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राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन: इतिहास, संस्थापक और प्रमुख घटनाएँ Part 3

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4. बीकानेर प्रजामंडल (प्रारंभिक संगठन)

बीकानेर में राजनीतिक चेतना की नींव 'सर्वहितकारिणी सभा' के माध्यम से पड़ी:

  • सर्वहितकारिणी सभा (चूरू): इसका गठन 1907 ई. में कन्हैयालाल ढूँढ और स्वामी गोपालदास द्वारा किया गया था।
  • उपनाम: इस सभा की सक्रियता और प्रभाव के कारण इसे 'चूरू की कांग्रेस' भी कहा जाता है।

1. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार

सर्वहितकारिणी सभा (पिछली इमेज के संदर्भ में) द्वारा दो महत्वपूर्ण विद्यालयों की स्थापना की गई थी:

  • कबीर पाठशाला: यह विद्यालय विशेष रूप से दलितों की शिक्षा हेतु खोला गया था।
  • पुत्री पाठशाला: यह विद्यालय लड़कियों (बालिकाओं) की शिक्षा के लिए स्थापित किया गया था।

2. प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ

  • धर्मस्तूप पर झंडा फहराना: 26 जनवरी 1930 ई. को स्वामी गोपालदास और 'चन्दनमल बहड़' ने चूरू के धर्मस्तूप पर भारतीय तिरंगा झंडा फहराया था।
  • बीकानेर दिग्दर्शन पर्चे: 1931 ई. में लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दौरान बीकानेर महाराजा गंगासिंह की दमनकारी नीतियों के खिलाफ 'बीकानेर दिग्दर्शन' नामक पर्चे बाँटे गए थे।

3. बीकानेर षड्यंत्र मुकदमा (1932 ई.)

'बीकानेर दिग्दर्शन' पर्चों के वितरण से नाराज होकर महाराजा ने कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। इसे 'बीकानेर षड्यंत्र मुकदमा' के नाम से जाना जाता है। गिरफ्तार नेताओं में प्रमुख थे:

  • स्वामी गोपालदास
  • चन्दनमल बहड़
  • सत्यनारायण सर्राफ
  • खूबराम सर्राफ

4. बीकानेर प्रजामंडल और अन्य संगठन

  • बीकानेर प्रजामंडल (1936 ई.): इसकी स्थापना कलकत्ता में की गई थी।
    • संस्थापक: वैद्य मघाराम, लक्ष्मी देवी आचार्य (महिला), मुक्ता प्रसाद और रघुवर दयाल गोयल।
  • बीकानेर देशी राज्य लोक परिषद (1942 ई.): इसकी स्थापना रघुवर दयाल गोयल द्वारा 'उत्तरदायी शासन' की माँग के लिए की गई थी।
  • बीकानेर दमन विरोधी दिवस: 26 अक्टूबर 1944 ई. को महाराजा शार्दुल सिंह के खिलाफ यह दिवस मनाया गया था।

5. शहादत: रायसिंहनगर की घटना

  • दिनांक: 1 जुलाई 1946 ई.
  • स्थान: रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर।
  • विवरण: पुलिस ने प्रजामंडल के शांतिपूर्ण जुलूस पर फायरिंग कर दी थी।
  • शहीद: इस घटना में बीरबल नामक व्यक्ति शहीद हो गया था, जिनकी स्मृति में बीकानेर में 'बीरबल दिवस' भी मनाया जाता है।

1. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार

सर्वहितकारिणी सभा (पिछली इमेज के संदर्भ में) द्वारा दो महत्वपूर्ण विद्यालयों की स्थापना की गई थी:

  • कबीर पाठशाला: यह विद्यालय विशेष रूप से दलितों की शिक्षा हेतु खोला गया था।
  • पुत्री पाठशाला: यह विद्यालय लड़कियों (बालिकाओं) की शिक्षा के लिए स्थापित किया गया था।

2. प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ

  • धर्मस्तूप पर झंडा फहराना: 26 जनवरी 1930 ई. को स्वामी गोपालदास और 'चन्दनमल बहड़' ने चूरू के धर्मस्तूप पर भारतीय तिरंगा झंडा फहराया था।
  • बीकानेर दिग्दर्शन पर्चे: 1931 ई. में लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दौरान बीकानेर महाराजा गंगासिंह की दमनकारी नीतियों के खिलाफ 'बीकानेर दिग्दर्शन' नामक पर्चे बाँटे गए थे।

3. बीकानेर षड्यंत्र मुकदमा (1932 ई.)

