राजस्थान के प्रमुख किले एवं दुर्ग | GK Notes for RAS, REET, Patwar, Computer Anudeshak
राजस्थान के ऐतिहासिक वैभव और वास्तुकला को दर्शाने वाले "राजस्थान के दुर्ग एवं किले" विषय पर आपका यह कंटेंट अत्यंत महत्वपूर्ण है। आपके द्वारा दी गई जानकारी को बिना कुछ हटाए, अधिक विस्तार और स्पष्टता के साथ नीचे प्रस्तुत किया गया है:
राजस्थान के दुर्ग एवं किले: एक विस्तृत परिचय
राजस्थान की भूमि वीरों की शौर्य गाथाओं और उनके द्वारा निर्मित अभेद्य दुर्गों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ के दुर्ग न केवल सुरक्षा की दृष्टि से बेजोड़ हैं, बल्कि वे उस काल की स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने भी हैं।
राजस्थान के दुर्गों का वर्गीकरण (प्रकार)
कौटिल्य और शुक्र नीति के अनुसार, दुर्गों को उनकी भौगोलिक स्थिति और बनावट के आधार पर मुख्य रूप से निम्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
1. गिरी दुर्ग (Parvat Forts)
ऐसे दुर्ग जो किसी ऊँचे पर्वत या पहाड़ी (गिरी) पर स्थित होते हैं। इनके चारों ओर दुर्गम पर्वत श्रेणियां होती हैं, जो शत्रु के लिए वहां पहुँचना कठिन बना देती हैं।
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प्रमुख उदाहरण: चित्तौड़गढ़ दुर्ग, कुम्भलगढ़ दुर्ग, रणथम्भौर दुर्ग (यह वन दुर्ग की श्रेणी में भी आता है), जालौर दुर्ग, सोजत दुर्ग, मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर), सिवाना का किला (बाड़मेर), किलोगढ़ दुर्ग, अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही), तारागढ़ दुर्ग (बूंदी), गढ़बीठली (तारागढ़-अजमेर), टॉडगढ़, आमेर दुर्ग, जयगढ़ दुर्ग, नाहरगढ़ दुर्ग, मांडलगढ़ दुर्ग, दौसा का किला, बाला किला (अलवर), काकनवाड़ी का किला, राजोरगढ़ दुर्ग, नीमराना का किला, भानगढ़ दुर्ग, बयाना दुर्ग, त्रिभुवनगढ़ दुर्ग, वसंतगढ़ दुर्ग आदि।
2. जल दुर्ग (Oudak Forts)
ऐसे दुर्ग जो चारों ओर से अथाह जल राशि या नदियों के संगम से घिरे होते हैं, उन्हें जल दुर्ग कहा जाता है। इन्हें 'औदक दुर्ग' भी कहते हैं।
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प्रमुख उदाहरण: गागरोन का किला (झालावाड़ - आहू और कालीसिंध नदियों के संगम पर), भैंसरोड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़), शेरगढ़ (कोषवर्द्धन) दुर्ग (बारां) आदि।
3. धान्वन दुर्ग (Desert Forts)
रेगिस्तानी इलाकों या मरुस्थल के बीच बने दुर्ग, जिनके चारों ओर दूर-दूर तक रेत के टीले, उबड़-खाबड़ भूमि और कंटीले झाड़-झंखाड़ होते हैं, धान्वन दुर्ग कहलाते हैं।
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प्रमुख उदाहरण: जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला), भटनेर का किला (हनुमानगढ़), नागौर का किला, बीकानेर का जूनागढ़ किला, चूरू का किला आदि।
4. स्थल दुर्ग या मही दुर्ग (Land Forts)
वे दुर्ग जो समतल भूमि पर ईंटों, पत्थरों और प्रस्तर खण्डों से निर्मित किए जाते हैं, उन्हें स्थल दुर्ग कहते हैं।
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प्रमुख उदाहरण: चौमू का किला (जयपुर), माधोराजपुरा का किला आदि।
5. पारिख दुर्ग (Moat Forts)
ऐसे दुर्ग जिनकी सुरक्षा के लिए उनके चारों ओर एक बहुत गहरी और चौड़ी खाई बनाई जाती है, जिसमें अक्सर पानी भरा होता है, पारिख दुर्ग कहलाते हैं।
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प्रमुख उदाहरण: लोहागढ़ दुर्ग (भरतपुर) इसका सबसे सटीक उदाहरण है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग: "गढ़ों का सिरमौर"
