाह

बुलंद दरवाजे की गगनचुंबी मीनारें दूर से ही दिखाई देती हैं।

अब्दुल्ला खाँ का मकबरा – इस मकबरे के सामने अब्दुल्ला खाँ की बीबी का मकबरा है, जो उत्कृष्ट स्थापत्य का नमूना है।


7. अढ़ाई दिन का झोंपड़ा – अजमेर

यह हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है।

  • प्रारम्भ में 1153 ई. में चौहान शासक बीसलदेव ने यहाँ सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय (संस्कृत महाविद्यालय) बनवाया।

  • 1206-1210 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे तुड़वाकर मस्जिद में बदल दिया।

  • यहाँ प्रतिवर्ष मुस्लिम फकीर पंजाब शाह का अढ़ाई दिन का उर्स लगता है – इसी कारण यह अढ़ाई दिन का झोंपड़ा कहलाता है।

  • इसे "आठ खम्भों का महल" भी कहा जाता है।

संत अब्दुल्ला पीर का मकबरा – राजस्थान में दाऊदी बोहरा सम्प्रदाय का दूसरा महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल।


8. जामा मस्जिद, भरतपुर

महाराजा बलवंत सिंह द्वारा निर्मित।

9. जामा मस्जिद – शाहबाद (बारां)

  • निर्माण – मुगल सम्राट औरंगजेब के समय मुगल फौजदार मकबूल द्वारा।

  • शाहबाद को मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बसाया था।


10. मीरा साहब की दरगाह – बूंदी

जैतसागर के निकट पहाड़ी पर स्थित।

11. मीरान साहब की दरगाह – तारागढ़ दुर्ग (अजमेर)

  • संत मीरान साहब तारागढ़ के प्रथम गवर्नर थे। मूल नाम: मीर सैय्यद हुसैन खिंगसवार

  • 1202 ई. में दुर्ग की रक्षा करते हुए प्राणों की आहुति दी।

  • परिसर में उनके घोड़े की मजार है – यह सम्पूर्ण भारत में केवल अजमेर में है।

  • मान्यता: घोड़े की मजार पर चने की दाल चढ़ाने से मनोकामना पूर्ण होती है।

  • मलिक शाह की मजार पर नाथ पंथ के साधु भी उर्स के अवसर पर चादर चढ़ाते हैं – यह स्थल हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।


12. तोपखाना मस्जिद – राजस्थान की सबसे प्राचीन मस्जिद

  • प्रारम्भ में यह राजा भोज (परमार वंश) द्वारा बनवाई गई सरस्वती कंठाभरण शाला थी।

  • 1311-12 में अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर विजय के बाद इसे तुड़वाकर मस्जिद में बदल दिया।

  • बाद में इसका उपयोग तोपखाना (असला-बारूद रखने) के लिए होने लगा – अतः यह तोपखाना मस्जिद कहलाई।

  • निर्माण के आधार पर यह राजस्थान की सबसे प्राचीन मस्जिद है।


निष्कर्ष

राजस्थान की ये मस्जिदें, मीनारें, छतरियाँ और दरगाहें केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि सदियों के सांप्रदायिक सद्भाव, सूफी परंपरा और अद्भुत स्थापत्य कला की जीवंत धरोहर हैं। चाहे अजमेर की दरगाह हो या झुंझुनूं का नरहड़ पीर – हर जगह हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल देखने को मिलती है।

यदि आप राजस्थान की आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो इन स्थलों को अपनी सूची में जरूर शामिल करें।


अन्य नाम एवं तथ्य:

  • अजमेर – "भारत का मक्का"

  • ख्वाजा की जीवनी – होली बायोग्राफी (मिर्जा वहीदुद्दीन बेग)

  • भीलवाड़ा गौरी परिवार – झंडा चढ़ाने की रस्म

 

13. प्रतापगढ़ में स्थित प्रमुख दरगाहें एवं मस्जिदें

प्रतापगढ़ जिला राजस्थान के दक्षिणी भाग में अपनी सूफी विरासत के लिए भी जाना जाता है। यहाँ की प्रमुख इस्लामिक धरोहरें निम्नलिखित हैं:

सैय्यद मूसा शहीद दरगाह

प्रतापगढ़ की प्रसिद्ध दरगाहों में से एक, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केन्द्र है।