'बीकानेर दिग्दर्शन' पर्चों के वितरण से नाराज होकर महाराजा ने कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। इसे 'बीकानेर षड्यंत्र मुकदमा' के नाम से जाना जाता है। गिरफ्तार नेताओं में प्रमुख थे:

  • स्वामी गोपालदास
  • चन्दनमल बहड़
  • सत्यनारायण सर्राफ
  • खूबराम सर्राफ

4. बीकानेर प्रजामंडल और अन्य संगठन

  • बीकानेर प्रजामंडल (1936 ई.): इसकी स्थापना कलकत्ता में की गई थी।
    • संस्थापक: वैद्य मघाराम, लक्ष्मी देवी आचार्य (महिला), मुक्ता प्रसाद और रघुवर दयाल गोयल।
  • बीकानेर देशी राज्य लोक परिषद (1942 ई.): इसकी स्थापना रघुवर दयाल गोयल द्वारा 'उत्तरदायी शासन' की माँग के लिए की गई थी।
  • बीकानेर दमन विरोधी दिवस: 26 अक्टूबर 1944 ई. को महाराजा शार्दुल सिंह के खिलाफ यह दिवस मनाया गया था।

5. शहादत: रायसिंहनगर की घटना

  • दिनांक: 1 जुलाई 1946 ई.
  • स्थान: रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर।
  • विवरण: पुलिस ने प्रजामंडल के शांतिपूर्ण जुलूस पर फायरिंग कर दी थी।
  • शहीद: इस घटना में बीरबल नामक व्यक्ति शहीद हो गया था, जिनकी स्मृति में बीकानेर में 'बीरबल दिवस' भी मनाया जाता है।

बीरबल की स्मृति और सम्मान

  • बीरबल दिवस: बीकानेर रियासत में 17 जुलाई को बीरबल दिवस मनाया गया। यह रायसिंहनगर की घटना में शहीद हुए बीरबल सिंह की याद में मनाया जाता है।
  • इंदिरा गांधी नहर: इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) की जैसलमेर शाखा का नाम बदलकर शहीद बीरबल के सम्मान में 'बीरबल शाखा' रखा गया है।

बीकानेर के प्रमुख किसान आंदोलन

बीकानेर रियासत के विभिन्न क्षेत्रों में सामंती शोषण और करों के खिलाफ किसानों ने आवाज उठाई:

स्थान

वर्ष

संबंधित व्यक्ति/संगठन

विशेष विवरण

उदरासर

1937 ई.

जीवनराम

यह बीकानेर रियासत का प्रथम जागीरी किसान आंदोलन था।

महाजन

1938 ई.

-

यह भी एक महत्वपूर्ण किसान प्रतिरोध था।

दुधवा खारा

1944 ई.

हनुमान सिंह आर्य

जागीरदारों के अत्याचारों के विरुद्ध एक प्रमुख आंदोलन।

काँगडा (चूरू)

1946 ई.

मेघसिंह आर्य

इस आंदोलन के दौरान किसानों पर भीषण दमन किया गया था।

गंगनहर

1930-31 ई.

दरबार सिंह, करतार सिंह

इन नेताओं ने जमींदारा संघ के माध्यम से किसानों को संगठित किया।

  • आबियाना कर: बीकानेर में सिंचाई पर लगने वाले कर को 'आबियाना' कहा जाता था, जिसके विरोध में किसान आंदोलित थे।

बीकानेर सुरक्षा अधिनियम (1932 ई.)

  • स्थापना: यह अधिनियम महाराजा गंगासिंह द्वारा लागू किया गया था।
  • संज्ञा: इसकी कठोरता और दमनकारी प्रकृति के कारण जनता ने इसे "काला कानून" की संज्ञा दी थी।

आंदोलन में शामिल प्रमुख महिलाएँ

बीकानेर के इन आंदोलनों और प्रजामंडल की गतिविधियों में महिलाओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई, जिनमें प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं:

  • रुक्मा देवी
  • गीता देवी
  • लक्ष्मी देवी आचार्य

धौलपुर प्रजामंडल (1936 ई.)