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के विषय में एक उक्ति जन-जन में प्रचलित है: "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया"। अर्थात, चित्तौड़गढ़ ही वास्तविक दुर्ग है, अन्य तो केवल छोटी गढ़ियां मात्र हैं।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के प्रसिद्ध उपनाम:
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राजस्थान का गौरव
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गढ़ों का सिरमौर
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मालवा का प्रवेश द्वार
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चित्रकूट दुर्ग
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खिज्राबाद (अलाउद्दीन खिलजी द्वारा दिया गया नाम)
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वॉटर फोर्ट (जल की प्रचुरता के कारण)
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राजस्थान का दक्षिणी प्रवेश द्वार
निर्माण एवं इतिहास:
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प्रारंभिक निर्माण: इस अभेद्य दुर्ग का निर्माण मौर्य शासक चित्रांगद (चित्रांग) मौर्य ने करवाया था। यह दुर्ग गम्भीरी और बेड़च नदियों के संगम के समीप अरावली की पर्वतमालाओं के बीच मेसा के पठार पर स्थित है।
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आधुनिक निर्माता: दुर्ग का अधिकांश वर्तमान स्वरूप और निर्माण कार्य महाराणा कुम्भा द्वारा करवाया गया था, इसीलिए उन्हें चित्तौड़गढ़ का 'आधुनिक निर्माता' माना जाता है।
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गुहिल वंश का अधिकार: गुहिलवंशीय शासक बप्पा रावल ने अपने गुरु हरित ऋषि के आशीर्वाद से 734 ईस्वी में मौर्य शासक मान मौर्य को पराजित कर इस दुर्ग पर अधिकार किया और मेवाड़ में गुहिल साम्राज्य की नींव रखी। बप्पा रावल को ही गुहिल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
दुर्ग की विशिष्टताएं:
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लिविंग फोर्ट: चित्तौड़गढ़ राजस्थान का सबसे बड़ा 'लिविंग फोर्ट' है, जहाँ आज भी जनसंख्या निवास करती है।
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कृषि कार्य: यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग है जिसके परिसर के भीतर खेती की जाती है।
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आकार: इस दुर्ग की बनावट समुद्र में तैरती हुई 'व्हेल मछली' के समान दिखाई देती है।
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ऐतिहासिक साक्ष्य: यहाँ गौमुख कुंड के पास प्रसिद्ध रानी पद्मिनी का जौहर स्थल स्थित है। साथ ही दुर्ग परिसर में नौगजा पीर की कब्र भी मौजूद है।
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आक्रमण: इस दुर्ग पर पहला आक्रमण अफगानिस्तान के सूबेदार मामू ने किया था। बाद में अकबर के आक्रमण के समय जयमल और फत्ता ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। दुर्ग के मार्ग में आज भी वीर सेनापति जयमल और पत्ता की छतरियां बनी हुई हैं।
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प्रमुख प्रवेश द्वार: दुर्ग में प्रवेश के लिए सात विशाल दरवाजे (पोल) हैं:
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पाडनपोल 2. भैरवपोल 3. हनुमानपोल 4. गणेशपोल 5. जोडलापोल 6. लक्ष्मणपोल 7. रामपोल।
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दर्शनीय स्थल एवं जल स्रोत:
दुर्ग के भीतर विजय स्तंभ, कुंभ श्याम मंदिर, तुलजा भवानी मंदिर, भीम कुंड, रानी पद्मिनी का महल और मीराबाई का मंदिर प्रमुख आकर्षण हैं। जल आपूर्ति के लिए यहाँ रत्नेश्वर तालाब, गोमुख झरना, कुम्भ सागर, हाथीकुंड, झालीबाव तालाब, चित्रांग मोरी तालाब और भीमलत तालाब जैसे कई स्रोत हैं।
UNESCO: वर्ष 2013 में चित्तौड़गढ़ दुर्ग को यूनेस्को की 'विश्व विरासत सूची' में सम्मिलित किया गया।
विजय स्तम्भ (Victorious Tower)
यह चित्तौड़गढ़ दुर्ग की सबसे गौरवशाली इमारत है, जो मेवाड़ की विजय का प्रतीक है।
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निर्माण: इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर 1437 ईस्वी की 'सारंगपुर विजय' की स्मृति में करवाया था। इसका निर्माण काल 1440 से 1448 ईस्वी के मध्य रहा।
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वास्तुशिल्पी: यह महान वास्तुशिल्पी मंडन के मार्गदर्शन में बना। इसके मुख्य शिल्पकार जेता और उनके पुत्र नापा, पूंजा थे।
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उपनाम: इसे 'हिंदू मूर्तिकला का विश्वकोश', 'विक्रटी टावर', 'मूर्तियों का अजायबघर' और 'विष्णु ध्वज' के नाम से जाना जाता है।
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संरचना:
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यह 9 मंजिला इमारत है।
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इसकी 8वीं मंजिल पर 'अल्लाह' शब्द खुदा है, जबकि 3री मंजिल पर अरबी भाषा में 9 बार 'अल्लाह' लिखा गया है।
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इसका आकार मध्य से संकरा और ऊपर-नीचे से चौड़ा होने के कारण 'डमरू' जैसा दिखता है।
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माप: आधार 30 फीट, ऊंचाई 122 फीट, कुल सीढ़ियां 157।
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प्रशंसा: प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी तुलना दिल्ली की कुतुब मीनार से करते हुए इसे उससे भी बेहतरीन बताया है और इसे 'रोम का टार्जन' की उपमा दी है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग : मेवाड़ की आन, बान और शौर्य का प्रतीक
राजस्थान के दुर्गों में Chittorgarh Fort का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। यह केवल एक दुर्ग नहीं, बल्कि राजपूती शौर्य, त्याग, बलिदान और स्वाभिमान का जीवंत इतिहास है। इसे मेवाड़ की अस्मिता का प्रतीक कहा जाता है। यह दुर्ग भारत के सबसे विशाल, प्राचीन एवं गौरवशाली दुर्गों में गिना जाता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपनी स्थापत्य कला, मंदिरों, महलों, विजय स्तंभों तथा तीन ऐतिहासिक साकों के कारण विश्व प्रसिद्ध है।
यह दुर्ग वीरता, जौहर, केसरिया और मातृभूमि के लिए बलिदान की उन गौरवगाथाओं का साक्षी रहा है, जिनका वर्णन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में किया गया है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थल
1. कुंभश्याम मंदिर एवं कालिका माता मंदिर
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित कुंभश्याम मंदिर तथा कालिका माता मंदिर प्राचीन धार्मिक और स्थापत्य विरासत के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इन मंदिरों का निर्माण आठवीं शताब्दी में हुआ माना जाता है।
कुंभश्याम मंदिर
कुंभश्याम मंदिर प्रतिहारकालीन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर महामारू शैली में निर्मित है, जो राजस्थान की प्राचीन स्थापत्य कला की विशिष्ट पहचान है।
महाराणा कुंभा ने 15वीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। यही कारण है कि इस मंदिर का नाम कुंभश्याम मंदिर पड़ा।