अल्लाह रक्खीबाई की मस्जिद

यह मस्जिद अपनी वास्तुकला और शांत वातावरण के लिए जानी जाती है। स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लिए यह नमाज़ का महत्वपूर्ण स्थल है।

कुमेदान शाह बाबा की दरगाह

प्रतापगढ़ क्षेत्र में स्थित यह दरगाह सूफी संत कुमेदान शाह बाबा से जुड़ी हुई है। यहाँ सालाना उर्स का आयोजन होता है।

मदार चिल्लाह दरगाह

यह दरगाह विशेष रूप से चिल्लाह (40 दिन के कठिन आध्यात्मिक अभ्यास) की परम्परा के लिए जानी जाती है। सूफी संतों द्वारा यहाँ चिल्ला बैठने की मान्यता है।


14. लैला-मजनूं की मजार – अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर)

अनूपगढ़, जिला श्रीगंगानगर में स्थित यह अनूठा स्थल लैला-मजनूं (पृथ्वी के अमर प्रेमियों) की मजार है। यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग श्रद्धा से जियारत करते हैं। प्रेम और त्याग की इस दास्तान से जुड़ा होने के कारण यह स्थान युवाओं में भी लोकप्रिय है।


15. कबीरशाह की दरगाह – करौली

करौली जिले में स्थित कबीरशाह की दरगाह अपनी उत्कृष्ट शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध है।

  • इस दरगाह का निर्माण स्वयं कबीरशाह ने अपने जीवनकाल में ही करा लिया था – यह अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है।

  • उनके शिष्य सादिक अली ने गुरु कबीरशाह को इसी दरगाह में दफनाया था।

  • यहाँ की नक्काशी, जालीदार पत्थर की खिड़कियाँ और गुम्बद दर्शनीय हैं।


16. सूफी संत शेख फरीद – थड़ी वाले बाबा

सूफी संत शेख फरीद को "थड़ी वाले बाबा" के नाम से जाना जाता था। उनसे जुड़ा स्थल राती थेड़ी नामक स्थल आज करणपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक और जीता-जागता उदाहरण है।
 

राजस्थान की अन्य प्रसिद्ध दरगाहें, मस्जिदें और सम्पूर्ण छतरी विरासत

राजस्थान का इस्लामिक और स्थापत्य इतिहास केवल अजमेर की दरगाह तक सीमित नहीं है। पूरे प्रदेश में छोटी-बड़ी सैकड़ों दरगाहें, मस्जिदें और हजारों की संख्या में स्मारक छतरियाँ बिखरी पड़ी हैं। इस ब्लॉग में हम उन अन्य प्रसिद्ध दरगाहों एवं मस्जिदों का परिचय देंगे, जो पिछले लेख में शामिल नहीं हो पाई थीं, साथ ही राजस्थान की छतरियों की विस्तृत सूची देंगे – जो राजपूत वीरता, शौर्य और शिल्पकला का अद्वितीय नमूना हैं।


भाग 1: राजस्थान की अन्य प्रसिद्ध दरगाहें एवं मस्जिदें

नीचे तालिका में उन दरगाहों, मस्जिदों और मकबरों की सूची दी जा रही है, जो राजस्थान के विभिन्न जिलों में स्थित हैं लेकिन पिछले लेख में शामिल नहीं थीं।