धौलपुर में राजनीतिक चेतना जगाने में आर्य समाज की बड़ी भूमिका रही। प्रजामंडल की स्थापना से पूर्व यहाँ कई सामाजिक और भाषाई सुधार सभाएँ सक्रिय थीं।

धौलपुर में जन-जागृति का विकास क्रम

वर्ष

संगठन का नाम

संस्थापक/नेता

मुख्य उद्देश्य

1910

आचार सुधारिणी सभा

ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु, यमुना प्रसाद

समाज सुधार हेतु

1934

नागरी प्रचारिणी सभा

ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु, इन्दुलाल

हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु

1936

धौलपुर प्रजामंडल

ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु, कृष्ण दत्त पालीवाल

राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति


  • प्रेरणा: आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती ने धौलपुर में राजनीतिक चेतना का संचार किया था।

तसीमो कांड (11 अप्रैल, 1947 ई.)

  • यह धौलपुर रियासत की एक अत्यंत दुखद घटना थी।
  • प्रजामंडल की एक सभा पर पुलिस द्वारा की गई फायरिंग में दो प्रमुख कार्यकर्ता शहीद हो गए:
    1. पंचम सिंह
    2. छत्तर सिंह

मेवाड़ प्रजामंडल

मेवाड़ राजस्थान की एक प्रमुख रियासत थी, जहाँ प्रजामंडल की स्थापना कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन के प्रभाव स्वरूप हुई।

  • स्थापना: इसकी स्थापना हरिपुरा अधिवेशन के ठीक बाद 24 अप्रैल 1938 ई. को हुई थी।
  • स्थापना स्थल: प्रजामंडल की स्थापना बलवन्त सिंह मेहता के निजी निवास 'साहित्य कुटीर' पर की गई थी।

प्रमुख संस्थापक और पदाधिकारी:

  • अध्यक्ष: बलवन्त सिंह मेहता
  • उपाध्यक्ष: भूरेलाल बयां
  • महामंत्री: माणिक्यलाल वर्मा

मेवाड़ प्रजामंडल: संघर्ष और दमन

मेवाड़ रियासत में राजनीतिक चेतना को कुचलने के लिए कड़े कदम उठाए गए, लेकिन प्रजामंडल के नेताओं ने हार नहीं मानी:

  • निर्वासन और अजमेर से संचालन: मेवाड़ रियासत ने प्रजामंडल पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद माणिक्यलाल वर्मा ने अजमेर से प्रजामंडल की गतिविधियों का संचालन किया।
  • साहित्यिक विरोध: अजमेर में ही माणिक्यलाल वर्मा ने 'मेवाड़ का वर्तमान शासन' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें मेवाड़ प्रशासन की कड़ी आलोचना की गई थी।
  • सत्याग्रह: प्रजामंडल ने रियासत के विरुद्ध सत्याग्रह प्रारंभ किया। भीलवाड़ा के रमेशचन्द्र व्यास मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम सत्याग्रही बने।
  • नेताओं की गिरफ्तारी:
    • भूरेलाल बयां को उदयपुर के सराडा किले में नजरबंद किया गया। इस किले की कठोरता के कारण इसे 'मेवाड़ का कालापानी' कहा जाता है।
    • जब माणिक्यलाल वर्मा को गिरफ्तार किया गया, तो गांधीजी ने अपने समाचार पत्र 'हरिजन' में इसकी तीखी आलोचना की थी।

मेवाड़ प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन (1941 ई.)

यह अधिवेशन प्रजामंडल के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ:

  • स्थान: उदयपुर।
  • अध्यक्ष: माणिक्यलाल वर्मा।
  • उद्घाटन: इस अधिवेशन का उद्घाटन प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता J. B. कृपलानी ने किया था।
  • विशेष गतिविधि: विजयलक्ष्मी पंडित ने अधिवेशन के दौरान 'खादी प्रदर्शनी' का उद्घाटन किया।

अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का 7वाँ अधिवेशन (1946 ई.)