इस मंदिर की नक्काशी, स्तंभ, शिल्पकला तथा धार्मिक महत्व इसे दुर्ग के प्रमुख स्थलों में स्थान देते हैं।
कालिका माता मंदिर
कालिका माता मंदिर गुहिल वंश की इष्ट देवी को समर्पित है। यह भी महामारू शैली में निर्मित है।
यह मंदिर मेवाड़ के शासकों की कुलदेवी आराधना का केंद्र रहा। आज भी यह आस्था का प्रमुख स्थान है।
2. रानी पद्मिनी का महल
Padmini Palace चित्तौड़गढ़ दुर्ग के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में शामिल है।
महाराणा रतनसिंह की पत्नी रानी पद्मिनी अपने अनुपम सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध थीं। कहा जाता है कि उनके सौंदर्य की ख्याति सुनकर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
इसी ऐतिहासिक प्रसंग के कारण यह महल प्रसिद्ध हुआ।
पद्मिनी महल की विशेषताएँ
- जल के मध्य निर्मित सुंदर महल
- पास में पद्मिनी तालाब
- तालाब के मध्य जल महल
- राजपूती स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण
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यह महल राजपूती सम्मान और जौहर परंपरा की स्मृतियों को संजोए हुए है।
3. तुलजा भवानी मंदिर
तुलजा भवानी मंदिर का निर्माण उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज के दासी पुत्र बनवीर ने करवाया था।
यह मंदिर दुर्ग के अंतिम द्वार रामपोल के दक्षिण दिशा में स्थित है।
विशेषताएँ
- तुलजा भवानी माता को समर्पित मंदिर
- पास में पुरोहित जी की हवेली
- छत्रपति Shivaji Maharaj की आराध्य देवी तुलजा भवानी थीं
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यह मंदिर धार्मिक एवं ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
4. मीराबाई मंदिर
Meera Temple भक्तिकालीन विरासत का अनुपम उदाहरण है।
मेवाड़ के राणा सांगा के द्वितीय पुत्र भोजराज की पत्नी मीराबाई श्रीकृष्ण की परम भक्त थीं।
मंदिर की विशेषताएँ
- इंडो-आर्य शैली में निर्मित
- मीरा की प्रतिमा के स्थान पर चित्र स्थापित
- सामने गुरु संत रैदास की छतरी
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यह मंदिर भक्ति, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।
5. जैन कीर्ति स्तंभ
Kirti Stambh चित्तौड़गढ़ दुर्ग का अत्यंत प्रसिद्ध स्मारक है।
निर्माण
इसका निर्माण दिगंबर जैन महाजन जीजाक द्वारा करवाया गया।
यह प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है।
विशेषताएँ
- सात मंजिला इमारत
- अद्भुत जैन शिल्पकला
- प्रशस्ति की शुरुआत अत्रि ने की
- समापन महेश भट्ट ने किया
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यह जैन स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है।
6. श्रृंगार चंवरी
श्रृंगार चंवरी को शांतिनाथ जैन मंदिर भी कहा जाता है।
इसका निर्माण महाराणा कुंभा के कोषाध्यक्ष के पुत्र वेल्का ने करवाया।
विशेषताएँ
- राजपूत एवं जैन स्थापत्य का मिश्रण
- कुंभा की पुत्री रमाबाई की चंवरी
- अद्वितीय शिल्पकला
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7. अन्य प्रमुख स्थल
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में अनेक अन्य महत्वपूर्ण स्थल भी हैं—
- गोरा-बादल महल
- भीमलत कुंड
- नवलखा बुर्ज
- चित्रांग मोरी तालाब
- जयमल मेड़तिया की छतरी
- कल्ला राठौड़ की छतरियां
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के तीन साके
राजस्थान के इतिहास में चित्तौड़गढ़ के तीन साके वीरता और बलिदान की अमर गाथाएँ हैं।
प्रथम साका (1303 ई.)
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण
1303 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान Alauddin Khalji ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया।
उस समय मेवाड़ पर महाराणा रतनसिंह का शासन था।
युद्ध
- रतनसिंह ने केसरिया किया
- सेनापति गोरा और बादल वीरगति को प्राप्त हुए
- रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर किया
रानी पद्मिनी
रानी पद्मिनी सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की पुत्री थीं।
परिणाम
अलाउद्दीन खिलजी ने विजय के बाद चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद रखा तथा पुत्र खिज्र खां को दुर्ग सौंप दिया।
महत्व
- मेवाड़ का प्रथम साका
- राजस्थान का द्वितीय साका
- राजस्थान का प्रथम साका रणथम्भौर का माना जाता है
द्वितीय साका (1534-35)
बहादुरशाह का आक्रमण
Bahadur Shah of Gujarat ने 1534-35 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
उस समय विक्रमादित्य का शासन था।
रानी कर्मावती
रानी कर्मावती ने मुगल शासक Humayun को राखी भेजकर सहायता मांगी, पर समय पर सहायता नहीं मिल सकी।
बाघसिंह का शौर्य
- दुर्ग की जिम्मेदारी बाघसिंह को सौंपी गई
- पाडनपोल के बाहर युद्ध करते वीरगति पाई
जौहर
- बाघसिंह ने केसरिया किया
- रानी कर्मावती ने जौहर किया
यह चित्तौड़ का दूसरा साका कहलाता है।
तृतीय साका (1568)
अकबर का आक्रमण
1568 में मुगल सम्राट Akbar ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया।
उस समय उदयसिंह शासक थे।
सेनापति
उदयसिंह गोगुंदा चले गए और दुर्ग की जिम्मेदारी दो वीर सेनानायकों को सौंपी—
- जयमल
- फत्ता
जयमल के भतीजे कल्लाजी (चार हाथ के लोकदेवता) ने भी युद्ध किया।
केसरिया और जौहर
- जयमल और फत्ता ने केसरिया किया
- फत्ता की पत्नी फूलकंवर ने जौहर किया
यह चित्तौड़ का तृतीय साका कहलाता है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग का महत्व
चित्तौड़गढ़ दुर्ग केवल स्थापत्य का नमूना नहीं, बल्कि यह—
- राजपूती शौर्य का प्रतीक
- जौहर और केसरिया की भूमि
- मेवाड़ की आन-बान-शान
- वीरता की अमर गाथाओं का केंद्र
- भारतीय इतिहास का गौरव है।
रणथम्भौर दुर्ग : शौर्य, स्वाभिमान और वीर हम्मीर की गौरवगाथा
राजस्थान के प्रसिद्ध दुर्गों में Ranthambore Fort का विशिष्ट स्थान है। यह दुर्ग केवल एक सैन्य संरचना नहीं, बल्कि राजपूती वीरता, स्वाभिमान और बलिदान की अमर गाथाओं का प्रतीक है। प्राचीन काल से ही यह दुर्ग अपनी अभेद्य संरचना, प्राकृतिक सुरक्षा, ऐतिहासिक संघर्षों तथा धार्मिक महत्व के कारण प्रसिद्ध रहा है।
रणथम्भौर दुर्ग को राजस्थान के सबसे शक्तिशाली दुर्गों में गिना जाता है। इसकी सामरिक स्थिति, विशाल प्राचीरें, दुर्गम पहाड़ियां तथा प्राकृतिक सुरक्षा इसे लगभग अजेय बनाती थीं। इसी कारण इसे दुर्गाधिराज भी कहा गया।
रणथम्भौर दुर्ग का परिचय
रणथम्भौर दुर्ग का वास्तविक नाम रन्त:पुर माना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—
"रण की घाटी में स्थित नगर"
यह नाम स्वयं इसकी युद्धप्रधान ऐतिहासिक भूमिका को दर्शाता है।
रणथम्भौर दुर्ग के उपनाम
रणथम्भौर दुर्ग अनेक उपनामों से प्रसिद्ध है—
- दुर्गाधिराज
- हम्मीर की आन-बान का प्रतीक
- चित्तौड़गढ़ के किले का छोटा भाई
- अभेद्य दुर्ग
- वीरता की भूमि
ये उपनाम इसकी महानता को दर्शाते हैं।
रणथम्भौर दुर्ग का निर्माण
रणथम्भौर दुर्ग का निर्माण आठवीं शताब्दी में महेश्वर के ठाकुर रंतिदेव ने करवाया था।
एक अन्य मत के अनुसार इसका निर्माण चौहान शासक गोविन्द चौहान द्वारा करवाया गया।
दुर्ग का आकार
रणथम्भौर दुर्ग अंडाकार आकार का है, जो इसे विशिष्ट बनाता है।
रणथम्भौर दुर्ग की विशेषताएँ