क्रम मस्जिद / दरगाह / मकबरा स्थान (जिला)
1 चलफिरशाह की दरगाह चित्तौड़
2 हजरत शेख अब्दुल अजीज मक्की की दरगाह केशोरायपाटन (बूंदी)
3 संत मीठेशाह की दरगाह गांगरोण दुर्ग (भीलवाड़ा/झालावाड़)
4 पीर हाजी निजामुद्दीन की दरगाह फतेहपुर (सीकर)
5 गुलाब खाँ का मकबरा जोधपुर
6 नौंगजा पीर की मजार चित्तौड़गढ़ दुर्ग
7 गैबी पीर की दरगाह जहाजपुर (भीलवाड़ा)
8 जार जरीना मकबरा धौलपुर
9 बाबा गफूर की मजार जगत्मन्दिर (उदयपुर)
10 कमरुद्दीन शाह की दरगाह झुंझुनूं
11 हसामुद्दीन चिश्ती की दरगाह सांभर (जयपुर)
12 हसनपीर की दरगाह आंधी (जयपुर)
13 पीर सदरुद्दीन की दरगाह रणथम्भौर दुर्ग (सवाई माधोपुर)
14 पीर मस्तान की दरगाह सोजत (पाली)
15 हजरत शेखशाह / जमाल बाबा की दरगाह दौसा
16 तनापीर की दरगाह मण्डौर (जोधपुर)
17 सैय्यद पीर दुलेशाह की मजार केरला (पाली)
18 नलियासर मस्जिद सांभर (जयपुर)
19 अकबरी मस्जिद आमेर (जयपुर)
20 उषा मस्जिद बयाना (भरतपुर)
21 फतेहगज गुंबद मस्जिद अलवर
22 ईदगाह मस्जिद जयपुर
23 पठान गुलाम कलन्दर की मस्जिद मण्डौर (जोधपुर)
24 एकमीनार मस्जिद जोधपुर
25 अलाउद्दीन मस्जिद जालौर
26 लाल मस्जिद अमरसर (जयपुर)
27 जनाना मस्जिद अमरसर (जयपुर)
28 सैय्यद बादशाह की दरगाह शिवगंज (सिरोही)
29 अलाउद्दीन आलमशाह का मकबरा तिजारा (अलवर)
30 गजरा का मकबरा धौलपुर
31 मौनी बाबा की मजार धौलपुर
32 नवाब रुहेल खाँ का मकबरा झुंझुनूं
33 गमतागाजी मीनार जोधपुर

विशेष दरगाहें:

बड़े पीर की दरगाह – नागौर

यह दरगाह सूफियों की कादरिया शाखा के जन्मदाता सैय्यद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब से जुड़ी है। नागौर शहर में स्थित यह दरगाह एक प्रमुख आध्यात्मिक केन्द्र है।

मलंग सरकार (हजरत गुलाम रसूल साहब) – बीकानेर

बीकानेर में स्थित मलंग सरकार की दरगाह को "तोप वाले बाबा" के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर साल उर्स का आयोजन होता है।


भाग 2: राजस्थान की प्रमुख छतरियाँ – एक विस्तृत स्थापत्य यात्रा

छतरियाँ राजस्थान की शौर्यगाथाओं, बलिदानों और राजसी परम्पराओं की चुपचाप गवाह हैं। ये स्मारक शिल्पकला, भित्ति चित्रों और स्थापत्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। नीचे उन्हें खम्भों की संख्या, स्थान और विशेषताओं के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।


2.1 एक खम्भे से 10 खम्भों तक की छतरियाँ

छतरी का नाम स्थान विशेषता / निर्माता
एक खम्भे की छतरी रणथम्भौर (सवाई माधोपुर) अद्वितीय एकल स्तंभ छतरी
शृंगार चंवरी की छतरी चित्तौड़ दुर्ग 4 खम्भे, निर्माता: राणा कुंभा
गोराधाय की छतरी जोधपुर 4 खम्भे, महाराजा अजीतसिंह (धायमाता की स्मृति में)
बंजारों की छतरी लालसोट (दौसा) 6 खम्भे, 6वीं शताब्दी में निर्मित
राणा सांगा की छतरी माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) 8 खम्भे, निर्माता: अशोक परमार
राणा प्रताप की छतरी बाण्डोली (उदयपुर) 8 खम्भे, निर्माता: महाराणा अमरसिंह
रैदास की छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग 8 खम्भे, मीराबाई के गुरु संत रैदास
मामा-भान्जा की छतरी जोधपुर दुर्ग 10 खम्भे, महाराजा अजीतसिंह, अन्य नाम: धन्ना-भियां की छतरी

नोट: मामा-भान्जा की मजार हनुमानगढ़ जिले के पल्लू में और मंदिर बारां जिले के अटरू में स्थित है।


2.2 12 से 20 खम्भों वाली छतरियाँ

छतरी का नाम स्थान विशेषता
उड़ना पृथ्वीराज की छतरी कुम्भलगढ़ दुर्ग 12 खम्भे, खम्भों पर नारियों के चित्र
अमरसिंह की छतरी नागौर दुर्ग 16 खम्भे, वीर अमरसिंह राठौड़
सिंघवियों की छतरियाँ जोधपुर 20 खम्भे, सेनापति सिंघवी अखैराज
राजसिंह चम्पावत की छतरी जोधपुर 18 खम्भे
मिश्रजी की छतरी नैड़ा अंचल (अलवर) 8 खम्भे परंतु अत्यंत भित्ति चित्र – विशेष उल्लेखनीय