  • यह भव्य आयोजन उदयपुर के सलेटिया मैदान में किया गया।
  • अध्यक्ष: इसकी अध्यक्षता पं. जवाहर लाल नेहरू ने की थी।
  • प्रमुख प्रतिभागी: जम्मू-कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला ने भी इस अधिवेशन में भाग लिया था।

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

मेवाड़ की महिलाओं ने आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई और जेल यातनाएँ भी सहीं:

  • जेल जाने वाली महिलाएँ: भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नारायणी देवी वर्मा, भगवती देवी बिश्नोई तथा सुशीला को जेल भेजा गया था।
  • प्रजामंडल में शामिल प्रमुख महिलाएँ:
    • नारायणी देवी
    • भगवती देवी
    • स्नेहलता
    • सीमा देवी

यह दस्तावेज दर्शाता है कि मेवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए प्रजामंडल ने किस प्रकार राष्ट्रीय नेताओं के सहयोग से एक लंबा और कठिन संघर्ष किया।

1. प्रजामंडल के अन्य केंद्र

मेवाड़ प्रजामंडल का प्रभाव केवल उदयपुर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके केंद्र रियासत के अंदर और बाहर भी थे:

  • मेवाड़ के अंदर:
    • भीलवाड़ा
    • नाथद्वारा (राजसमंद)
    • नेता: इन केंद्रों पर नरेन्द्रपाल प्रमुख नेता थे।
  • मेवाड़ से बाहर (महाराष्ट्र में):
    • बॉम्बे (मुंबई), नागपुर, जलगाँव और अकोला।

2. शाहपुरा प्रजामंडल

शाहपुरा राजस्थान की पहली रियासत थी जिसने जनता को लोकतांत्रिक अधिकार देने की दिशा में ठोस कदम उठाए थे:

  • स्थापना: इसकी स्थापना माणिक्यलाल वर्मा की प्रेरणा से हुई थी।
  • संस्थापक: लादूराम व्यास और रमेश चन्द्र ओझा।
  • विशेष उपलब्धि: सबसे पहले उत्तरदायी शासन शाहपुरा रियासत में ही स्थापित किया गया था।
  • लोकतांत्रिक कदम: यहाँ के महाराजा सुदर्शन देव ने गोकुल लाल असावा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।

3. अलवर प्रजामंडल

अलवर में राजनीतिक चेतना और समाज सुधार का कार्य साथ-साथ चला:

  • संस्थापक: हरिनारायण शर्मा।
  • भारत छोड़ो आंदोलन: इस प्रजामंडल ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया था।
  • प्रथम अधिवेशन (1944 ई.):
    • इस अधिवेशन की अध्यक्षता भवानी शंकर शर्मा ने की थी।
  • हरिनारायण शर्मा के अन्य सामाजिक संगठन: उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए कई संघ बनाए:
    • आदिवासी संघ: जनजातियों के कल्याण के लिए।
    • वाल्मीकि संघ: दलित समुदाय के उत्थान के लिए।
    • अस्पृश्यता निवारण संघ: छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए।

यह दस्तावेज़ राजस्थान की विभिन्न रियासतों में चल रहे आंदोलनों की विविधता और उनके विशिष्ट योगदान को स्पष्ट करता है।

भरतपुर प्रजामंडल

भरतपुर में राजनीतिक चेतना लाने और उत्तरदायी शासन की माँग के लिए प्रजामंडल की सक्रिय भूमिका रही।

  • संस्थापक: इसके मुख्य संस्थापकों में निम्नलिखित नेता शामिल थे:
    • जुगल किशोर चतुर्वेदी: इन्हें 'राजस्थान का नेहरू' भी कहा जाता है।
    • मास्टर आदित्येन्द्र
    • गोपीलाल यादव: ये प्रजामंडल के अध्यक्ष भी रहे।
    • किशनलाल जोशी: इन्होंने शेखावाटी किसान आंदोलन में भी सक्रिय भाग लिया था।
  • स्थापना स्थल: विशेष बात यह है कि भरतपुर प्रजामंडल की स्थापना रियासत से बाहर रेवाड़ी (हरियाणा) में की गई थी।
  • समाचार पत्र: प्रजामंडल का प्रमुख समाचार पत्र 'वैभव' था।