1. प्राकृतिक रूप से सुरक्षित दुर्ग
यह दुर्ग ऊँची पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है, जिससे शत्रु के लिए इस पर विजय प्राप्त करना अत्यंत कठिन था।
2. अबुल फजल का कथन
Abu'l-Fazl ने कहा था—
"अन्य सब दुर्ग तो नंगे हैं जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है।"
यह कथन इसकी अभेद्यता को प्रमाणित करता है।
3. धार्मिक विविधता का प्रतीक
रणथम्भौर राजस्थान का एकमात्र ऐसा दुर्ग माना जाता है जिसमें—
- मंदिर
- मस्जिद
- गिरजाघर
तीनों स्थित हैं।
रणथम्भौर दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थल
1. जौहर महल
यह स्थल दुर्ग के गौरवशाली इतिहास और जौहर परंपरा का साक्षी माना जाता है।
2. त्रिनेत्र गणेश मंदिर
Trinetra Ganesh Temple दुर्ग का अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर है।
यह राजस्थान के प्राचीन गणेश मंदिरों में गिना जाता है।
विशेषताएँ
- यहाँ गणेश जी त्रिनेत्र रूप में विराजमान हैं।
- यह अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।
- दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं।
3. 32 खंभों की छतरी
रणथम्भौर दुर्ग में 32 खंभों की छतरी स्थित है।
इसे न्याय की छतरी भी कहा जाता है।
यह स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है।
4. गुप्त गंगा
दुर्ग में स्थित गुप्त गंगा जल स्रोत धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
5. हम्मीर महल
वीर हम्मीर देव चौहान से संबंधित यह महल ऐतिहासिक महत्व रखता है।
6. अन्य प्रमुख स्थल
रणथम्भौर दुर्ग में अन्य प्रसिद्ध स्थल—
- जोरां-भोरां
- फौजी छावनी
- पीर सदरुद्दीन की दरगाह
- सुपारी महल
- जोगी महल
- बादल महल
- रनिहाड़ तालाब
- लक्ष्मी नारायण मंदिर
रणथम्भौर दुर्ग के प्रमुख द्वार
दुर्ग में कई महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार हैं—
- नौलखा दरवाजा
- गणेश पोल
- हाथीपोल
- सूरजपोल
- त्रिपोलिया दरवाजा
ये द्वार सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
गोविंद राज और रणथम्भौर
1192 के तराइन के द्वितीय युद्ध में Prithviraj Chauhan की पराजय के बाद उनके पुत्र गोविंद राज ने यहाँ शासन स्थापित किया।
यह चौहान शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
रणथम्भौर का प्रथम साका
वीर हम्मीर देव चौहान
रणथम्भौर का सबसे प्रतापी और प्रसिद्ध शासक हम्मीर देव चौहान था।
Hammir Dev Chauhan राजपूती शौर्य के महान प्रतीक माने जाते हैं।
अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण
हम्मीर देव ने दिल्ली सुल्तान Alauddin Khalji के विद्रोही सेनापति मुहम्मदशाह को शरण दी थी।
यही कारण बना संघर्ष का।
क्रोधित होकर अलाउद्दीन खिलजी ने 1300 ईस्वी में रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया।
युद्ध और वीरता
कड़ा संघर्ष हुआ।
- राणा हम्मीर युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- दुर्ग की रक्षा हेतु वीर सैनिकों ने अंतिम सांस तक युद्ध किया।
रानी रंगदेवी का जौहर
हम्मीर की रानी रंगदेवी ने अन्य रानियों और स्त्रियों के साथ जौहर किया।
यह राजस्थान का प्रथम साका माना जाता है।
अलाउद्दीन का अधिकार
जुलाई 1301 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी का दुर्ग पर अधिकार हो गया।
यह घटना राजस्थान इतिहास में अमर है।
रणथम्भौर और अकबर
1569 ईस्वी में मुगल सम्राट Akbar ने रणथम्भौर पर अधिकार का प्रयास किया।
राव सुरजन हाड़ा
आमेर के शासक भगवंतदास के प्रयासों से बूंदी के अधिपति राव सुरजन हाड़ा ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर दुर्ग सौंप दिया।