2.3 32 खम्भों वाली प्रसिद्ध छतरियाँ

छतरी स्थान निर्माता / विवरण
रणथम्भौर की छतरी (न्याय की छतरी) रणथम्भौर हम्मीरदेव (पिता जैत्रसिंह की स्मृति में), धौलपुर के लाल पत्थर से निर्मित
जगन्नाथ कच्छवाहा की छतरी माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) 32 खम्भे
रानी सूर्यकंवरी की छतरी पंचकुण्ड (जोधपुर) 32 खम्भे
जोधसिंह की छतरी बदनौर (भीलवाड़ा) 32 खम्भे

2.4 80 और 84 खम्भों वाली भव्य छतरियाँ

छतरी स्थान विशेषता
मूसी महारानी की छतरी (80 खम्भे) अलवर निर्माता: महाराजा विनयसिंह, इंडो-इस्लामिक शैली, ऊपरी मंजिल में रामायण-महाभारत के भित्ति चित्र
84 खम्भों की छतरी बूंदी (देवपुरा) निर्माता: राव राजा अनिरुद्ध सिंह, धाबाई देवा गुर्जर की स्मृति में, 1683 ई., तीन मंजिला

2.5 राजवंशीय छतरी समूह (राजपरिवारों के श्मशान स्थल)

गैटोर की छतरियाँ – जयपुर

  • स्थान: नाहरगढ़ दुर्ग (आमेर) की तलहटी

  • शैली: पंचायतन शैली

  • समाधि: सवाई जयसिंह द्वितीय से लेकर सवाई माधोसिंह द्वितीय तक

  • नोट: केवल सवाई ईश्वरीसिंह की छतरी गैटोर में नहीं है (वह सिटी पैलेस में है)

क्षारबाग (केसरबाग) की छतरियाँ – बूंदी

  • संख्या: कुल 66 छतरियाँ

  • सबसे प्राचीन: राव दूदा की छतरी

  • सबसे नवीन: महाराव राजा विष्णुसिंह की छतरी

  • ऐतिहासिक घटना: राव राजा शत्रुशाल की मृत्यु पर 64 रानियों ने यहाँ सती होने की अग्नि में आहुति दी थी।

बड़ाबाग की छतरियाँ – जैसलमेर

  • संबंधित वंश: भाटी राजवंश

  • प्रथम छतरी: रावल जैतसिंह तृतीय (1528 ई., उनके पुत्र लूणकरण द्वारा निर्मित)

मंडोर की छतरियाँ – जोधपुर

प्रमुख छतरियाँ:

  • ब्राह्मण देवता की छतरी

  • कागा की छतरी (मध्य में प्रधानमंत्री की छतरी – राजसिंह कूम्पावत की स्मृति में)

  • मामा-भान्जा की छतरी

  • गोराधाय की छतरी

प्रधानमंत्री की छतरी – महाराजा जसवंतसिंह की प्राण रक्षा हेतु राजसिंह कूम्पावत द्वारा आत्म बलिदान देने की स्मृति में निर्मित।

देवीकुण्ड की छतरियाँ – बीकानेर

  • समर्पित: बीकानेर राजपरिवार (राव कल्याणमल से महाराजा डूंगरसिंह तक)

  • महाराजा रत्नसिंह द्वारा निर्मित महाराजा सूरजसिंह की छतरी की प्रतिष्ठा – 26 फरवरी, 1836

महासतियाँ – आहड़ (उदयपुर)