 


प्रमुख दिवस और आयोजन

प्रजामंडल द्वारा अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के समर्थन में भरतपुर में विशिष्ट दिवस मनाए गए:

  • जापान दिवस (16-17 अगस्त, 1945): यह महाराजा बृजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में मनाया गया था।
  • इंडोनेशिया दिवस (28 अक्टूबर, 1945 ई.): इसका आयोजन बसंत कुमार शर्मा के नेतृत्व में किया गया था।

हिंदी साहित्य समिति और भाषाई चेतना

भरतपुर रियासत में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए संगठित प्रयास किए गए:

  • हिंदी साहित्य समिति (1912 ई.): इसकी स्थापना जगन्नाथ दास अधिकारी द्वारा की गई थी।
  • हिंदी सम्मेलन (1927 ई.): भरतपुर में एक विशाल हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया।
    • अध्यक्ष: प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा।
    • प्रमुख सदस्य: इस सम्मेलन में रवीन्द्रनाथ टैगोर और जमनालाल बजाज जैसी महान हस्तियों ने भाग लिया था।
  • राजभाषा की घोषणा: महाराजा किशन सिंह ने हिंदी को भरतपुर की राष्ट्रभाषा (राजभाषा) घोषित किया था।
    • उनके इस राष्ट्रवादी कदम और प्रगतिशील विचारों के कारण अंग्रेजों ने उन्हें शासन से हटा दिया था।

भरतपुर प्रजामंडल: दमन और संघर्ष

भरतपुर में जन-जाग्रति और प्रजामंडल के विकास की कहानी रियासती दमन और जनता के कड़े प्रतिरोध की रही है।

  • प्रशासक की नियुक्ति: डंकन मैकेंजी को भरतपुर का नया प्रशासक नियुक्त किया गया था।
  • महाराजा का त्याग: भरतपुर के शासक किशन सिंह ने जब जनता द्वारा की जा रही 'उत्तरदायी शासन' की माँग का समर्थन किया, तो उन्हें अंग्रेजों द्वारा अपनी राजगद्दी से हाथ धोना पड़ा।
  • स्थापना: भरतपुर प्रजामंडल की स्थापना रेवाड़ी (हरियाणा) में की गई थी।
  • प्रमुख संस्थापक:
    • जुगल किशोर चतुर्वेदी: इन्हें 'राजस्थान का नेहरू' कहा जाता है।
    • मास्टर आदित्येन्द्र नाथ
    • गोपीलाल यादव: प्रजामंडल के अध्यक्ष।
    • किशनलाल जोशी: इन्होंने शेखावाटी किसान आंदोलन में भी हिस्सा लिया था।
  • रियासत का विरोध: भरतपुर रियासत ने प्रजामंडल का पंजीकरण (Registration) करने से मना कर दिया था। इसके विरोध में प्रजामंडल ने आंदोलन प्रारंभ किया, जिसके फलस्वरूप कई महिलाओं को जेल भेजा गया, जिनमें सुशीला त्रिपाठी, राजेश्वरी और धर्मवती प्रमुख थीं।
  • पंजीकरण: कालांतर में, प्रजामंडल का पंजीकरण 'भरतपुर प्रजा परिषद' के नाम से किया गया।

करौली प्रजामंडल (1938 ई.)

करौली रियासत में भी राजनीतिक चेतना का प्रसार प्रजामंडल और किसान आंदोलनों के माध्यम से हुआ।

  • राजनीतिक चेतना: करौली में पूर्ण सिंह और मदन सिंह ने राजनीतिक चेतना का संचार किया।
  • किसान आंदोलन: इन दोनों नेताओं ने किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। मदन सिंह की पत्नी सरदार कंवर ने भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाई।
  • प्रजामंडल के संस्थापक: करौली प्रजामंडल की स्थापना में मुख्य भूमिका निम्नलिखित की थी:
    • त्रिलोकचन्द माथुर
    • चिरंजीलाल शर्मा
    • कुँवर सिंह वर्मा
  • ऐतिहासिक संदर्भ: नोट के अनुसार, करौली में 1927 ई. में भी किसान आंदोलन का नेतृत्व किया गया था।