अकबर के कार्य
अकबर ने—
- रणथम्भौर को अजमेर सूबे की सरकार बनाया
- यहाँ टकसाल स्थापित की
- सिक्के ढाले
रणथम्भौर पर ऐतिहासिक कथन
जलालुद्दीन का कथन
Jalaluddin Khalji ने कहा—
"मैं ऐसे 10 दुर्गों को मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता।"
अमीर खुसरो का कथन
Amir Khusrau ने कहा—
"कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया है।"
रणथम्भौर दुर्ग का सामरिक महत्व
रणथम्भौर दुर्ग का सामरिक महत्व अत्यधिक था क्योंकि—
- दिल्ली और राजस्थान की दिशा नियंत्रित करता था
- प्राकृतिक सुरक्षा से युक्त था
- चौहान शक्ति का प्रमुख केंद्र था
- शत्रुओं के लिए अभेद्य माना जाता था
रणथम्भौर दुर्ग की स्थापत्य विशेषताएँ
राजपूती स्थापत्य
- विशाल प्राचीर
- ऊँची बुर्जें
- विशाल द्वार
- पहाड़ी सुरक्षा
धार्मिक स्थापत्य
- गणेश मंदिर
- दरगाह
- प्राचीन देवालय
जल प्रबंधन
- गुप्त गंगा
- तालाब
- प्राकृतिक जलस्रोत
रणथम्भौर दुर्ग का ऐतिहासिक महत्व
रणथम्भौर दुर्ग—
- राजस्थान के प्रथम साके की भूमि
- वीर हम्मीर की शौर्यस्थली
- चौहान साम्राज्य की गौरवभूमि
- राजपूती स्वाभिमान का प्रतीक
- युद्धकला और स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण
अलवर, नागौर, खींवसर, मेड़ता, कुचामन, कोटा एवं सज्जनगढ़ दुर्ग
राजस्थान की दुर्ग परंपरा केवल चित्तौड़गढ़ और रणथम्भौर तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां अनेक ऐसे दुर्ग हैं जो अपने इतिहास, स्थापत्य, सामरिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत के कारण विशिष्ट स्थान रखते हैं। Rajasthan के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित ये दुर्ग कभी राजपूत वीरता, कभी जागीरी गौरव, तो कभी कला और स्थापत्य के केंद्र रहे हैं।
इस भाग में अलवर, नागौर, खींवसर, मेड़ता, कुचामन, कोटा और सज्जनगढ़ दुर्गों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत है।
1. अलवर का किला (बाला किला)
Bala Quila अरावली पर्वतमाला की ऊँची पहाड़ियों पर स्थित एक भव्य एवं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्ग है।
यह दुर्ग अलवर नगर के ऊपर प्रहरी की तरह खड़ा दिखाई देता है।
उपनाम
बाला किला अनेक नामों से प्रसिद्ध है—
- बड़ा किला
- बावनगढ़ का लाडला
- अलवर का किला
- कुंवारा किला
कुंवारा किला क्यों?
इस दुर्ग पर कभी युद्ध नहीं हुआ, इसलिए इसे कुंवारा किला कहा जाता है।
निर्माण
अलवर दुर्ग का निर्माण कोकिल देव के पुत्र अलगुराय ने करवाया था।
बाद में हसन खान मेवाती ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।
यह दुर्ग गिरी दुर्ग श्रेणी में आता है।
ऐतिहासिक महत्व
बाबर का प्रवास
Babur एक रात इस दुर्ग में रुका था।
जहांगीर की नजरबंदी
Jahangir को अकबर ने यहीं नजरबंद करवाया था।
सलीम महल और सलीम सागर
जहांगीर (सलीम) ने यहां—
- सलीम महल
- सलीम सागर
का निर्माण करवाया।
प्रवेश द्वार
बाला किले में छह प्रवेश द्वार हैं—
- चांदपोल
- सूरजपोल
- जयपोल
- किशनपोल
- अंधेरी गेट
- लक्ष्मणपुर
स्थापत्य विशेषताएँ
- 3359 कंगूरे
- 15 बड़ी बुर्जें
- 51 छोटी बुर्जें
दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था अद्भुत मानी जाती है।
2. नागौर का किला
Nagaur Fort राजस्थान के प्रमुख ऐतिहासिक दुर्गों में गिना जाता है।
उपनाम
- नागाणा दुर्ग
- अहिछत्रपुर दुर्ग
- नाग दुर्ग
निर्माण
नागौर दुर्ग का निर्माण सोमेश्वर के सामंत केमास ने विक्रम संवत 1211 में करवाया।
यह धान्व दुर्ग श्रेणी में आता है।
विशेषता
यह एक ऐसा दुर्ग माना जाता है—