  • मेवाड़ महाराणाओं का श्मशान स्थल

  • सबसे पुरानी छतरी – महाराणा अमरसिंह प्रथम की छतरी


2.6 अन्य प्रसिद्ध और ऐतिहासिक छतरियाँ

छतरी स्थान विशेषता / निर्माता
कुत्ते की छतरी रणथम्भौर दुर्ग, कुकराज की घाटी
कपूरबाबा की छतरी उदयपुर (जगमंदिर के समीप) निर्माता: शाहजहाँ
अकबर की छतरी बयाना दुर्ग (भरतपुर)
गुसाइयों की छतरियाँ मेड़ गाँव (विराटनगर, जयपुर) 16वीं-18वीं सदी, तीन छतरियाँ
आँतेड़ की छतरियाँ अजमेर दिगम्बर जैन सम्प्रदाय
राजा मानसिंह की छतरी आमेर (जयपुर) भित्ति चित्र – राजस्थान के प्राचीनतम (जहाँगीरकालीन)
सन्तोष बावला की छतरी पुष्कर (अजमेर)
टहला की छतरियाँ टहला (अलवर) मध्यकालीन भित्ति चित्रकला का उत्कृष्ट उदाहरण
थानेदार नाथूसिंह की छतरी शाहबाद (बारां) कोटा महाराज उम्मेदसिंह द्वारा
गंगाबाई की छतरी गंगापुर (भीलवाड़ा)
जोगीदास की छतरी उदयपुरवाटी (झुंझुनूं) चित्रकार देवा द्वारा भित्ति चित्र – शेखावटी के प्राचीनतम भित्ति चित्र

2.7 जसवंतथड़ा – राजस्थान का ताजमहल

  • स्थान: जोधपुर

  • निर्माता: महाराजा सरदारसिंह (पिता महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय की स्मृति में)

  • निर्माण वर्ष: 1899 ई.

  • विशेषता: सफेद संगमरमर से निर्मित भव्य स्मारक

  • उपाधि: "राजस्थान का ताजमहल"

  • अन्य: यहाँ जोधपुर के कई शासकों की छतरियाँ भी हैं।


2.8 नैड़ा अंचल की विशेष छतरियाँ (अलवर)

नैड़ा अंचल (सरिस्का वन क्षेत्र के समीप) स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय है:

  • मिश्रजी की छतरी (1432 ई. के आसपास) – 8 खम्भे, परंतु भित्तियों पर दशावतारअर्धनारीश्वरसमुद्र मंथनरामलीला के प्रसंग चित्रित हैं। इसमें काले और कत्थई वानस्पतिक रंग प्रयोग किए गए हैं। चित्रकारी कड़ा लिपाई विधि और राजपूत शैली में की गई है।

  • अन्य छतरियाँ – यहाँ कई अन्य स्मारक छतरियाँ भी हैं।


2.9 कुछ और उल्लेखनीय छतरियाँ (स्थानवार)

छतरी स्थान
पद्मापीर की छतरी कोटा
महाराव बैरिसल की छतरी सिरोही (दूधिया तालाब के किनारे)
दीवान दीपचंद की छतरी कागा (जोधपुर)
ब्राह्मण देवता की छतरी पंचकुण्ड (मण्डोर, जोधपुर)
कीरतसिंह सोढ़ा की छतरी मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर)
सेनापति की छतरी नागौरी गेट (जोधपुर)
बख्तावर सिंह की छतरी मण्डोर (जोधपुर) एवं अलवर
रानियों की छतरियाँ (49) पंचकुण्ड (मण्डोर, जोधपुर)
राव जैतसी की छतरी हनुमानगढ़
लाच्छा गुजरी की छतरी नागौर
राव शेखा की छतरी परशुरामपुरा (झुंझुनूं)
सिंधुपति महाराजा दाहरसेन का स्मारक अजमेर
खाण्डैराव की छतरी गागरसौली (भरतपुर)
बदनौर की छतरियाँ जोधपुर
जयमल व कल्ला राठौड़ की छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग
चेतक की छतरी हल्दीघाटी (राजसमन्द)
अजीतसिंह का देवल जोधपुर
अप्पाजी सिंधिया की छतरी ताउसर (नागौर)
राव कल्याणमल की छतरी बीकानेर
पीपाली की छतरी चित्तौड़गढ़
गोपाल सिंह यादव की छतरी करौली
राजा जोधसिंह की छतरी बदनौर (भीलवाड़ा)
मानसिंह प्रथम की छतरी आमेर (जयपुर)
फतेह गुम्बद छतरी अलवर
पीपा जी की छतरी गागरोन (झालावाड़)
पालीवालों की छतरी जैसलमेर
सिंघयियों की छतरी जोधपुर
करोड़ों के कीर्ति धनी की छतरी जोधपुर
सेनापति की छतरी जोधपुर

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