1. कोटा प्रजामंडल

कोटा प्रजामंडल की स्थापना और इसके अधिवेशनों का विवरण इस प्रकार है:

  • संस्थापक: नयनूराम शर्मा और अभिन्न हरि।
  • अधिवेशन:
    • 1939 ई.: यह अधिवेशन मांगरोल (बारां) में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता नयनूराम शर्मा ने की थी।
    • 1940 ई.: यह अधिवेशन कोटा में आयोजित हुआ। इसके अध्यक्ष अभिन्न हरि थे। इस अधिवेशन में विजयसिंह पथिक ने भी भाग लिया था।
  • प्रमुख घटनाएँ:
    • भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मोतीलाल जैन के नेतृत्व में प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने कोटा के नगर प्रशासन पर अधिकार कर लिया था।
    • कॉलेज की छात्राओं ने रामपुरा पुलिस थाने पर अपना अधिकार कर लिया था।

2. किशनगढ़ प्रजामंडल

  • संस्थापक: कांतिचन्द चौथानी और जमानशाह।

3. सिरोही प्रजामंडल

सिरोही प्रजामंडल की स्थापना और इसके प्रसार का विवरण निम्नलिखित है:

  • संस्थापक:
    • गोकुलभाई भट्ट: इन्हें 'राजस्थान का गाँधी' कहा जाता है।
    • वृद्धि शंकर त्रिवेदी: इन्होंने प्रजामंडल की पहली बार स्थापना की थी।
  • स्थापना: इसकी स्थापना बॉम्बे (मुंबई) में की गई थी।
  • प्रचार-प्रसार: प्रजामंडल का सर्वाधिक बार प्रचार-प्रसार चुन्नीलाल टेवटा द्वारा किया गया था।

4. कुशलगढ़ प्रजामंडल

  • स्थापना वर्ष: 1942 ई.।
  • संस्थापक: भंवरलाल निगम।

1. बाँसवाड़ा प्रजामंडल

बाँसवाड़ा में जन-जाग्रति और संगठन के विकास की महत्वपूर्ण जानकारी इस प्रकार है:

  • संस्थापक:
    • भूपेन्द्र नाथ त्रिवेदी: इन्होंने बॉम्बे (मुंबई) से 'संग्राम' नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया था।
    • मणिशंकर नागर
    • धूलजी भाई भावसार
  • महिला मंडल: धूलजी भाई भावसार की पत्नी विजया बहिन भावसार ने 'महिला मण्डल' का गठन किया था।

2. डूँगरपुर प्रजामंडल

डूँगरपुर प्रजामंडल की स्थापना और इसके प्रमुख नेताओं का विवरण निम्नलिखित है:

  • संस्थापक:
    • भोगीलाल पांड्या: इन्हें 'वागड़ का गाँधी' कहा जाता है।
    • हरिदेव जोशी
    • गौरीशंकर उपाध्याय: इन्होंने 'सेवक' नामक समाचार पत्र निकाला था।
  • स्थापना: इसकी स्थापना 1 अगस्त 1944 ई. को बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि के अवसर पर की गई थी।
  • प्रमुख गतिविधि: प्रजामंडल ने प्रयाण सभाओं का आयोजन किया था।

3. रास्तापाल घटना (19 जून 1947 ई.)

यह डूँगरपुर रियासत की एक अत्यंत गौरवशाली और मार्मिक घटना है, जो शिक्षा और स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक है:

  • शहादत: इस घटना में स्कूल को बंद करने के विरोध के दौरान अध्यापक 'नानाभाई' और 13 वर्षीय भील बालिका कालीबाई शहीद हो गये थे।
  • घायल: इस घटना में एक अन्य अध्यापक सेंगा भाई घायल हो गये थे।
  • स्मारक: इन दोनों (नानाभाई और कालीबाई) की मूर्तियाँ डूँगरपुर में 'गेपसागर तालाब' के पास स्थित हैं।
  • सम्मान: राजस्थान सरकार द्वारा बालिका शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए कालीबाई पुरस्कार दिया जाता है।

1. पूनावाड़ा घटना (मई 1947 ई.)