जिस पर दागे गए तोप के गोले महलों को क्षति पहुंचाए बिना ऊपर से निकल जाते हैं।
अकबर का नागौर दरबार
1570 ईस्वी में Akbar ने आमेर के शासक भारमल की सहायता से नागौर दरबार लगाया।
शुक्र तालाब
इसकी स्मृति में शुक्र तालाब बनवाया गया।
अमरसिंह राठौड़ की छतरी
यहां वीर Amar Singh Rathore की छतरी भी स्थित है।
स्थापत्य एवं सम्मान
बादल महल
दुर्ग के भीतर सुंदर बादल महल स्थित है।
यूनेस्को सम्मान
2007 में यूनेस्को द्वारा Award of Excellence से सम्मानित।
3. खींवसर किला
Khimsar Fort राजस्थान के प्रसिद्ध जागीरी दुर्गों में शामिल है।
निर्माण
खींवसर किले का निर्माण मेड़तिया शासक जालिम सिंह ने करवाया।
विशेषताएँ
जागीरदारों के किलों का सिरमौर
इसे जागीरदारों के किलों का सिरमौर कहा जाता है।
औरंगजेब का प्रवास
Aurangzeb यहां ठहरे थे।
हेरिटेज होटल
वर्तमान में यह किला हेरिटेज होटल के रूप में प्रसिद्ध है।
4. मेड़ता का किला
Merta Fort इतिहास और भक्ति परंपरा दोनों के लिए प्रसिद्ध है।
उपनाम
- मालकोट
- मेड़तकपुर दुर्ग
निर्माण
राव मालदेव द्वारा निर्मित मालकोट किला यहां स्थित है।
मीराबाई से संबंध
यह वही स्थान है जहां
Mirabai ने जीवन व्यतीत किया।
यहां—
- मीराबाई महल
- मीराबाई मंदिर
स्थित हैं।
अन्य विशेषताएँ
प्राचीन नाम
मेड़ता का प्राचीन नाम मेदिनीपुर था।
डागोलाई तालाब
यहां कप्तान डी. बौरबोन की कब्र भी स्थित है।
5. कुचामन दुर्ग
Kuchaman Fort नागौर जिले का महत्वपूर्ण गिरी दुर्ग है।
विशेष पहचान
- जागीरी किलों का सिरमौर
- सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्ग
निर्माण
मान्यता है कि मेड़तिया शासक जालिमसिंह ने पनखण्डी नामक महात्मा के आशीर्वाद से इसकी नींव रखी।
बाद में उनके वंशजों ने विस्तार करवाया।
स्थापत्य
- पहाड़ी दुर्ग
- मजबूत परकोटे
- राजपूती स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना
6. कोटा दुर्ग
Kota Garh चम्बल नदी के किनारे स्थित राजस्थान का प्रमुख दुर्ग है।
निर्माण
कोटा दुर्ग की नींव जैतसिंह ने रखी।
जेम्स टॉड का कथन
James Tod ने कहा—
"आगरा के किले को छोड़कर किसी भी किले का परकोटा इतना बड़ा नहीं जितना कोटा गढ़ का है।"
झाला हवेली
दुर्ग स्थित झाला हवेली अपने भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
खंडेलवाल ने कहा—
"यहां के भित्ति चित्र एशिया में अपने सानी नहीं रखते।"
विशेषताएँ
- विशाल परकोटा
- चम्बल तट पर सामरिक स्थिति
- उत्कृष्ट चित्रकला
- राजपूती-मुगल स्थापत्य का मिश्रण
7. सज्जनगढ़ दुर्ग
Sajjangarh Palace उदयपुर जिले में स्थित अत्यंत प्रसिद्ध दुर्ग है।
उपनाम
उदयपुर का मुकुटमणि
निर्माण
सज्जनगढ़ दुर्ग का निर्माण महाराणा सज्जनसिंह ने बांसदरा पहाड़ी पर करवाया।
विशेषता
यह दुर्ग ऊँचाई पर स्थित होने के कारण बादलों के बीच दिखाई देता है।
इसी कारण इसे Monsoon Palace भी कहा जाता है।
दर्शनीय विशेषताएँ
- अरावली का विहंगम दृश्य
- उदयपुर झीलों का दृश्य
- राजमहल संरचना
- प्राकृतिक सौंदर्य
इन दुर्गों का सामूहिक ऐतिहासिक महत्व
इन सभी दुर्गों का महत्व केवल उनके निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि—
सैन्य महत्व
- सीमाओं की रक्षा
- आक्रमणों से सुरक्षा
- सामरिक नियंत्रण
सांस्कृतिक महत्व
- मंदिर
- महल
- चित्रकला
- धार्मिक विरासत
स्थापत्य महत्व
- गिरी दुर्ग
- धान्व दुर्ग
- जल संरचनाएं
- बुर्ज, परकोटे, पोल
राजस्थान की दुर्ग परंपरा में योगदान
ये दुर्ग सिद्ध करते हैं कि राजस्थान केवल युद्धभूमि नहीं, बल्कि—
- कला की भूमि
- स्थापत्य का केंद्र
- शौर्य की जन्मभूमि
- संस्कृति का संरक्षक रहा है।
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