  • इस ऐतिहासिक घटना के दौरान अध्यापक शिवराम भील घायल हो गए थे।

2. जैसलमेर प्रजामंडल (1945 ई.)

जैसलमेर रियासत में राजनीतिक चेतना के प्रसार का विवरण इस प्रकार है:

  • संस्थापक: मीठालाल व्यास।
  • स्थापना स्थल: विशेष तथ्य यह है कि इस प्रजामंडल की स्थापना जोधपुर में की गई थी।
  • महत्वपूर्ण संगठन: रघुनाथ सिंह ने 'माहेश्वरी नवयुवक मण्डल' का गठन किया था।
  • जवाहर दिवस: 16 नवंबर 1930 को जैसलमेर में 'जवाहर दिवस' मनाया गया।
  • नेहरू जी का कथन: जवाहरलाल नेहरू ने जैसलमेर को विश्व का '8वां अजूबा' (8th Wonder/चमत्कार) कहा था।

3. प्रतापगढ़ प्रजामंडल (1945 ई.)

  • संस्थापक: अमृतलाल पायक और चुन्नीलाल प्रभाकर।
  • ठक्कर बापा का योगदान:
    • इन्होंने 1922 ई. में 'भील सेवा मण्डल' की स्थापना की थी।
    • मीणा आंदोलन के समय ठक्कर बापा ने जयपुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री (PM) मिर्जा इस्माइल को पत्र लिखा था।

4. झालावाड़ प्रजामंडल (1946 ई.)

यह राजस्थान का स्थापित होने वाला अंतिम प्रजामंडल था:

  • संस्थापक: मांगीलाल भव्य, मकबूल आलम और कन्हैयालाल मित्तल।
  • उत्तरदायी शासन: यहाँ राजराणा हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन की स्थापना की गई।
  • विशेषता: इस रियासत में राजा स्वयं प्रधानमंत्री बना था।

प्रजामण्डल आंदोलनों का राजनीतिक महत्व

राजस्थान में प्रजामण्डल आंदोलनों ने रियासती शासन को उखाड़ फेंकने और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इसके मुख्य राजनीतिक महत्व इस प्रकार हैं:

  • उत्तरदायी शासन की स्थापना: इन आंदोलनों के कारण रियासतों में उत्तरदायी सरकारें बनाने का दबाव बढ़ा।
    • उदाहरण: गोकुल लाल असावा के नेतृत्व में शाहपुरा रियासत में राजस्थान की प्रथम उत्तरदायी सरकार स्थापित की गई थी।
  • संवैधानिक प्रक्रिया की शुरुआत: विभिन्न रियासतों में संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिससे संवैधानिक शासन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
    • उदाहरण: कन्हैयालाल माणिकलाल (KM) मुंशी ने मेवाड़ रियासत का संविधान तैयार किया था।
  • राजनीतिक चेतना और भागीदारी: आंदोलनों ने जनता में राजनीतिक समझ विकसित की और शासन में भागीदारी की माँग उठी।
    • उदाहरण: प्रजामण्डल के दबाव के कारण देवीशंकर तिवाड़ी को जयपुर के मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया था।
  • राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव: प्रजामण्डल के नेता कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों में भाग लेते थे, जिससे राजस्थान का स्थानीय आंदोलन भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गया और राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ।
  • राष्ट्रीय एकता में योगदान: प्रजामण्डलों ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' जैसे राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिससे राष्ट्रीय एकता को अत्यधिक बल मिला।
  • राजस्थान का एकीकरण: प्रजामण्डलों ने रियासतों के भारत संघ में विलय की पुरजोर माँग की, जिसके परिणामस्वरूप अंततः राजस्थान का एकीकरण संभव हो सका।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: प्रजामण्डलों द्वारा विभिन्न समाचार-पत्रों और पुस्तकों का प्रकाशन किया गया, जिसने जनता में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया।
    • प्रमुख समाचार-पत्र: वैभव, संग्राम, और विजय (जैसलमेर)।

प्रजामंडल आंदोलनों का सामाजिक महत्व

प्रजामंडल आंदोलनों ने समाज की रूढ़िवादी विचारधारा को चुनौती दी और मानवीय मूल्यों की स्थापना की। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • सामाजिक कुरीतियों का विरोध: प्रजामंडल ने समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के प्रयास किए।
    • उदाहरण: हरविलास शारदा के प्रयासों से बाल-विवाह निषेध एक्ट (शारदा एक्ट) पारित किया गया, जिसने बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर रोक लगाने में मदद की।
  • सामाजिक भेदभाव में कमी: छुआछूत और जातिवाद जैसी समस्याओं को खत्म करने के लिए संगठित प्रयास किए गए।
    • उदाहरण: हरिनारायण शर्मा ने 'अस्पृश्यता निवारण संघ' की स्थापना कर दलितों के अधिकारों के लिए कार्य किया।
  • हिन्दू-मुस्लिम एकता: आंदोलनों ने सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा दिया।
    • उदाहरण: नयनूराम शर्मा तथा हाजी फैज मुहम्मद ने मिलकर हाड़ौती प्रजामंडल की स्थापना की, जो साझा संघर्ष का प्रतीक था।
  • महिला सशक्तिकरण: इन आंदोलनों ने महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकालकर सक्रिय राजनीति से जोड़ा।
    • प्रमुख महिलाएँ: विजया बहिन भावसार, लक्ष्मी देवी आचार्य और सावित्री देवी भाटी (जोधपुर) जैसी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
  • शिक्षा का प्रचार-प्रसार: प्रजामंडल ने शिक्षा को जन-जाग्रति का मुख्य आधार बनाया, जिसके फलस्वरूप विभिन्न शिक्षण संस्थाएँ स्थापित हुईं।
    • प्रमुख संस्थाएँ: कबीर पाठशाला (दलितों के लिए), पुत्री पाठशाला (बालिकाओं के लिए) और सर्वहितकारिणी सभा।
  • नागरिक असमानता का विरोध: समाज के पिछड़े वर्गों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू की।
    • उदाहरण: 1945 ई. में बैरवा जाति ने उनियारा (टोंक) में नागरिक असमानता विरोधी आंदोलन चलाया था।

1. प्रजामंडल आंदोलनों का आर्थिक महत्व

प्रजामंडल आंदोलनों ने रियासतों की जनता को आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:

  • किसान आंदोलनों को समर्थन: प्रजामंडलों ने किसानों की मांगों को अपना समर्थन दिया, जिससे जागीरदारी प्रथा के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त हुआ और अंततः किसानों को भूमि पर मालिकाना हक प्राप्त हुआ।
  • बेगार प्रथा का विरोध: रियासतों में प्रचलित बिना पारिश्रमिक के काम कराने की 'बेगार प्रथा' का कड़ा विरोध किया गया, जिससे आम जनता को शोषण से मुक्ति मिली।
  • स्वदेशी को बढ़ावा: प्रजामंडल ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर बल दिया, जिसका सीधा लाभ घरेलू कुटीर उद्योगों और धंधों को हुआ।

 


2. कांग्रेस का प्रजामंडल को समर्थन

  • हरिपुरा अधिवेशन (1938 ई.): भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में प्रजामंडल आंदोलनों को प्रत्यक्ष समर्थन देने की आधिकारिक घोषणा की।
  • प्रभाव: इस घोषणा के तुरंत बाद मेवाड़ प्रजामंडल का गठन हुआ।

3. राजस्थान के बाहर स्थापित प्रजामंडल

कुछ प्रजामंडलों की स्थापना रणनीतिक कारणों से राजस्थान की भौगोलिक सीमा से बाहर की गई थी:

प्रजामंडल

स्थापना स्थल

बीकानेर प्रजामंडल

कोलकाता

सिरोही प्रजामंडल

बॉम्बे (मुंबई)

भरतपुर प्रजामंडल

रेवाड़ी (हरियाणा)


4. प्रजामंडल से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • सबसे प्राचीनतम प्रजामंडल: जयपुर प्रजामंडल, जिसकी स्थापना 1931 में हुई थी।
  • सबसे नवीनतम प्रजामंडल: झालावाड़ प्रजामंडल, जिसकी स्थापना 1946 ई. में हुई।

जैसलमेर प्रजामंडल: इसकी स्थापना जोधपुर में की गई थी।

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